भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
अध्याय ७ ] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन७८९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गणैस्तु मम धर्मज्ञैः श्रेष्ठानि सुमहन्ति च।<br>तस्य पूर्वेण कूपस्तु तिष्ठते सुमहान् प्रिये॥ ९४<br>तस्मिन् कूपे जलं स्पृश्य पूतो भवति मानवः।<br>चण्डेश्वरस्य पूर्वं तु स्थितं चित्रेश्वरं शुभम्॥ ९५[हे देवि!] उसीके समीपमें मेरे धर्मज्ञ गणोंके द्वारा श्रेष्ठ तथा अति महान् लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। हे प्रिये! उसके पूर्वमें एक अति महान् कूप स्थित है, उस कूपके जलका स्पर्श करके मनुष्य पवित्र हो जाता है॥ ९३-९४ १/२॥<br>चण्डेश्वरके पूर्वमें शुभ चित्रेश्वरलिङ्ग स्थित है,
तेन दृष्टेन देवेशि चित्रस्य समतां व्रजेत्।<br>चित्रेश्वरसमीपे तु स्थितं कालेश्वरं महत्॥ ९६<br>तेन दृष्टेन देवेशि कालं वञ्चति मानवः॥ ९७हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य चित्रकी समता प्राप्त करता है। चित्रेश्वरके समीपमें महान् कालेश्वरलिङ्ग स्थित है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य कालको भी वंचित कर देता है॥ ९५-९७॥
देव्युवाच<br>कथं कालेश्वरो देवः केन वा वञ्चितः प्रभुः।<br>कस्मिन् स्थाने तु कः सिद्धस्तन्मे ब्रूहि सुरेश्वर॥ ९८देवी बोलीं—हे सुरेश्वर! प्रभु कालेश्वरदेव किस प्रकार तथा किसके द्वारा वंचित किये गये और किस स्थानपर कौन सिद्ध हुआ? इसे मुझे बताइये॥ ९८॥
ईश्वर उवाच<br>तस्मिन् स्थाने पुरा भद्रे पिङ्गाक्षो नाम वै मुनिः।<br>ज्ञानस्य वक्ता पञ्चार्थे लोके पाशुपतः स्थितः॥ ९९ईश्वर बोले—हे भद्रे! पूर्वकालमें उस स्थानमें पंचभूतात्मक लोकमें ज्ञानके वक्ता पशुपतिभक्त पिंगाक्ष नामक मुनि रहते थे॥ ९९॥
तेन चैव पुरा भद्रे लिङ्गेऽस्मिन् स प्रसादितः।<br>ततो लिङ्गप्रभावेण कालं वञ्चितवान् मुनिः॥ १००हे भद्रे! उन्होंने ही पूर्वकालमें इस लिङ्गमें शिवको प्रसन्न किया था, इसीलिये उन मुनिने लिङ्गके प्रभावसे कालको वंचित किया॥ १००॥
नान्ततो दृश्यते काल ईश्वररासक्तचेतसः।<br>तत्र स्थित्वा तु सुमहत्कालं यः कालयेत्प्रजाः॥ १०१<br>न तस्य क्रमितुं शक्तः कालो वै घोररूपिणः।ईश्वरमें आसक्त चित्तवालेको अन्ततक काल दृष्टिगत नहीं होता है। [हे देवि!] वहाँ सन्तानसहित रहकर जो दीर्घकालतक समय व्यतीत करता है, घोररूपी काल उसपर आक्रमण करनेमें समर्थ नहीं होता है॥ १०१ १/२॥
ततः प्रभृति येऽन्येऽपि तस्मिन्नायतने स्थिताः॥ १०२<br>तेषां नाक्रमते कालः वर्षलक्षायुतैरपि।<br>अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि रहस्यं वरवर्णिनि॥ १०३उसी समयसे जो अन्य लोग भी उस आयतनमें स्थित रहते हैं, लाखों वर्षोंमें भी काल उनपर आक्रमण नहीं कर सकता है। हे वरवर्णिनि! मैं आपको दूसरा रहस्य भी बताऊँगा॥ १०२-१०३॥
तस्य देवस्य चाग्रे तु कूपस्तिष्ठति वै श्रुतः।<br>तत्र कालोदकं नाम उदकं देवि तिष्ठति॥ १०४<br>तस्यैव प्राशनाद्देवि पूतो भवति मानवः।<br>यैस्तु तत्रोदकं पीतं नरैः स्त्रीभिश्च कर्मभिः॥ १०५<br>स्वयं देवेन शर्वेण त्रिशूलाङ्केन चाङ्कितः।<br>न तेषां परिवर्तों वै कल्पकोटिशतैरपि॥ १०६उस लिङ्गके आगे एक प्रसिद्ध कूप स्थित है, हे देवि! वहाँपर कालोदक नामक उदक स्थित है, हे देवि! उसके प्राशन (पान)-से मनुष्य पवित्र हो जाता है। जिन पुरुषों तथा स्त्रियोंने पुण्यकर्मोंके प्रभावसे उस जलका पान कर लिया, उन्हें मानो स्वयं भगवान् शिवने त्रिशूलांकसे अंकित कर दिया, सैकड़ों-करोड़ कल्पोंमें भी उनका पुनर्जन्म नहीं होता है। उसका पान करके मनुष्य भवबन्धनसे होनेवाले भयसे मुक्त हो जाते हैं॥ १०४-१०६ १/२॥
यत्पीत्वा भवबन्धोत्थभयं मुञ्चन्ति मानवाः।<br>एतद्देवि रहस्यं तु कालोदकमुदाहृतम्॥ १०७हे देवि! मैंने इस रहस्यमय कालोदकका वर्णन
७९०श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

| दर्शनात्तस्य देवस्य महापातकिनोऽपि ये।<br>तेऽपि भोगान् समश्नन्ति न तेषां क्रमते भवः॥ १०८ | कर दिया। [हे देवि!] जो महापातकी हैं, वे भी उस देवके दर्शनसे सुखोंको प्राप्त करते हैं और संसार उनपर आक्रमण नहीं करता है॥ १०७-१०८॥ | | तल्लिङ्गं सर्वलिङ्गानामुत्तमं परिकीर्तितम्।<br>दर्शनात्तस्य लिङ्गस्य रुद्रत्वं याति मानवः॥ १०९ | वह लिङ्ग सभी लिङ्गोंमें श्रेष्ठ कहा गया है, उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य रुद्रत्व प्राप्त करता है॥ १०९॥ | | तत्र वापि हि यद्दत्तं दानं रुद्ररतात्मनाम्।<br>तद्वै महाफलं तेषां यच्छते भावितात्मनाम्॥ ११० | वहाँपर जो भी दान किया जाता है, वह उन भक्तिमय चित्तवालों तथा रुद्रमें रत मनवालोंको महाफल प्रदान करता है॥ ११०॥ | | खण्डस्फुटितसंस्कारं तत्र कुर्वन्ति ये नराः।<br>रुद्रलोकं समासाद्य मोदन्ते सुखिनः सदा॥ १११ | जो मनुष्य वहाँपर खण्डस्फुटित संस्कार करते हैं, वे रुद्रलोक प्राप्त करके सदा आनन्दित तथा सुखी रहते हैं॥ १११॥ | | सिद्धलिङ्गाश्रमं भग्नं दृष्ट्वा राज्ञे निवेदयेत्।<br>स्वतो वा परतो वापि ये कुर्वन्ति यथा तथा॥ ११२ | जो सिद्धलिङ्गाश्रमको भग्न देखकर [उसके उद्धारके लिये] राजासे निवेदन करता है और जो लोग स्वयं अथवा दूसरोंके माध्यमसे इसे व्यवस्थित करते हैं, वे मनुष्य सुखोंके भागी होते हैं और अन्तमें मोक्षके भाजन होते हैं॥ ११२१/२॥ | | ते भोगानां नराः पात्रमन्ते मोक्षस्य भाजनाः।<br>मोक्षप्रदायिनं लिङ्गं यत्कार्यार्थस्य लिप्सया॥ ११३<br><br>राजप्रतिग्रहासक्ताः कृतघ्नान् पूजयन्ति ये।<br>ते रुद्रशापनिर्दग्धाः पतन्ति नरके ध्रुवम्॥ ११४ | राजप्रतिग्रहमें निरत जो लोग अपने स्वार्थकी अभिलाषासे मोक्ष प्रदान करनेवाले लिङ्गका पूजन-सत्कार आदि नहीं करते हैं, अपितु कृतघ्नोंका सम्मान करते हैं, वे रुद्रके शापसे दग्ध होकर निश्चित रूपसे नरकमें पड़ते हैं॥ ११३-११४॥ | | ये पुनः सिद्धलिङ्गानां प्रासादानां स्वशक्तितः।<br>कुर्वन्ति पूजां सत्कारं ते मुक्ता नात्र संशयः॥ ११५ | जो लोग अपने सामर्थ्यके अनुसार सिद्धलिङ्गोंके प्रासादोंका पूजन तथा सत्कार करते हैं; वे मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ ११५॥ | | कालेश्वरे तु यो देवि नरः कारयते पुरम्।<br>एकविंशकुलोपेतो रुद्रलोके वसेच्चिरम्॥ ११६ | हे देवि! जो मनुष्य कालेश्वरमें पुरका निर्माण कराता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंसहित रुद्रलोकमें दीर्घकालतक वास करता है॥ ११६॥ | | तत्र पूजा जपो होमः कालेशे क्रियते हि यत्।<br>तत्र दीपप्रदानेन ज्ञानचक्षुर्भवेन्नरः॥ ११७<br><br>प्राप्नोति धूपदानेन तत्स्थानं रुद्रसेवितम्।<br>जागरं ये प्रकुर्वन्ति कालेशस्यैव चाग्रतः॥ ११८ | वहाँ कालेश्वरमें जो भी पूजन, जप, होम किया जाता है, वह फलदायक होता है। वहाँ दीपदान करनेसे मनुष्य ज्ञानचक्षु हो जाता है और धूपदानसे रुद्रसेवित स्थान प्राप्त करता है॥ ११७१/२॥ | | ते मृता वृषभारूढाः शूलहस्तास्त्रिलोचनाः।<br>भूत्वा रुद्रसमा भद्रे रुद्रलोकं तु ते गताः॥ ११९ | जो लोग कालेश्वरके समक्ष [रात्रि] जागरण करते हैं, हे भद्रे! वे मरनेपर वृषभपर आरूढ होकर हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए तीन नेत्रोंसे युक्त हो रुद्रतुल्य होकर रुद्रलोकको जाते हैं॥ ११८-११९॥ | | बहुनात्र किमुक्तेन कालेशे देवि यत्कृतम्।<br>तत्सर्वमक्षयं देवि पुनर्जन्मनि जन्मनि॥ १२० | हे देवि! अधिक कहनेसे क्या लाभ, हे देवि! कालेश्वरमें जो भी किया जाता है, वह सब कुछ जन्म-जन्ममें अक्षय होता है॥ १२०॥ |

