श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ७] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, वालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन | ७८३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तस्मादन्येऽपि ये केचित्तीर्थे तस्मिन् जनाः स्थिताः।<br>आराधयन्ते देवेशं कामेशं चैव सर्वदा॥ ८ | अतः अन्य जो कोई भी लोग उस तीर्थमें रहते हैं, वे देवेश कामेश्वरकी सदा आराधना करते हैं॥ ८॥ |
| यो यस्य मनसः कामः तं तमाप्नोति निश्चितम्।<br>कामेश्वरसमीपे तु दक्षिणे वरवर्णिनि॥ ९<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे रुद्रस्यानुचरो भवेत्।<br>चैत्रे मासि सिते पक्षे त्रयोदश्यां तु मानवाः॥ १०<br>स्नानं ये च प्रकुर्वन्ति ते कामसदृशा नराः। | उस समय जिसकी जो भी कामना होती है, वह [व्यक्ति] उस-उस कामनाको निश्चित रूपसे प्राप्त करता है। हे वरवर्णिनि! कामेश्वरके समीपमें दक्षिणमें जो कुण्ड है, हे वरारोहे! चैत्रमासमें शुक्लपक्षकी त्रयोदशीको उसमें स्नान करके मनुष्य रुद्रका अनुचर हो जाता है। जो मनुष्य उसमें स्नान करते हैं, वे कामदेवके समान हो जाते हैं॥ ९-१०१/२॥ |
| कामेश्वरं सदा लिङ्गं योऽर्चयतीह मानवः॥ ११<br>लभेद्विद्याधरं लोकमेवमेव न संशयः। | जो मनुष्य यहाँपर कामेश्वरलिङ्गकी सदा पूजा करता है, वह विद्याधरलोक प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ १११/२॥ |
| कामेश्वरस्य पूर्वेण नाम्ना पञ्चालकेश्वरम्॥ १२<br>धनदस्य तु पुत्रेण पूजितोऽहं सुरेश्वरि।<br>क्षेत्रं मम प्रियं ज्ञात्वा तस्मिन् देशे व्यवस्थितः॥ १३<br>आराधयति मां नित्यं मम पूजारतः सदा।<br>पञ्चालेश्वरनामाहं तस्मिन् देशे व्यवस्थितः॥ १४<br>नराणां धनदानं तु करिष्यामि यशस्विनि। | कामेश्वरके पूर्वमें पंचालकेश्वर नामक लिङ्ग है, हे सुरेश्वरि! मैं वहाँ धनद (कुबेर)-के पुत्रके द्वारा पूजित हूँ। मेरा प्रिय क्षेत्र जानकर वह उस देशमें स्थित रहकर प्रतिदिन मेरी आराधना करता है और सदा मेरी पूजामें संलग्न रहता है। हे यशस्विनि! मैं उस स्थानमें पंचालश्वर नामसे स्थित हूँ और मनुष्योंको धनका दान करता हूँ॥ १२-१४१/२॥ |
| तत्र पूर्वमुखं देवि मुखलिङ्गं तु तिष्ठति॥ १५<br>पञ्चकेशवरनामाहं तत्र देवि प्रतिष्ठितः।<br>कूपस्तस्यैव चाग्रे तु पावनः सर्वदेहिनाम्॥ १६ | हे देवि! वहाँ पूर्वकी ओर मुखवाला मुखलिङ्ग विराजमान है, हे देवि! मैं वहाँ पंचकेश्वर नामसे स्थित हूँ। उसीके आगे सभी देहधारियोंको पवित्र करनेवाला एक कूप स्थित है॥ १५-१६॥ |
| तस्मिन् स्थाने स्थिता देवि अघोरेशेति नामतः।<br>मानवानां हितार्थाय स्वयं तत्र व्यवस्थिता॥ १७<br>नव लिङ्गानि गुह्यानि स्थापितानि तु किन्नरैः।<br>पञ्चकेशवरपूर्वेण दिवाकरनिशाकरौ॥ १८ | हे देवि! उस स्थानपर अघोरेशा—इस नामसे भगवती स्थित हैं, वे मनुष्योंके कल्याणके लिये वहाँ स्वयं विराजमान हैं। वहाँ किन्नरोंके द्वारा नौ गुह्य लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। पंचकेश्वरके पूर्वमें सूर्य-चन्द्रलिङ्ग स्थित हैं॥ १७-१८॥ |
| लिङ्गानि तानि पुण्यानि सर्वपापहराणि च।<br>दक्षिणेन तु तस्यैव अन्धकेशेति नामतः॥ १९<br>तत्र लिङ्गं महत्पुण्यमन्धकेन प्रतिष्ठितम्।<br>मम चैव प्रसादेन गतोऽसौ परमां गतिम्॥ २० | वे लिङ्ग पुण्यप्रद तथा सभी पापोंको नष्ट करनेवाले हैं। वहाँपर उसीके दक्षिणमें अन्धकेश—इस नामवाला महापुण्यप्रद लिङ्ग है, यह अन्धकके द्वारा स्थापित किया गया है, मेरी कृपासे वह [अन्धक] वहाँ परम गतिको प्राप्त हुआ था॥ १९-२०॥ |
| पश्चिमे तु दिशाभागे तस्य देवस्य सुन्दरि।<br>नाम्ना देवेश्वरं लिङ्गं कामकुण्डस्य दक्षिणे॥ २१<br>अहमेव सदा भद्रे तस्मिन् स्थाने व्यवस्थितः।<br>भीष्मेश्वरं तु तत्रैव सिद्धेश्वरमतः परम्॥ २२ | हे सुन्दरि! उस देवके पश्चिम दिशाभागमें तथा कामकुण्डके दक्षिणमें देवेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! मैं ही उस स्थानपर सदा विराजमान हूँ। वहींपर भीष्मेश्वर तथा सिद्धेश्वर स्थित हैं॥ २१-२२॥ |
| गङ्गेश्वरं तु तत्रैव यमुनेश्वरमेव च।<br>मण्डलेश्वरं तु तत्रैव उर्वशीलिङ्गमुत्तमम्॥ २३ | वहींपर गंगेश्वर तथा यमुनेश्वर हैं। वहींपर |