श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ७ ] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन | ७८९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गणैस्तु मम धर्मज्ञैः श्रेष्ठानि सुमहन्ति च।<br>तस्य पूर्वेण कूपस्तु तिष्ठते सुमहान् प्रिये॥ ९४<br>तस्मिन् कूपे जलं स्पृश्य पूतो भवति मानवः।<br>चण्डेश्वरस्य पूर्वं तु स्थितं चित्रेश्वरं शुभम्॥ ९५ | [हे देवि!] उसीके समीपमें मेरे धर्मज्ञ गणोंके द्वारा श्रेष्ठ तथा अति महान् लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। हे प्रिये! उसके पूर्वमें एक अति महान् कूप स्थित है, उस कूपके जलका स्पर्श करके मनुष्य पवित्र हो जाता है॥ ९३-९४ १/२॥<br>चण्डेश्वरके पूर्वमें शुभ चित्रेश्वरलिङ्ग स्थित है, |
| तेन दृष्टेन देवेशि चित्रस्य समतां व्रजेत्।<br>चित्रेश्वरसमीपे तु स्थितं कालेश्वरं महत्॥ ९६<br>तेन दृष्टेन देवेशि कालं वञ्चति मानवः॥ ९७ | हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य चित्रकी समता प्राप्त करता है। चित्रेश्वरके समीपमें महान् कालेश्वरलिङ्ग स्थित है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य कालको भी वंचित कर देता है॥ ९५-९७॥ |
| देव्युवाच<br>कथं कालेश्वरो देवः केन वा वञ्चितः प्रभुः।<br>कस्मिन् स्थाने तु कः सिद्धस्तन्मे ब्रूहि सुरेश्वर॥ ९८ | देवी बोलीं—हे सुरेश्वर! प्रभु कालेश्वरदेव किस प्रकार तथा किसके द्वारा वंचित किये गये और किस स्थानपर कौन सिद्ध हुआ? इसे मुझे बताइये॥ ९८॥ |
| ईश्वर उवाच<br>तस्मिन् स्थाने पुरा भद्रे पिङ्गाक्षो नाम वै मुनिः।<br>ज्ञानस्य वक्ता पञ्चार्थे लोके पाशुपतः स्थितः॥ ९९ | ईश्वर बोले—हे भद्रे! पूर्वकालमें उस स्थानमें पंचभूतात्मक लोकमें ज्ञानके वक्ता पशुपतिभक्त पिंगाक्ष नामक मुनि रहते थे॥ ९९॥ |
| तेन चैव पुरा भद्रे लिङ्गेऽस्मिन् स प्रसादितः।<br>ततो लिङ्गप्रभावेण कालं वञ्चितवान् मुनिः॥ १०० | हे भद्रे! उन्होंने ही पूर्वकालमें इस लिङ्गमें शिवको प्रसन्न किया था, इसीलिये उन मुनिने लिङ्गके प्रभावसे कालको वंचित किया॥ १००॥ |
| नान्ततो दृश्यते काल ईश्वररासक्तचेतसः।<br>तत्र स्थित्वा तु सुमहत्कालं यः कालयेत्प्रजाः॥ १०१<br>न तस्य क्रमितुं शक्तः कालो वै घोररूपिणः। | ईश्वरमें आसक्त चित्तवालेको अन्ततक काल दृष्टिगत नहीं होता है। [हे देवि!] वहाँ सन्तानसहित रहकर जो दीर्घकालतक समय व्यतीत करता है, घोररूपी काल उसपर आक्रमण करनेमें समर्थ नहीं होता है॥ १०१ १/२॥ |
| ततः प्रभृति येऽन्येऽपि तस्मिन्नायतने स्थिताः॥ १०२<br>तेषां नाक्रमते कालः वर्षलक्षायुतैरपि।<br>अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि रहस्यं वरवर्णिनि॥ १०३ | उसी समयसे जो अन्य लोग भी उस आयतनमें स्थित रहते हैं, लाखों वर्षोंमें भी काल उनपर आक्रमण नहीं कर सकता है। हे वरवर्णिनि! मैं आपको दूसरा रहस्य भी बताऊँगा॥ १०२-१०३॥ |
| तस्य देवस्य चाग्रे तु कूपस्तिष्ठति वै श्रुतः।<br>तत्र कालोदकं नाम उदकं देवि तिष्ठति॥ १०४<br>तस्यैव प्राशनाद्देवि पूतो भवति मानवः।<br>यैस्तु तत्रोदकं पीतं नरैः स्त्रीभिश्च कर्मभिः॥ १०५<br>स्वयं देवेन शर्वेण त्रिशूलाङ्केन चाङ्कितः।<br>न तेषां परिवर्तों वै कल्पकोटिशतैरपि॥ १०६ | उस लिङ्गके आगे एक प्रसिद्ध कूप स्थित है, हे देवि! वहाँपर कालोदक नामक उदक स्थित है, हे देवि! उसके प्राशन (पान)-से मनुष्य पवित्र हो जाता है। जिन पुरुषों तथा स्त्रियोंने पुण्यकर्मोंके प्रभावसे उस जलका पान कर लिया, उन्हें मानो स्वयं भगवान् शिवने त्रिशूलांकसे अंकित कर दिया, सैकड़ों-करोड़ कल्पोंमें भी उनका पुनर्जन्म नहीं होता है। उसका पान करके मनुष्य भवबन्धनसे होनेवाले भयसे मुक्त हो जाते हैं॥ १०४-१०६ १/२॥ |
| यत्पीत्वा भवबन्धोत्थभयं मुञ्चन्ति मानवाः।<br>एतद्देवि रहस्यं तु कालोदकमुदाहृतम्॥ १०७ | हे देवि! मैंने इस रहस्यमय कालोदकका वर्णन |