अध्याय ७] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, वालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन ७९१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतत्ते सर्वमाख्यातं भूयो विस्तरतो मया।<br>न कस्यचिदिहाख्यातं गोपनीयं प्रयत्नतः॥ १२१मैंने यह सब विस्तारसे आपसे कह दिया, मैंने इसे किसीको भी नहीं बताया था, आपको इसे प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये॥ १२१॥
कालेश्वरस्य देवस्य शिवस्यायतनं शुभम्।<br>कालेश्वरसमीपे तु दक्षिणे वरवर्णिनि॥ १२२<br>मृत्युना स्थापितं लिङ्गं सर्वरोगविनाशनम्।<br>कूपस्य चोत्तरे भागे महालिङ्गानि सुव्रते॥ १२३यह कालेश्वर देव शिवका आयतन [अत्यन्त] शुभ है। हे वरवर्णिनि! कालेश्वरके समीप दक्षिण दिशामें मृत्युके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग विद्यमान है, वह सभी रोगोंका नाश करनेवाला है॥ १२२१/२॥
एकं दक्षेश्वरं नाम द्वितीयं कश्यपेश्वरम्।<br>पश्चान्मुखं तु यल्लिङ्गं तद्दक्षेश्वरसंज्ञकम्॥ १२४हे सुव्रते! कूपके उत्तरभागमें [अनेक] महालिङ्ग स्थित हैं। उनमें एक दक्षेश्वर तथा दूसरा कश्यपेश्वर नामक लिङ्ग है। जो पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग है, वह दक्षेश्वर नामवाला है॥ १२३-१२४॥
दक्षेश्वरस्य पूर्वेण महाकालस्तु तिष्ठति।<br>कुण्डे स्नानं नरः कृत्वा महाकालं तु योऽर्चयेत्॥ १२५<br>अर्चितं तेन सुश्रोणि जगदेतच्चराचरम्।<br>दक्षिणस्यां दिशि तथा तस्य कुण्डस्य वै तटे॥ १२६दक्षेश्वरके पूर्वमें महाकाल स्थित हैं। हे सुश्रोणि! जो मनुष्य कुण्डमें स्नान करके महाकालका अर्चन करता है, उसने मानो इस चराचर जगत्का पूजन कर लिया॥ १२५१/२॥
स्थापितं देवलिङ्गं तु अन्तकेन महात्मना।<br>महत्फलमवाप्नोति तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ १२७उसके दक्षिण दिशामें तथा कुण्डके तटपर ही महात्मा अन्तकके द्वारा देवलिङ्ग स्थापित किया गया है, उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य महान् फल प्राप्त करता है॥ १२६-१२७॥
अन्तकेश्वरसामीप्ये लिङ्गं वै दक्षिणे स्थितम्।<br>शक्रेश्वरेति नामानं स्थापितं शक्रहस्तिना॥ १२८अन्तकेश्वरके समीप दक्षिणमें शक्रेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह शक्रहस्तीके द्वारा स्थापित किया गया है॥ १२८॥
तस्यैव दक्षिणे भागे मातलीश्वरमुत्तमम्।<br>संस्थापितं मातलिना सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ १२९उसीके दक्षिण भागमें उत्तम मातलीश्वर [नामक] लिङ्ग है, सभी प्रकारका सुख प्रदान करनेवाला वह लिङ्ग मातलिके द्वारा स्थापित किया गया है॥ १२९॥
देवस्य चाग्रतः कुण्डे तत्र तीर्थं वरानने।<br>हस्तिपालेश्वरस्याग्रे कुण्डे तिष्ठति भामिनि॥ १३०<br>तप्तं यत्र पुरा भद्रे अन्तकेनान्तकारिणा।<br>हस्तीश्वरस्य पूर्वेण लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ १३१<br>विजयेश्वरनामानं सुरसिद्धैस्तु पूजितम्।<br>महाकालस्य कुण्डं तु उत्तरे वरवर्णिनि॥ १३२हे वरानने! वहाँपर देवके आगे कुण्डमें एक तीर्थ विद्यमान है, हे भामिनि! हस्तिपालेश्वरके आगे कुण्डमें वह स्थित है, जहाँ हे भद्रे! अन्त (मृत्यु) करनेवाले अन्तकके द्वारा पूर्वकालमें तप किया गया था। हस्तीश्वरके पूर्वमें देवताओं तथा सिद्धोंद्वारा पूजित विजयेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे वरवर्णिनि! उत्तरमें महाकालका कुण्ड है॥ १३०-१३२॥
बलिनाराधितश्चाहं तस्मिन् स्थाने तु पार्वति।<br>बलिकुण्डं तु विख्यातं वाराणस्यां मम प्रियम्॥ १३३<br>तस्य कुण्डस्य पूर्वेण लिङ्गं स्थापितवान् बलिः॥ १३४हे पार्वति! बलिने उस स्थानमें मेरी आराधना की थी। वाराणसीमें मेरा प्रिय बलिकुण्ड विख्यात है, उस कुण्डके पूर्वमें बलिने मेरे लिङ्गकी स्थापना की थी॥ १३३-१३४॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनावर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनावर्णन' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥

८- कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन

७९२श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

आठवाँ अध्याय

कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन

| विद्याविघ्नेश्वरा रुद्राः शिवा ये च प्रकीर्तिताः।<br>कृत्तिवासेश्वरो यत्र तत्र सर्वे व्यवस्थिताः॥ १ | [ ईश्वर बोले— ] जो विद्याविघ्नेश्वर रुद्र शिव कहे गये हैं, वे सब जहाँ कृत्तिवासेश्वर हैं, वहाँ स्थित हैं॥ १॥ | | तस्मिन् स्थाने महादैत्यो हस्ती भूत्वा ममान्तिकम्।<br>तस्य कृत्तिं विदार्याशु करिणं स्वञ्जनप्रभम्॥ २<br>वासं तु कृतवान् पूर्वं कृत्तिवासस्ततो ह्यहम्।<br>अविमुक्ते स्थितश्चाहं तस्मिन् स्थाने महामुने॥ ३ | उस स्थानमें एक महादैत्य हाथी बनकर मेरे पास आया था, तब मैंने अंजनकी प्रभावाले उस हाथीको शीघ्र ही विदीर्ण करके उसके चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण कर लिया, तबसे मैं कृत्तिवास नामवाला हो गया और हे महामुने! मैं उस अविमुक्त स्थानमें स्थित हूँ॥ २-३॥ | | लिङ्गं दारुवने गुह्यमृषिसङ्घैस्तु पूजितम्।<br>पश्चिमाभिमुखश्चाहं तस्मिन्नायतने स्थितः॥ ४ | दारुवनमें ऋषियोंद्वारा पूजित एक गुह्य लिङ्ग है, मैं उस आयतनमें पश्चिमकी ओर मुख किये हुए स्थित हूँ॥ ४॥ | | अन्तकेश्वरलिङ्गं तु मम चाग्रे स्थितं शुभम्।<br>उत्तरे मम लिङ्गं तु स्थापितं शक्रहस्तिना॥ ५ | मेरे सामने शुभ अन्तकेश्वरलिङ्ग स्थित है। मेरे उत्तरमें शक्रहस्तीके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ ५॥ | | मातलीश्वरलिङ्गं तु दक्षिणेन स्थितं मम।<br>मम पूर्वेण कूपस्तु नानासिद्धिसमन्वितः॥ ६<br>अणिमाद्यास्तथाष्टौ च सिद्धयस्तत्र संस्थिताः॥ ७ | मातलीश्वरलिङ्ग मेरे दक्षिणमें स्थित है। मेरे पूर्वमें विविध सिद्धियोंसे युक्त एक कूप विराजमान है, अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ वहाँ विद्यमान हैं॥ ६-७॥ | | ये ते पाशुपतास्तत्र मध्यमेश्वरसंस्थिताः।<br>तेषामनुग्रहार्थं च कृत्तिवासाः स्थितः पुरा॥ ८ | जो भी पाशुपत हैं, वे वहाँ मध्यमेश्वरमें रहते हैं, उनके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये मैं कृत्तिवासरूपमें वहाँ स्थित हूँ॥ ८॥ | | रुद्राणां तु शरीरं तु मध्यमेश्वरमीश्वरम्।<br>कृत्तिवासाः शिवः प्राहुरेतद्गुह्यतरं मम॥ ९ | भगवान् मध्यमेश्वर रुद्रोंके शरीर हैं। कृत्तिवास ही शिव हैं। इसे मेरा परम गुह्य लिङ्ग कहा गया है॥ ९॥ | | अन्ये च बहवः सिद्धा ऋषयस्तत्र संस्थिताः।<br>उपासन्ति च मां नित्यं मद्भावगतमानसाः॥ १० | अन्य बहुत-से सिद्ध ऋषि वहाँ रहते हैं और मेरी भक्तिसे युक्त चित्तवाले होकर नित्य मेरी उपासना करते हैं॥ १०॥ | | वाराणस्यां प्रमुच्यन्ते ये जनास्तत्र संस्थिताः।<br>कृमिकीटाः प्रमुच्यन्ते महापातकिनश्च ये॥ ११<br>स्मरणाद्विप्र लिङ्गस्य पापं वै भस्मसाद्भवेत्॥ १२ | जो लोग वाराणसीमें वहाँ रहते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं। कृमि-कीट तथा [अन्य] जो महापातकी हैं, वे भी मुक्त हो जाते हैं। हे विप्र! लिङ्गके स्मरणसे पाप भस्मसात् हो जाता है॥ ११-१२॥ | | कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं ये यजन्ति शुभान्विताः।<br>ते रुद्रस्य शरीरे तु प्रविष्टा अपुनर्भवाः॥ १३<br>अनेनैव शरीरेण प्राप्ता निर्वाणमुत्तमम्।<br>बहूनि तत्र तीर्थानि संख्या कर्तुं न शक्यते॥ १४ | कल्याणकी कामनावाले जो लोग कृत्तिवासेश्वर-लिङ्गकी पूजा करते हैं, वे रुद्रके शरीरमें प्रविष्ट हो जाते हैं और पुनर्जन्मरहित हो जाते हैं, वे इसी शरीरसे उत्तम निर्वाण प्राप्त कर लेते हैं॥ १३ १/२॥ |

