श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| दर्शनात्तस्य देवस्य महापातकिनोऽपि ये।<br>तेऽपि भोगान् समश्नन्ति न तेषां क्रमते भवः॥ १०८ | कर दिया। [हे देवि!] जो महापातकी हैं, वे भी उस देवके दर्शनसे सुखोंको प्राप्त करते हैं और संसार उनपर आक्रमण नहीं करता है॥ १०७-१०८॥ | | तल्लिङ्गं सर्वलिङ्गानामुत्तमं परिकीर्तितम्।<br>दर्शनात्तस्य लिङ्गस्य रुद्रत्वं याति मानवः॥ १०९ | वह लिङ्ग सभी लिङ्गोंमें श्रेष्ठ कहा गया है, उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य रुद्रत्व प्राप्त करता है॥ १०९॥ | | तत्र वापि हि यद्दत्तं दानं रुद्ररतात्मनाम्।<br>तद्वै महाफलं तेषां यच्छते भावितात्मनाम्॥ ११० | वहाँपर जो भी दान किया जाता है, वह उन भक्तिमय चित्तवालों तथा रुद्रमें रत मनवालोंको महाफल प्रदान करता है॥ ११०॥ | | खण्डस्फुटितसंस्कारं तत्र कुर्वन्ति ये नराः।<br>रुद्रलोकं समासाद्य मोदन्ते सुखिनः सदा॥ १११ | जो मनुष्य वहाँपर खण्डस्फुटित संस्कार करते हैं, वे रुद्रलोक प्राप्त करके सदा आनन्दित तथा सुखी रहते हैं॥ १११॥ | | सिद्धलिङ्गाश्रमं भग्नं दृष्ट्वा राज्ञे निवेदयेत्।<br>स्वतो वा परतो वापि ये कुर्वन्ति यथा तथा॥ ११२ | जो सिद्धलिङ्गाश्रमको भग्न देखकर [उसके उद्धारके लिये] राजासे निवेदन करता है और जो लोग स्वयं अथवा दूसरोंके माध्यमसे इसे व्यवस्थित करते हैं, वे मनुष्य सुखोंके भागी होते हैं और अन्तमें मोक्षके भाजन होते हैं॥ ११२१/२॥ | | ते भोगानां नराः पात्रमन्ते मोक्षस्य भाजनाः।<br>मोक्षप्रदायिनं लिङ्गं यत्कार्यार्थस्य लिप्सया॥ ११३<br><br>राजप्रतिग्रहासक्ताः कृतघ्नान् पूजयन्ति ये।<br>ते रुद्रशापनिर्दग्धाः पतन्ति नरके ध्रुवम्॥ ११४ | राजप्रतिग्रहमें निरत जो लोग अपने स्वार्थकी अभिलाषासे मोक्ष प्रदान करनेवाले लिङ्गका पूजन-सत्कार आदि नहीं करते हैं, अपितु कृतघ्नोंका सम्मान करते हैं, वे रुद्रके शापसे दग्ध होकर निश्चित रूपसे नरकमें पड़ते हैं॥ ११३-११४॥ | | ये पुनः सिद्धलिङ्गानां प्रासादानां स्वशक्तितः।<br>कुर्वन्ति पूजां सत्कारं ते मुक्ता नात्र संशयः॥ ११५ | जो लोग अपने सामर्थ्यके अनुसार सिद्धलिङ्गोंके प्रासादोंका पूजन तथा सत्कार करते हैं; वे मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ ११५॥ | | कालेश्वरे तु यो देवि नरः कारयते पुरम्।<br>एकविंशकुलोपेतो रुद्रलोके वसेच्चिरम्॥ ११६ | हे देवि! जो मनुष्य कालेश्वरमें पुरका निर्माण कराता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंसहित रुद्रलोकमें दीर्घकालतक वास करता है॥ ११६॥ | | तत्र पूजा जपो होमः कालेशे क्रियते हि यत्।<br>तत्र दीपप्रदानेन ज्ञानचक्षुर्भवेन्नरः॥ ११७<br><br>प्राप्नोति धूपदानेन तत्स्थानं रुद्रसेवितम्।<br>जागरं ये प्रकुर्वन्ति कालेशस्यैव चाग्रतः॥ ११८ | वहाँ कालेश्वरमें जो भी पूजन, जप, होम किया जाता है, वह फलदायक होता है। वहाँ दीपदान करनेसे मनुष्य ज्ञानचक्षु हो जाता है और धूपदानसे रुद्रसेवित स्थान प्राप्त करता है॥ ११७१/२॥ | | ते मृता वृषभारूढाः शूलहस्तास्त्रिलोचनाः।<br>भूत्वा रुद्रसमा भद्रे रुद्रलोकं तु ते गताः॥ ११९ | जो लोग कालेश्वरके समक्ष [रात्रि] जागरण करते हैं, हे भद्रे! वे मरनेपर वृषभपर आरूढ होकर हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए तीन नेत्रोंसे युक्त हो रुद्रतुल्य होकर रुद्रलोकको जाते हैं॥ ११८-११९॥ | | बहुनात्र किमुक्तेन कालेशे देवि यत्कृतम्।<br>तत्सर्वमक्षयं देवि पुनर्जन्मनि जन्मनि॥ १२० | हे देवि! अधिक कहनेसे क्या लाभ, हे देवि! कालेश्वरमें जो भी किया जाता है, वह सब कुछ जन्म-जन्ममें अक्षय होता है॥ १२०॥ |