अध्याय ८ ] कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन ७९३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दशकोटिसहस्त्राणि तीर्थान्यत्रैव वै मुने।<br>कृत्तिवासेश्वरो यत्र तत्र सर्वे व्यवस्थिताः॥ १५<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु सान्निध्यं त्रिकालं नात्र संशयः।<br>ब्रह्मविष्णुसुरेन्द्राणामप्रकाशयं कृतं मया॥ १६<br>यत्र तीर्थान्यनेकानि कृतानि बहुभिर्द्विजैः।<br>पुलस्त्याद्यैर्महाभागैर्लोमशाद्यैर्महात्मभिः।<br>कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं न जानन्ति सुरासुराः॥ १७वहाँ अनेक तीर्थ हैं, उनकी संख्या नहीं बतायी जा सकती है, हे मुने! वहींपर दस हजार करोड़ तीर्थ हैं। जहाँ कृत्तिवासेश्वरलिङ्ग है, वहाँ वे सभी [तीर्थ] विद्यमान हैं॥ १४-१५॥<br><br>उस लिङ्गमें त्रिकाल उनका सान्निध्य रहता है, इसमें सन्देह नहीं है। मैंने ब्रह्मा, विष्णु तथा सुरेन्द्रसे भी इसे प्रकाशित नहीं किया॥ १६॥<br><br>जहाँ बहुत-से द्विजोंने तथा पुलस्त्य, लोमश आदि भाग्यशाली महात्माओंके द्वारा अनेक तीर्थ निर्मित किये गये हैं, उस कृत्तिवासेश्वरलिङ्गको देवता तथा असुर भी नहीं जानते हैं॥ १७॥
भृगुरुवाच<br>कृते त्रेताद्वापरे च कलौ च परमेश्वरम्।<br>महागुह्यातिगुह्यं च संसारार्णवतारकम्॥ १८<br>केन कार्येण देवेश त्वयेदं न प्रकाशितम्।<br>कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गमविमुक्ते तु संस्थितम्॥ १९भृगु बोले—सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुगमें यह परम ऐश्वर्यसम्पन्न और गुह्य-से-गुह्य लिङ्ग संसारसागरसे पार करनेवाला है, हे देवेश! आपने अविमुक्त [क्षेत्र]-में स्थित इस कृत्तिवासेश्वर लिङ्गको किस कारणसे प्रकाशित नहीं किया?॥ १८-१९॥
ईश्वर उवाच<br>दशकोटिसहस्त्राणि आगच्छन्ति दिने दिने।<br>धर्मक्रियाविनिर्मुक्ताः सत्यशौचविवर्जिताः॥ २०<br>देवद्विजगुरून्नित्यं निन्दन्तो भक्तिवर्जिताः।<br>मायामोहसमायुक्ता दम्भमोहसमन्विताः॥ २१<br>शूद्रान्ननिरता विप्रा विह्वला रतिलालसाः।<br>कृत्तिवासेश्वरं प्राप्य ते सर्वे विगतज्वराः॥ २२<br>संसारभयनिर्मुक्ताः सर्वपापविवर्जिताः।<br>सुखेन मोक्षमायान्ति यथा सुकृतिनस्तथा॥ २३<br>दिव्यैर्विमानैरारूढाः किङ्किणीरवकान्वितैः।<br>देवानां भुवनं लभ्यं ते यान्ति परमं पदम्॥ २४<br>जन्मान्तरसहस्रेण मोक्षो लभ्येत वा न वा।<br>एकेन जन्मना तत्र कृत्तिवासे तु लभ्यते॥ २५ईश्वर बोले—दस हजार करोड़ तीर्थ यहाँ प्रतिदिन आते हैं, धर्मक्रियासे विहीन, सत्य-शौचसे रहित, देवताओं, द्विजों तथा गुरुओंकी सदा निन्दा करनेवाले, भक्तिहीन, मायामोहसे युक्त, दम्भ-मोहसे समन्वित, शूद्रोंके अन्नका सेवन करनेवाले, विह्वल तथा रतिकी लालसावाले सभी विप्र कृत्तिवासेश्वरमें आकर सन्तापरहित हो जाते हैं॥ २०-२२॥<br><br>संसारके भयसे मुक्त तथा सभी पापोंसे रहित होकर वे पुण्यात्माओंकी भाँति सुखपूर्वक मोक्ष प्राप्त करते हैं॥ २३॥<br><br>सुन्दर किंकिणियोंकी ध्वनिसे समन्वित दिव्य विमानोंमें बैठकर वे देवताओंके लिये सुलभ परम पद प्राप्त करते हैं। हजारों जन्मोंमें मोक्ष मिले अथवा नहीं, किंतु कृत्तिवासमें एक ही जन्ममें [मोक्ष] प्राप्त हो जाता है॥ २४-२५॥
पूर्वजन्मकृतं पापं तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्।<br>तत्र सिद्धेश्वरं नाम मुखलिङ्गं तु संस्थितम्॥ २६<br>अन्तकेश्वरदेवस्य स्थितं चैवोत्तेरेण तु।<br>आलयं सर्वसिद्धानां तत्स्थानं परमं महत्॥ २७<br>अव्ययं शाश्वतं दिव्यं विरजं ब्रह्मणालयम्।<br>शक्तिमूर्तिस्थितं शांतं शिवं परमकारणम्॥ २८<br>अव्यक्तं शाश्वतं सूक्ष्मं सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं महत्॥ २९उस लिङ्गके दर्शनसे पूर्वजन्ममें किया गया पाप नष्ट हो जाता है। वहाँ सिद्धेश्वर नामक मुखलिङ्ग भी स्थित है, वह अन्तकेश्वरदेवके उत्तरमें है। वह स्थान सभी सिद्धोंका आलय, अति महान्, अव्यय, शाश्वत, दिव्य, विशुद्ध, ब्रह्माका आलय, शक्ति-मूर्तिस्थित, शान्त, कल्याणमय, परमकारणस्वरूप, अव्यक्त, सनातन, सूक्ष्म तथा सूक्ष्मसे भी परम सूक्ष्म है॥ २६-२९॥
श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
७९४
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ईश्वर उवाच<br>एतद्दारुवनस्थानं कलौ देवस्य गीयते।<br>परात्परं तु यज्ज्ञानं मोक्षमार्गप्रदायकम्॥ ३०<br>प्राप्यते द्विजशार्दूल कृत्तिवासे न संशयः।<br>कृते तु त्र्यम्बकं प्रोक्तं त्रेतायां कृत्तिवाससम्॥ ३१**ईश्वर बोले—**यह दारुवन स्थान कलियुगमें शिवका स्थान कहा जाता है। हे द्विजश्रेष्ठ! जो मोक्षमार्ग देनेवाला परात्पर ज्ञान है, वह कृत्तिवासमें प्राप्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है। सत्ययुगमें [शिवका नाम] त्र्यम्बक तथा त्रेतामें कृत्तिवास कहा गया है॥ ३०-३१॥
माहेश्वरं तु देवस्य द्वापरे नाम गीयते।<br>हस्तिपालेश्वरं नाम कलौ सिद्धैस्तु गीयते॥ ३२द्वापरमें शिवका नाम माहेश्वर कहा जाता है। कलियुगमें सिद्धोंके द्वारा शिवका नाम हस्तिपालेश्वर कहा जाता है॥ ३२॥
दण्डिरूपधरेणैव देवदेवेन शम्भुना।<br>द्विजेष्वनुग्रहश्चात्र तत्र स्थाने कृतः पुरा॥ ३३<br>युगे युगे तु तत्त्वज्ञा ब्राह्मणाः शान्तचेतसः।<br>उपासते च मां नित्यं जपन्ति शतरुद्रियम्॥ ३४पूर्वकालमें देवदेव शम्भुने दण्डीका रूप धारण करके उस स्थानपर द्विजोंपर अनुग्रह किया था। शान्त चित्तवाले तत्त्वज्ञ ब्राह्मण प्रत्येक युगमें [वहाँ] नित्य मेरी उपासना करते हैं और शतरुद्रिय मन्त्रका जप करते हैं॥ ३३-३४॥
आदेहपतनाद्विप्रास्तस्मिन् क्षेत्र उपासकाः।<br>जपन्ति रुद्राध्यायं ते स शिवः कृत्तिवाससम्॥ ३५<br>तेषां देवः सदा तुष्टो दिव्यान् लोकान् प्रयच्छति।<br>ये ते जप्ता मया रुद्राः शङ्कुकर्णालये पुरा॥ ३६<br>तेऽविमुक्ते तु तिष्ठन्ति कृत्तिवासे न संशयः।<br>द्वारं यत् सांख्ययोगानां सा तेषां वसतिः स्मृता॥ ३७वे उपासक विप्र देहके पतनपर्यन्त (मृत्युकालतक) उस क्षेत्रमें रुद्राध्यायका जप करते हैं, वे कृत्तिवासेश्वर भगवान् शिव उनके ऊपर प्रसन्न होकर उन्हें सदा दिव्य लोक प्रदान करते हैं। मैंने पूर्वकालमें शंकुकर्णालयमें जिन रुद्रोंका जप किया था, वे अविमुक्त [क्षेत्र] कृत्तिवासमें स्थित हैं, इसमें संशय नहीं है। जो सांख्ययोगोंका द्वार है, वह उन सबका निवासस्थान कहा गया है॥ ३५–३७॥
श्यामास्तु पुरुषा रौद्रा विद्युता हरिपिङ्गलाः।<br>अशरीराः शरीरा ये ते च सृष्टा मया पुरा॥ ३८<br>नीलकण्ठाः श्वेतमुखा बिम्बोष्ठाश्च कपर्दिनः।<br>हरित्केशाः शृङ्गिणश्च लम्बोष्ठास्तिग्महेतयः॥ ३९<br>असंख्याः परिसंख्यातास्तान्यन्ये च सहस्रशः।<br>तेऽविमुक्ते तु तिष्ठन्ति कृत्तिवाससमीपतः॥ ४०मैंने पूर्वकालमें श्याम, रौद्र, वैद्युत, हरिपिंगल, अशरीरी, शरीरी, नीलकण्ठ, श्वेतमुख, बिम्बोष्ठ, कपर्दी, हरित्केश, शृंगी, लम्बोष्ठ, तिग्महेति नामवाले जिन असंख्य तथा अन्य हजारों पुरुषोंकी सृष्टि की थी, वे कृत्तिवासके समीप अविमुक्तमें रहते हैं॥ ३८—४०॥
रुद्राणां तु शिवो ज्ञेयं कृत्तिवासेश्वरं परम्।<br>तेन तैः प्रेरिता यान्ति दुष्प्रापमकृतात्मभिः॥ ४१श्रेष्ठ कृत्तिवासेश्वरको रुद्रोंका शिव जानना चाहिये, अतः उन [रुद्रों]-के द्वारा प्रेरित किये गये भक्त पुण्यरहित आत्मावालोंके द्वारा दुष्प्राप्य लोकको जाते हैं॥ ४१॥
अशाश्वतमिदं ज्ञात्वा मानुष्यं बहुकिल्बिषम्।<br>अविमुक्ते तु वस्तव्यं जप्तव्यं शतरुद्रियम्॥ ४२<br>कृत्तिवासेश्वरो देवो द्रष्टव्यश्च पुनः पुनः।[इसलिये] अनेक पापोंसे युक्त इस मानवशरीरको नश्वर समझकर अविमुक्तमें वास करना चाहिये, शतरुद्रियमन्त्रका जप करना चाहिये और बार-बार कृत्तिवासेश्वरदेवका दर्शन करना चाहिये॥ ४२<sup></sup>/<sub></sub>
यदिच्छेत्तारकं ज्ञानं शाश्वतं चामृतप्रदम्॥ ४३<br>एतत्सर्वं प्रकर्तव्यं यदिच्छेन्मामकं पदम्॥ ४४यदि कोई शाश्वत तथा अमृत प्रदान करनेवाले तारक ज्ञानकी इच्छा करता हो और यदि मेरे लोककी इच्छा करता हो, तो उसे यह सब करना चाहिये॥ ४३-४४॥
गजवक्त्रः स्वयम्भूतस्तिष्ठत्यत्र विनायकः।<br>कूष्माण्डराजशम्भुश्च जयन्तश्च मदोत्कटः॥ ४५यहाँपर स्वयम्भू गजानन, विनायक, कूष्माण्डराज-
अध्याय ८ ]कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन७९५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शम्भु, जयन्त तथा मदोत्कट स्थित हैं॥४५॥
सिंहव्याघ्रमुखाः केचिद्विकटाः कुब्जवामनाः।<br>यत्र नन्दी महाकालः चित्रघण्टो महेश्वरः॥४६<br>दृगिचण्डेश्वरश्चैव घण्टाकर्णो महाबलः।<br>एते चान्ये च बहवो गणा रुद्रेश्वरस्य वै॥४७<br>रक्षन्ति सततं सर्वे अविमुक्तं हि मे गृहम्।यहाँ कुछ सिंह-व्याघ्रके समान मुखवाले, विकट, टेढ़े तथा बौने [गण] भी विद्यमान हैं। यहाँ नन्दी, महाकाल, चित्रघण्ट, महेश्वर, दृगिचण्डेश्वर, घण्टाकर्ण, महाबल—ये सब तथा रुद्रेश्वरके अन्य बहुत-से गण मेरे अविमुक्त गृहकी निरन्तर रक्षा करते हैं॥४६-४७½॥
अयनं तूत्तरं ज्ञेयं दृगिचण्डेश्वरं मम॥४८<br>दक्षिणं शङ्कुकर्णं तु ओङ्कारं विषुवं मम।<br>दशकोट्यस्तु तीर्थानां संविशन्त्यथ पर्वणि॥४९दृगिचण्डेश्वरको मेरा उत्तर अयन, शंकुकर्णको दक्षिण अयन और ओंकारको मेरा विषुव जानना चाहिये। दस करोड़ तीर्थ पर्वके अवसरपर यहाँ प्रवेश करते हैं॥४८-४९॥
रहस्यं विप्रमन्त्राणां गोपनीयं प्रयत्नतः।<br>यच्च पाशुपतं प्रोक्तं पदं सम्यङ्निषेवितम्॥५०<br>पूजनात्तदवाप्नोति षण्मासाभ्यन्तरेण तु।<br>ममैव प्रीतिरतुला तस्मिन्नायतने सदा॥५१विप्र-मन्त्रोंके रहस्यको प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये। भलीभाँति निषेवित जो पाशुपतपद कहा गया है, वह इसके पूजनसे छः महीनोंके भीतर ही प्राप्त हो जाता है। उस आयतनमें मेरी अतुलनीय प्रीति सर्वदा रहती है॥५०-५१॥
अन्ये च बहवस्तत्र सिद्धलिङ्गाश्च सुव्रते।<br>सर्वेषामेव स्थानानां तत्स्थानं तु ममाधिकम्।<br>ज्ञात्वा कलियुगं घोरमप्रकाश्यं कृतं मया॥५२हे सुव्रते! वहाँपर अन्य बहुत-से सिद्ध लिङ्ग स्थित हैं। वह स्थान मेरे सभी स्थानोंसे बढ़कर है। कलियुगको भयानक जानकर मैंने इसे प्रकाशित नहीं किया॥५२॥
न सा गतिः प्राप्यते यज्ञदानै-<br>स्तीर्थाभिषेकैर्न तपोभिरुग्रैः।<br>अन्यैश्च धर्मैर्विविधैः शुभैर्वा<br>या कृत्तिवासे तु जितेन्द्रियैश्च॥५३जो गति जितेन्द्रिय लोग कृत्तिवासमें प्राप्त करते हैं, वह गति यज्ञों, दानों, तीर्थों, अभिषेकों, घोर तपों तथा अन्य विविध शुभ धर्मोंके द्वारा भी लोग नहीं प्राप्त कर सकते हैं॥५३॥
दर्शनाद्देवदेवस्य ब्रह्महापि प्रमुच्यते।<br>स्पर्शने पूजने चैव सर्वयज्ञफलं लभेत्॥५४देवदेवके दर्शनसे ब्राह्मणका वध करनेवाला भी [पापसे] मुक्त हो जाता है, [देवदेवका] स्पर्श तथा पूजन करनेसे व्यक्ति सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥५४॥
श्रद्धया परया देवं येऽर्चयन्ति सनातनम्।<br>फाल्गुनस्य चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे समाहिताः॥५५<br>पुष्पैः फलैस्तथान्यैश्च भक्ष्यैरुच्चावचैस्तथा।<br>क्षीरेण मधुना चैव तोयेन सह सर्पिषा॥५६<br>तर्पयन्ति परं लिङ्गमर्चयन्ति देवं शुभम्।<br>हुडुङ्कारनमस्कारैः नृत्यगीतैस्तथैव च॥५७<br>मुखवाद्यैरनेकैश्च स्तोत्रमन्त्रैस्तथैव च।<br>उपोष्य रजनीमेकां भक्त्या परमया हरम्॥५८<br>ते यान्ति परमं स्थानं सदाशिवमनामयम्।जो लोग फाल्गुनमासके कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथिको एकाग्रचित्त होकर परम श्रद्धाके साथ सनातन देवका अर्चन करते हैं; पुष्पों, फलों, अनेकविध भक्ष्य पदार्थों, दुग्ध, मधु, जल तथा घृतसे शुभ लिङ्गदेवको तृप्त करते हैं और एक रात उपवास करके महान् भक्तिसे हुडुङ्कार, नमस्कार, नृत्य, गीत, मुखवाद्य तथा विविध स्तोत्र-मन्त्रोंसे शिवको तृप्त करते हैं, वे सदाशिवके अनामय परम स्थानको प्राप्त करते हैं॥५५-५८½॥
भूता हि चैत्रमासस्य अर्चयेत्परमेश्वरम्॥५९<br>स वित्तेशपुरं प्राप्य क्रीडयेत् यक्षराडिव।<br>वैशाखस्य चतुर्दश्यां योऽर्चयेत्प्रयतः शिवम्॥६०जो मनुष्य चैत्रमासकी चतुर्दशीको परमेश्वरका अर्चन करता है, वह कुबेरलोक प्राप्त करके यक्षराजकी
७९६श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

| वैशाखं लोकमासाद्य तस्यैवानुचरो भवेत्।<br>ज्येष्ठे मासि चतुर्दश्यां योऽर्चयेच्छ्रद्धया हरम्॥ ६१ | भाँति क्रीड़ा करता है॥ ५९ १/२ ॥<br>जो वैशाखमासकी चतुर्दशीके दिन संयत होकर शिवकी पूजा करता है, वह स्कन्दलोक प्राप्त करके उन्हींका अनुचर हो जाता है। जो ज्येष्ठमासमें चतुर्दशी तिथिको श्रद्धापूर्वक शिवका पूजन करता है, वह चन्द्र-तारोंकी स्थिति-पर्यन्त अग्निलोकमें वास करता है॥ ६०-६१ १/२ ॥ | | सोऽग्निलोकमवाप्नोति यावदाचन्द्रतारकम्।<br>चतुर्दश्यां शुचौ मासि योऽर्चयेत्तु सुरेश्वरम्॥ ६२<br><br>सूर्यस्य लोके सुसुखी क्रीडते यावदीप्सितम्।<br>श्रावणस्य चतुर्दश्यां कामलिङ्गं समर्चितम्॥ ६३ | जो आषाढ़ महीनेमें चतुर्दशी तिथिको सुरेश्वरका अर्चन करता है, वह सूर्यलोकमें इच्छित समयतक सुखी रहते हुए क्रीडा करता है। जो श्रावणमासकी चतुर्दशी तिथिको कामलिङ्गका अर्चन करता है, वह वरुणलोकको जाता है और वहाँ अप्सराओंके साथ क्रीडा करता है॥ ६२-६३ १/२ ॥ | | स याति वारुणं लोकं क्रीडते चाप्सरैः सह।<br>मासि भाद्रपदे युक्तमर्चयित्वा तु शङ्करम्॥ ६४<br><br>पुष्पैः फलैश्च विविधै रुद्रस्यैति सलोकताम्।<br>पितृपक्षे चतुर्दश्यां पूजयित्वा महेश्वरम्॥ ६५ | भाद्रपदमासमें भक्तिपूर्वक विविध पुष्पों तथा फलोंके द्वारा शंकरकी पूजा करके मनुष्य रुद्रका सालोक्य प्राप्त करता है। [आश्विनमासमें] पितृपक्षमें चतुर्दशी तिथिको महेश्वरका पूजन करके मनुष्य पितरोंका लोक प्राप्त करता है और पूजित होकर उनके साथ क्रीडा करता है॥ ६४-६५ १/२ ॥ | | प्राप्यते पितृलोकं तु क्रीडते पूजितस्तु तैः।<br>प्रबोधमासे देवेशमर्चयित्वा महेश्वरम्॥ ६६<br><br>स चन्द्रलोकमाप्नोति क्रीडते यावदीप्सितम्।<br>बहुले मार्गशीर्षस्य अर्चयित्वा पिनाकिनम्॥ ६७ | प्रबोध (कार्तिक)-मासमें देवेश महेश्वरकी पूजा करके वह चन्द्रलोक प्राप्त करता है और इच्छित समयतक वहाँ विहार करता है। मार्गशीर्षमासकी चतुर्दशी तिथिको पिनाकधारी शिवका अर्चन करके मनुष्य विष्णुलोक प्राप्त करता है और अक्षयकालतक वहाँ क्रीडा करता है॥ ६६-६७ १/२ ॥ | | विष्णुलोकमवाप्नोति क्रीडते कालमक्षयम्।<br>अर्चयित्वा तथा पुष्ये स्थाणुं तुष्टेन चेतसा॥ ६८<br><br>प्राप्नोति नैर्ऋतं स्थानं तेन वै सह मोदते।<br>माघे समर्च्चयित्वा वै पुष्पमूलफलैः शुभैः॥ ६९ | पौष महीनेमें प्रसन्न मनसे स्थाणु (शिव)-की पूजा करके मनुष्य निर्ऋतितलोक प्राप्त करता है और उनके साथ आनन्द करता है। माघमासमें शुभ पुष्प-मूल-फलोंके द्वारा शिवकी पूजा करके मनुष्य संसारसागरका त्यागकर शिवलोक प्राप्त करता है॥ ६८-६९ १/२ ॥ | | प्राप्नोति शिवलोकं तु त्यक्त्वा संसारसागरम्।<br>कृत्तिवासेश्वरं देवमर्चयेत्तु प्रयत्नतः॥ ७०<br><br>अविमुक्ते च वस्तव्यं यदिच्छेन्मामकं पदम्॥ ७१ | यदि कोई मेरा लोक चाहता हो, तो उसे प्रयत्नपूर्वक कृत्तिवासेश्वरदेवकी पूजा करनी चाहिये और अविमुक्त [क्षेत्र]-में वास करना चाहिये॥ ७०-७१ ॥ | | गायन्ति सिद्धाः किल गीतकानि<br>धन्याविमुक्ते तु नरा वसन्ति।<br>स्वर्गापवर्गस्य पदस्य लिङ्गं<br>ये कृत्तिवासं शरणं प्रपन्नाः॥ ७२ | सिद्धलोग यह गीत गाते हैं कि जो मनुष्य अविमुक्तमें वास करते हैं और स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले कृत्तिवासेश्वरलिङ्गकी शरण ग्रहण करते हैं, वे धन्य हैं॥ ७२ ॥ | | ईश्वर उवाच<br>अन्यदायतनं पुण्यं काशिपुर्यां वरानने।<br>धन्वन्तरिः पुरा जातः काशिराजगृहे शुभे॥ ७३ | ईश्वर बोले—हे वरानने! काशीपुरीमें अन्य |

अध्याय ८ ] कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन ७९७


संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
पुण्यप्रद आयतन भी हैं। पूर्वकालमें काशिराजके शुभ गृहमें धन्वन्तरि उत्पन्न हुए थे॥ ७३॥
तेन भद्रे तथा काले अहमाराधितः शुभे।<br>भृङ्गीशेश्वरनामानं लिङ्गं तत्र स्थितं मम॥ ७४<br><br>पश्चान्मुखः स्थितश्चाहं कूपस्तु मम चाग्रतः।<br>तिष्ठन्त्योषधयस्तत्र सर्वा ह्यमृतसम्भवाः॥ ७५हे भद्रे! उन्होंने शुभ कालमें मेरी आराधना की थी। वहाँपर मेरा भृंगीशेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। मैं वहाँ पश्चिमकी ओर मुख किये हुए स्थित हूँ और मेरे सामने एक कूप है। वहाँ अमृतसे उत्पन्न सभी औषधियाँ विद्यमान हैं॥ ७४-७५॥
क्षिप्तास्तस्मिन् पुरा काले वैद्यराजेन सुन्दरि।<br>तेन तत्प्रोच्यते स्थानं वैद्यनाथं महेश्वरि॥ ७६हे सुन्दरि! पूर्वकालमें वैद्यराजके द्वारा औषधियाँ उस कूपमें डाली गयी थीं, इसीलिये हे महेश्वरि! उस स्थानको वैद्यनाथ कहा जाता है॥ ७६॥
तस्मिन् कूपे तु ये देवि पानीयं पिबते नरः।<br>व्याधिभिः सम्प्रमुच्यन्ते वैद्यनाथप्रभावतः॥ ७७हे देवि! जो मनुष्य उस कूपका जल पीते हैं, वे वैद्यनाथके प्रभावसे व्याधियोंसे मुक्त हो जाते हैं॥ ७७॥
कूपस्य चोत्तरे भागे हरिकेश्वरसंज्ञकम्।<br>रोगैश्चापि प्रमुच्यन्ते हरिकेश्वरदर्शनात्॥ ७८[उस] कूपके उत्तरभागमें हरिकेश्वर नामक लिङ्ग है, हरिकेश्वरके भी दर्शनसे मनुष्य रोगोंसे मुक्त हो जाते हैं॥ ७८॥
तुङ्गेशस्य समीपे तु दक्षिणे वरवर्णिनि।<br>शैवं तडागमाख्यातं शिवेनाधिष्ठितं शुभम्॥ ७९हे वरवर्णिनि! दक्षिण दिशामें तुंगेश्वरके समीप शिवके द्वारा अधिष्ठित एक उत्तम शैव तडाग बताया गया है॥ ७९॥
पश्चिमे तु तटे रम्ये स्थितोऽहं तत्र सुव्रते।<br>पश्चिमाभिमुखो भद्रे तस्मिन् स्थाने व्यवस्थितः॥ ८०<br><br>शिवेश्वर इति ख्यातो भक्तानां वरदायकः।<br>शिवेश्वराद्दक्षिणतो नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ ८१<br><br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं स्थापितं जमदग्निना।<br>जमदग्निलिङ्गात्पश्चिमतो नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ ८२हे सुव्रते! वहाँ रम्य पश्चिमी तटपर मैं स्थित हूँ। हे भद्रे! भक्तोंको वर प्रदान करनेवाला मैं उस स्थानमें पश्चिमाभिमुख होकर स्थित हूँ और शिवेश्वर—इस नामसे विख्यात हूँ। शिवेश्वरके दक्षिणमें [महर्षि] जमदग्निके द्वारा स्थापित एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। जमदग्निलिङ्गके पश्चिममें देवताओं तथा असुरोंसे नमस्कृत भैरवेश्वर नामसे प्रसिद्ध लिङ्ग स्थित है॥ ८०-८२ १/२॥
भैरवेश्वरविख्यातं सुरासुरनमस्कृतम्।<br>तत्र दुर्गा स्थिता भद्रे ममापि हि भयङ्करा॥ ८३<br><br>नृत्यमाना तु सा देवी लिङ्गस्यैव समीपतः।<br>भैरवेशं तु तं दृष्ट्वा संसारे न पतेत्पुनः॥ ८४हे भद्रे! वहाँ मेरे लिङ्गके ही समीपमें नृत्य करती हुई वे भयंकर देवी दुर्गा स्थित हैं। उन भैरवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य पुनः संसारमें नहीं आता है॥ ८३-८४॥
तस्यैव भैरवेशस्य कूपस्तिष्ठति चोत्तरे।<br>तस्योपस्पर्शनं कृत्वा सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ ८५उन्हीं भैरवेश्वरके उत्तरमें एक कूप स्थित है, उसमें स्नान करके मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ ८५॥
कूपस्य पश्चिमे भागे लिङ्गं तिष्ठति भामिनि।<br>शुकेश्वरमिति ख्यातं स्थापितं व्याससूनुना॥ ८६<br><br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि वैराग्यमपि विन्दति।<br>तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे तडागं यत्र तिष्ठति॥ ८७हे भामिनि! कूपके पश्चिम भागमें व्यासपुत्रके द्वारा स्थापित शुकेश्वर नामसे प्रसिद्ध लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य वैराग्य भी प्राप्त कर लेता है॥ ८६ १/२॥

| ७९८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्र स्नात्वा वरारोहे कृतकृत्यो भवेन्नरः।<br>नैर्ऋते तु दिशाभागे शुकेशस्य तु सुन्दरि॥ ८८हे वरारोहे! वहाँ उसके उत्तरभागमें एक तडाग स्थित है, जहाँ स्नान करके मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है॥ ८७ १/२॥
स्थापितं मुखलिङ्गं तु व्यासेनापि महर्षिणा।<br>व्यासेश्वरं तु विख्यातमृषिभिश्चैस्तु वन्दितम्॥ ८९हे सुन्दरि! शुकेश्वरके नैर्ऋत दिशाभागमें महर्षि व्यासके द्वारा मुखलिङ्ग स्थापित किया गया है, व्यासेश्वर नामसे विख्यात वह [लिङ्ग] ऋषियोंके द्वारा वन्दित है॥ ८८-८९॥
व्यासकुण्डे नरः स्नात्वा अर्चयित्वा सुरान् पितॄन्।<br>अक्षयाँल्लभते लोकान् यत्र तत्राभिकाङ्क्षितान्॥ ९०वहाँ व्यासकुण्डमें स्नान करके तथा देवताओं और पितरोंका अर्चन करके मनुष्य अभीष्ट अक्षय लोकोंको प्राप्त करता है॥ ९०॥
व्यासतीर्थसमीपे तु पश्चिमेन यशस्विनि।<br>घण्टाकर्णह्रदं नाम सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ ९१<br><br>स्नानं कृत्वा ह्रदे तस्मिन् व्यासस्यैव तु दर्शनात्।<br>यत्र तत्र मृतो वापि वाराणस्यां मृतो भवेत्॥ ९२<br><br>तत्र देवि तनुं त्यक्त्वा लभेदगाणेश्वरीं गतिम्।<br>घण्टाकर्णसमीपे तु उत्तरेण यशस्विनि॥ ९३हे यशस्विनि! व्यासतीर्थके समीप पश्चिममें समस्त सुख प्रदान करनेवाला घण्टाकर्ण नामक ह्रद विद्यमान है। उस ह्रदमें स्नान करके तथा व्यासका दर्शन करके मनुष्य जहाँ कहीं भी मरता है, वह मानो वाराणसीमें मृत्यु प्राप्त करता है। हे देवि! वहाँपर शरीरका त्याग करके मनुष्य गाणेश्वरीगति प्राप्त करता है॥ ९१-९२ १/२॥
पुण्यमप्सरसां ख्यातं पञ्चचूडाविनिर्मितम्।<br>पञ्चचूडाह्रदे स्नात्वा दृष्ट्वा चैव तमेश्वरम्॥ ९४<br><br>स्वर्गलोकं नरो याति पञ्चचूडाप्रियः सदा।<br>तस्य चोत्तरदेशे तु अशोकवनसंस्थितम्॥ ९५हे यशस्विनि! घण्टाकर्णके समीप उत्तरदिशामें पंचचूड़ाके द्वारा निर्मित अप्सराओंका पुण्यप्रद ह्रद बताया गया है, पंचचूड़ाह्रदमें स्नान करके तथा उन ईश्वरका दर्शन करके मनुष्य स्वर्गलोक जाता है और सर्वदा पंचचूड़ाका प्रिय बना रहता है॥ ९३-९४ १/२॥
अशोकवनमध्यस्थं तत्र कुण्डं शुभोदकम्।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा विलोकश्चैव जायते॥ ९६उसके उत्तरभागमें अशोकवन स्थित है, वहाँपर अशोकवनके मध्यमें पवित्र जलवाला कुण्ड स्थित है। उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य [वहाँपर विद्यमान] विलोकतीर्थस्वरूप हो जाता है॥ ९५-९६॥
विलोकाच्चोत्तरे भागे नाम्ना मन्दाकिनी शुभा।<br>स्वर्गलोके तु सा पुण्या किं पुनर्मानुषे शुभे॥ ९७<br><br>यत्र वै देवदेवस्य सान्निध्यं देवि सर्वदा।<br>लिङ्गं तत्र स्वयं भूतं क्षेत्रमध्ये तु सुन्दरि॥ ९८विलोकके उत्तरभागमें शुभ मन्दाकिनी विद्यमान है। हे देवि! स्वर्गलोकमें स्थित वह पुण्यमयी [मन्दाकिनी] नदी यदि इस शुभ मनुष्यलोकमें है, तो फिर कहना ही क्या, जहाँ सर्वदा देवदेव [शिवका] सान्निध्य रहता है। हे सुन्दरि! वहाँ क्षेत्रके मध्यमें लिङ्ग स्वयं आविर्भूत हुआ है॥ ९७-९८॥
ईश्वर उवाच<br>मन्दाकिनीजले स्नात्वा दृष्ट्वा वै मध्यमेश्वरम्।<br>एकविंशकुलोपेतो रुद्रलोके वसेच्चिरम्॥ ९९ईश्वर बोले— मन्दाकिनीके जलमें स्नान करके मध्यमेश्वरका दर्शनकर मनुष्य [अपने] इक्कीस कुलोंसहित दीर्घकालतक रुद्रलोकमें वास करता है॥ ९९॥
एतत्किल सदा प्राहुः पितरः सपितामहाः।<br>योऽपि चास्मत्कुले जातो मन्दाकिन्या जलोद्गतः॥ १००पितामहोंसहित पितृगणोंने यह सर्वदा कहा है कि

अध्याय ८ ] कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन ७९९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भोजयेच्च यतो विप्रान् यतीन् पाशुपतान् बुधः।<br>स्नानं दानं तपो होमः स्वाध्यायं पितृतर्पणम्॥ १०१<br><br>पिण्डनिर्वापणं चैव सर्वं भवति चाक्षयम्।<br>क्षेत्रस्य चास्य सङ्क्षेपान्मया ते कथितं स्फुटम्॥ १०२हमारे कुलमें उत्पन्न जो कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति मन्दाकिनीके जलमें स्नान करके पाशुपत विप्रों तथा यतियोंको भोजन कराता है, उसका स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण, पिण्डनिर्वापण—यह सब अक्षय हो जाता है॥ १००-१०११/२॥<br><br>मैंने इस क्षेत्रका माहात्म्य आपसे संक्षेपमें बता दिया।
दक्षिणं भूमिभागं तु मध्यमेशस्य यद्भवेत्।<br>तत्र पूर्वामुखं लिङ्गं विश्वेदेवैः प्रतिष्ठितम्॥ १०३<br><br>पश्चान्मुखं तु देवेशं वीरभद्रप्रतिष्ठितम्।<br>पश्चान्मुखेन दृष्टेन वीरभद्रसलोकताम्॥ १०४मध्यमेश्वरके दक्षिणमें जो भूमिभाग है, वहाँ विश्वेदेवोंके द्वारा स्थापित एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग है और वीरभद्रके द्वारा स्थापित पश्चिमाभिमुख लिङ्ग भी है, उस पश्चिमाभिमुख देवेशके दर्शनसे मनुष्य वीरभद्रका सालोक्य प्राप्त करता है॥ १०२-१०४॥
तयोस्तु दक्षिणे देवि भद्रकालीह्रदं स्मृतम्।<br>कुण्डस्य पश्चिमे तीरे शौनकेन प्रतिष्ठितम्॥ १०५<br><br>मतङ्गेश्वरनामानं लिङ्गं तत्रैव तिष्ठति।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ १०६हे देवि! उन दोनोंके दक्षिणमें भद्रकालीह्रद बताया गया है। वहींपर उस कुण्डके पश्चिमी तटपर शौनकके द्वारा एक लिङ्ग स्थापित किया गया है। मतंगेश्वर नामक लिङ्ग भी वहींपर स्थित है, पूर्वकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाला है॥ १०५-१०६॥
मतङ्गेश्वरकोणे तु वायव्ये तु यशस्विनि।<br>प्रतिष्ठितानि लिङ्गानि नरैस्तत्र महात्मभिः॥ १०७<br><br>तस्यैव दक्षिणे भागे जयन्तेन प्रतिष्ठितम्।<br>देवराजस्य पुत्रेण आत्मनो जयमिच्छता॥ १०८हे यशस्विनि! वहाँ मतंगेश्वरके वायव्यकोणमें महात्मा पुरुषोंके द्वारा [अनेक] लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। उसीके दक्षिणभागमें अपनी विजयकी कामना करनेवाले देवराजपुत्र जयन्तके द्वारा [एक] लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ १०७-१०८॥
ब्रह्मतारेश्वरं चैवं तस्मिन् स्थाने सुरेश्वरि।<br>पितृभिः याज्ञवल्क्येन तत्र लिङ्गं प्रतिष्ठितम्॥ १०९हे सुरेश्वरि! उस स्थानमें ब्रह्मतारेश्वर [लिङ्ग] विद्यमान है, वह लिङ्ग पितरों तथा याज्ञवल्क्यके द्वारा स्थापित किया गया है॥ १०९॥
तस्य दक्षिणदिग्भागे सिद्धिकूटः प्रकीर्तितः।<br>सिद्धाः पाशुपतास्तत्र मम लिङ्गार्चने रताः॥ ११०उसके दक्षिण दिशाभागमें सिद्धिकूट बताया गया है, वहाँपर सिद्धपाशुपत मेरे लिङ्गके अर्चनमें संलग्न रहते हैं॥ ११०॥
तेषां वै तत्र कूतोऽयं सिद्धकूटः स सिध्यते।<br>तत्र ध्यानरताः केचिज्जपं कुर्वन्ति चापरे॥ १११<br><br>स्वाध्यायमन्ये कुर्वन्ति तपः कुर्वन्ति चापरे।<br>आकाशशयनं केचित्केचिद्भावं समाश्रिताः॥ ११२<br><br>अधोमुखास्तथैवान्ये धूमपेयास्तथापरे।<br>प्रदक्षिणामन्ये कुर्वन्ति काष्ठमौनं तथापरे॥ ११३<br><br>कुर्वन्ति पुष्पाहरणं गडूकानां तथा परे।<br>तैः सर्वैः स्थापितं लिङ्गमर्चापूजनतत्परैः॥ ११४वहाँ उनका जो कूट है, वह सिद्धकूट कहा जाता है। वहाँपर कुछ लोग ध्यानपरायण रहते हैं, दूसरे लोग जप करते हैं, अन्य लोग स्वाध्याय करते हैं, कुछ लोग तप करते हैं, कुछ लोग आकाशशयन करते हैं, कुछ लोग भक्तिभावमें लीन रहते हैं, कुछ लोग अधोमुख होकर स्थित रहते हैं, कुछ लोग धूम ग्रहण करते हुए तपमें रत रहते हैं, कुछ लोग प्रदक्षिणा करते रहते हैं, कुछ लोग काष्ठकी भाँति मौन रहते हैं और कुछ लोग गडूकेके पुष्पोंको एकत्र करनेमें संलग्न रहते हैं। अर्चन-पूजनमें तत्पर उन सभीके द्वारा वहाँ लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ १११-११४॥

९- व्याघ्रेश्वर, दण्डीश्वर, जैगीषव्येश्वर तथा शातातपेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन

८००श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
तेषां तत्र तदा भक्तिं ज्ञात्वा देवे हि सुव्रते।<br>सान्निध्यं कृतवांस्तस्मिंस्तदनुग्रहकाम्यया॥ ११५हे सुव्रते! उस समय वहाँपर लिङ्गके प्रति उन सबकी भक्ति जानकर मैंने अनुग्रहकी इच्छासे उस लिङ्गमें वास किया॥ ११५॥
सिद्धेश्वरं तु विख्यातं सर्वपापहरं शुभम्।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं सिद्धकूटे व्यवस्थितम्॥ ११६सिद्धेश्वर नामसे विख्यात तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला वह शुभ लिङ्ग पूर्वकी ओर मुख किये सिद्धकूटमें स्थित है॥ ११६॥
मानवानां हितार्थाय तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम्।<br>देवस्य पश्चिमे भागे वापी तिष्ठति सुन्दरि॥ ११७<br><br>तत्र वापीजले स्नात्वा दृष्ट्वा सिद्धेश्वरं नरः।<br>अस्मिन् क्षेत्रे तु निर्माल्यं पापं सङ्क्रमते तु यत्॥ ११८<br><br>तत् सर्वं विलयं याति सिद्धेश्वरस्य दर्शनात्॥ ११९मैं मनुष्योंके कल्याणके लिये उस स्थानपर स्थित हूँ। हे सुन्दरि! उस लिङ्गके पश्चिमभागमें [एक] वापी विद्यमान है, वहाँ वापीके जलमें स्नान करके तथा सिद्धेश्वरका दर्शन करके मनुष्य इस क्षेत्रमें पापरहित हो जाता है। उसे जो भी पाप लिप्त किये होता है, वह सब सिद्धेश्वरके दर्शनसे विनष्ट हो जाता है॥ ११७—११९॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुहायतनवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गपुराणके वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुहायतनवर्णन' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८॥


नौवाँ अध्याय

व्याघ्रेश्वर, दण्डीश्वर, जैगीषव्येश्वर तथा शातातपेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन

ईश्वर उवाच<br>सिद्धकूटस्य पूर्वेण देवं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>व्याघ्रेश्वरेति विख्यातं सर्वदेवैः स्तुतं शुभे॥ १ईश्वर बोले—हे शुभे! सिद्धकूटके पूर्वमें व्याघ्रेश्वर नामसे विख्यात एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह सभी देवताओंके द्वारा स्तुत है॥ १॥
तेन दृष्टेन लभते उत्तमं पदमव्ययम्।<br>व्याघ्रेश्वराद्दक्षिणे च स्वयम्भूस्तत्र तिष्ठति॥ २<br><br>दिव्यं लिङ्गं तु तत्रस्थं देवानामपि दुर्लभम्।<br>रहस्यं सर्वदेवानां भूमिं भित्त्वा तु चोत्थितम्॥ ३<br><br>तेन लिङ्गेन दृष्टेन पूजितेन स्तुतेन च।<br>कृतकृत्यो भवेद्देवि संसारे न पुनर्विशेत्॥ ४उसके दर्शनसे मनुष्य उत्तम अव्यय (शाश्वत) पद प्राप्त करता है। वहाँ व्याघ्रेश्वरके दक्षिणमें स्वयम्भू लिङ्ग स्थित है। वहाँपर विद्यमान वह दिव्य लिङ्ग देवताओंके लिये भी दुर्लभ है, देवताओंके लिये रहस्यमय वह लिङ्ग भूमिको भेदन करके प्रकट हुआ है। हे देवि! उस लिङ्गके दर्शन, पूजन तथा स्तवनसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और संसारमें पुनः जन्म नहीं लेता है॥ २—४॥
पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं ज्येष्ठस्थानमिदं शुभम्।<br>मानवानां हितार्थाय तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम्॥ ५वह लिङ्ग पूर्वाभिमुख है, यह शुभ ज्येष्ठस्थान कहा जाता है। मैं मनुष्योंके हितके लिये उस स्थानमें स्थित हूँ॥ ५॥

अध्याय ९] व्याघ्रेश्वर, दण्डीश्वर, जैगीषव्येश्वर तथा शातातपेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन [८०१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अस्याग्रे देवदेवेशि मुखलिङ्गं च तिष्ठति।<br>पश्चान्मुखं तु तं देवि पञ्चचूडा शुभेक्षणा॥ ६॥हे देवदेवेशि! इसके आगे मुखलिङ्ग विराजमान है। हे देवि! शुभ नेत्रोंवाली पंचचूड़ाने पश्चिमकी ओर मुखवाले उस लिङ्गको स्थापित किया है॥ ६॥
तस्य दक्षिणपार्श्वे तु नाम्ना प्रहसितेश्वरम्।<br>तं दृष्ट्वा लभते देवि आनन्दं ब्रह्मणः पदम्॥ ७॥उसके दक्षिण भागमें प्रहसितेश्वर नामक लिङ्ग है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य आनन्दप्रद ब्रह्मलोक प्राप्त करता है॥ ७॥
तस्योत्तरे तु देवेशि पुण्यं लिङ्गं त्वया कृतम्।<br>निवासेति च विख्यातं सर्वेषामेव योगिनाम्॥ ८॥<br>तेन दृष्टेन देवेशि योगं विन्दति शाङ्करम्।हे देवेशि! उसके उत्तरमें आपके द्वारा निवास नामसे विख्यात सभी योगियोंके लिये एक पुण्यप्रद लिङ्ग स्थापित किया गया है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य शांकरयोग प्राप्त करता है॥ ८ १/२॥
चतुःसमुद्रविख्यातः कूपस्तिष्ठति सुन्दरि॥ ९॥<br>चतुःसमुद्रस्नानेन यत्फलं लभते नरः।<br>तत्फलं सकलं तस्य उदकस्पर्शनाच्छुभे॥ १०॥हे सुन्दरि! वहाँ चतुःसमुद्र नामसे प्रसिद्ध एक कूप स्थित है। हे शुभे! मनुष्य चारों समुद्रोंमें स्नान करनेसे जो फल पाता है, वह सम्पूर्ण फल उस [चतुःसमुद्रकूप]-के जलके स्पर्श करनेसे उसे प्राप्त होता है॥ ९-१०॥
तत्रैव त्वं महादेवि रममाणा मया सह।<br>ये च त्वां पूजयिष्यन्ति भक्तियुक्ताश्च मानवाः॥ ११॥<br>न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥ १२॥हे महादेवि! आप वहींपर मेरे साथ विहार करती हैं। जो मनुष्य भक्तिसे युक्त होकर आपकी पूजा करेंगे, करोड़ों कल्पोंमें भी उनका पुनर्जन्म नहीं होगा॥ ११-१२॥
ईश्वर उवाच<br>कूपस्य उत्तरे देवि व्याघ्रेशस्य तु दक्षिणे।<br>तिष्ठते तत्र वै लिङ्गं पूर्वामुखं च सुन्दरि॥ १३॥<br>दण्डीश्वरमिति ख्यातं वरदं सर्वदेहिनाम्।<br>तेन दृष्टेन लभ्येत ऐश्वरं पदमव्ययम्॥ १४॥**ईश्वर बोले—**हे देवि! हे सुन्दरि! वहाँपर कूपके उत्तरमें तथा व्याघ्रेशके दक्षिणमें एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। वह दण्डीश्वर नामसे विख्यात है तथा सभी प्राणियोंको वर देनेवाला है, उसके दर्शनसे ईश्वरका शाश्वत पद प्राप्त होता है॥ १३-१४॥
तस्योत्तरे तडागं च देवि सर्वत्र विश्रुतम्।<br>सन्ध्याप्रणामकुपिता यदा तस्मिन् सुरेश्वरि॥ १५॥<br>बहुरूपं समास्थाय देवदेवः स्वयं हरः।<br>दण्डकश्च तदा क्षिप्तो देवाग्रे स प्रभाकरः॥ १६॥<br>तेन तत्र कृतं दिव्यं तडागं लोकविश्रुतम्।<br>क्रोधेन प्रस्थिता देवि तुहिनाचलसम्मुखम्॥ १७॥<br>तावदस्य तदग्रे वै तडागं महदद्भुतम्।<br>तं दृष्ट्वा तु तदा देवि निवृत्ता पुनरेव वा॥ १८॥हे देवि! उसके उत्तरमें सर्वत्र प्रसिद्ध एक तडाग है। हे सुरेश्वरि! सन्ध्याकालमें प्रणाम न करनेके कारण जब तुम कुपित हुई, तब देवाधिदेवने स्वयं अनेक रूप धारण करके देवताओंके सम्मुख ज्योतिर्मय दण्डको फेंका, उसने वहाँ लोकप्रसिद्ध तडाग बना दिया। हे देवि! जब तुमने क्रोधपूर्वक हिमालयके सम्मुख प्रस्थान किया, उसी समय उसके आगे अत्यन्त अद्भुत तडाग मिला। हे देवि! उसे देखकर तुम पुनः वापस आ गयी और हे देवेशि! हे भामिनि! उसके बाद घरमें प्रवेश करके वहींपर स्थित हो गयी। देवाधिदेवके दण्डके वहाँ गिरनेपर महान् सरोवर हो गया। अतः जो पुराणवेत्ता
८०२श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वेश्म प्रविश्य देवेशि स्थिता तत्रैव भामिनि।<br>दण्डेन देवदेवस्य स्थितेन सुमहत्सरः ॥ १९<br>दण्डखातमिति प्राहुर्ये पुराणविदो जनाः।<br>तस्मात्स्नानं तु कर्तव्यं तत्रैव श्रेय इच्छया॥ २०लोग हैं, वे उसे 'दण्डखात'—इस नामसे पुकारने लगे हैं। अतः मनुष्यको [अपने] कल्याणकी कामनासे वहाँपर स्नान करना चाहिये॥ १५-२०॥
तत्र स्नाने कृते देवि कृतकृत्यो भवेन्नरः।<br>दण्डखाते नरः स्नात्वा तर्पयित्वा स्वकान् पितॄन् ॥ २१<br>नरकस्थास्तु ये देवि पितृलोके वसन्ति ते।<br>पिशाचत्वं गता ये च नराः पापेन कर्मणा॥ २२हे देवि! वहाँ स्नान करनेपर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। [हे देवि!] दण्डखातमें स्नान करके मनुष्यको अपने पितरोंका तर्पण करना चाहिये। हे देवि! जो [पितर] नरकमें स्थित हैं, वे [तर्पणके प्रभावसे] पितृलोकमें वास करते हैं। अपने पापकर्मसे जो [पितृगण] पिशाचत्वको प्राप्त हुए हैं, वहाँ पिण्डदान करनेसे उनके देहका उद्धार कहा गया है॥ २१-२२१/२॥
तेषां पिण्डप्रदानेन देहस्योद्धरणं स्मृतम्।<br>दण्डखाते नरः स्नात्वा किं भूयः परिशोचति ॥ २३<br>यस्य स्मरणमात्रेण पापसङ्घातपञ्जरम्।<br>नश्यते शतधा देवि दण्डखातस्य दर्शनात्॥ २४दण्डखातमें स्नान करके मनुष्य भला कैसे सन्तप्त रह सकता है? हे देवि! जिस दण्डखातके स्मरणमात्रसे तथा दर्शनसे पापसमूहका पंजर सैकड़ों भागोंमें होकर विनष्ट हो जाता है, उस दण्डखातके माहात्म्य तथा पुण्यप्रद महायशका श्रवण कीजिये॥ २३-२४१/२॥
तस्य दण्डस्य माहात्म्यं पुण्यं शृणु महायशः।<br>सूर्योपरागे देवेशि नरा आयान्ति सुव्रते॥ २५<br>कुरुक्षेत्रं महत्पुण्यं सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>निवृत्ते ग्रहणे देवि कुरुक्षेत्रात्परं पदम्॥ २६<br>दण्डखातं समायान्ति आत्मशुद्ध्यर्थकारणम्।<br>दर्शनात्तस्य खातस्य कृतकृत्योऽभिजायते ॥ २७हे देवेशि! हे सुव्रते! सूर्यग्रहणके अवसरपर मनुष्य महापुण्यप्रद तथा सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत कुरुक्षेत्रमें आते हैं और हे देवि! ग्रहणके समाप्त होनेपर वे कुरुक्षेत्रसे परम पदस्वरूप तथा आत्मशुद्धिके कारणभूत दण्डखातमें आते हैं, उस दण्डखातके दर्शनसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है॥ २५-२७॥
अन्यदायतनं तत्र मम देवि महेश्वरि।<br>जैगीषव्येश्वरं नाम स्थापितं सुमहात्मना॥ २८<br>जैगीषव्यगुहा तस्मिन् देवदेवस्य सन्निधौ।<br>त्रिकालमर्चयाँल्लिङ्गं भक्त्या तद्भावितात्मना ॥ २९हे देवि! हे महेश्वरि! वहाँ परम महात्मा [जैगीषव्य]-के द्वारा स्थापित किया गया जैगीषव्येश्वर नामक अन्य आयतन भी है। उसमें जैगीषव्यकी गुहा स्थित है, वहाँ देवदेवकी सन्निधिमें उन्होंने भक्तिपूर्वक शिवमें आसक्त चित्तसे लिङ्गका त्रिकाल अर्चन किया था॥ २८-२९॥
एवमाराधितो देवि जैगीषव्येण धीमता।<br>तस्य पृष्टश्चाहं देवि सर्वान् कामान् प्रदत्तवान्।<br>तस्मात्तु सुकृतं लिङ्गं पूजयिष्यन्ति ये नराः॥ ३०<br>ज्ञानं तेषां ध्रुवं देवि अचिराज्जायते भुवि।<br>त्रिरात्रं तत्र कृत्वा वै यो नरः पूजयिष्यति ॥ ३१<br>गुह्यं प्रविश्यते चैव ज्ञानयुक्तो भवेन्नरः।<br>तस्य वै पश्चिमे भागे सिद्धकूपस्तु दक्षिणे॥ ३२हे देवि! इस प्रकार बुद्धिमान् जैगीषव्यके द्वारा मेरी आराधना की गयी, तब हे देवि! उनके माँगनेपर मैंने उनकी सभी कामनाओंको पूर्ण किया। इसलिये हे देवि! पृथ्वीलोकमें जो मनुष्य इस पुण्यप्रद लिङ्गकी पूजा करते हैं, उन्हें निश्चित रूपसे शीघ्र ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य वहाँ तीन रात्रि [उपवासपूर्वक] व्यतीत करके लिङ्गका पूजन करता है, वह गूढतत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है और ज्ञानसम्पन्न हो जाता है॥ ३०-३११/२॥

अध्याय ९] व्याघ्रेश्वर, दण्डीश्वर, जैगीषव्येश्वर तथा शातातपेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन ८०३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं देवलेन प्रतिष्ठितम्।<br>तेन दृष्टेन देवेशि ज्ञानवान् जायते नरः॥ ३३<br><br>तस्यैव च समीपस्थं शतकालप्रतिष्ठितम्।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे नातिदूरे तपस्विनि॥ ३४उसके पश्चिमभागमें एक सिद्धकूप है। उसके दक्षिणमें [महर्षि] देवलके द्वारा स्थापित एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य ज्ञानवान् हो जाता है॥ ३२-३३॥<br><br>हे तपस्विनि! उसके दक्षिण दिशाभागमें अधिक दूरीपर नहीं, अपितु उसके समीपमें ही शतकालके द्वारा स्थापित एक लिङ्ग है॥ ३४॥
मुखलिङ्गं तु तद्भद्रे पश्चिमाभिमुखं शुभे।<br>शातातपेश्वरं नाम स्थापितं च महर्षिणा॥ ३५<br><br>तेन दृष्टेन लभते गतिमिष्टाञ्च शाश्वतीम्।<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे महालिङ्गं च तिष्ठति॥ ३६<br><br>हेतुकेश्वरनामानं सर्वसिद्धिफलप्रदम्।<br>तस्यैव दक्षिणे भागे मुखलिङ्गं च तिष्ठति॥ ३७हे भद्रे! वह मुखलिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला है। हे शुभे! शातातपेश्वर नामक वह लिङ्ग महर्षि शातातपके द्वारा स्थापित किया गया है, उसके दर्शनसे मनुष्य वांछित तथा शाश्वत गति प्राप्त करता है। उसके पश्चिम दिशाभागमें सभी सिद्धियोंका फल प्रदान करनेवाला हेतुकेश्वर नामक महालिङ्ग स्थित है। उसीके दक्षिणभागमें मुखलिङ्ग स्थित है॥ ३५-३७॥
कणादेश्वरनामानं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्।<br>सिद्धस्तत्र महाभागे कणादस्तु ऋषिः पुरा॥ ३८कणादेश्वर नामक वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुख किये स्थित है। हे महाभागे! पूर्वकालमें ऋषि कणाद वहाँपर सिद्धिको प्राप्त हुए थे॥ ३८॥
कूपस्तत्र समीपस्थः पुण्यदः सर्वदेहिनाम्।<br>कणादेशाद्दक्षिणेन अन्यदायतनं शुभम्॥ ३९<br><br>पश्चान्मुखन्तु भूतीशं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>तस्यैव पश्चिमे भागे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ४०<br><br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गमाषाढं नाम विश्रुतम्।<br>अन्यानि तत्र लिङ्गानि स्थापितानि महान्ति च॥ ४१वहाँ समीपमें ही सभी प्राणियोंको पुण्य प्रदान करनेवाला कूप विद्यमान है। कणादेश्वरके दक्षिणमें दूसरा शुभ आयतन है, वह पश्चिमकी ओर मुखवाला तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला है। उसीके पश्चिम भागमें एक पश्चिमाभिमुख मुखलिङ्ग स्थित है, वह चतुर्मुखलिङ्ग आषाढ नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ अन्य महालिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं॥ ३९-४१॥
तेषां पूर्वेण लिङ्गं तु दैत्येन स्थापितं पुरा।<br>तेन दृष्टेन देवेशि पुत्रवान् जायते नरः॥ ४२उनके पूर्वमें प्राचीन कालमें [एक] दैत्यके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य पुत्रवान् हो जाता है॥ ४२॥
भारभूतेश्वरं देवं तत्र दक्षिणतः स्थितम्।<br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं भारभूतेश्वरं प्रिये॥ ४३उसके दक्षिणमें भारभूतेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। हे प्रिये! वह भारभूतेश्वरलिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला है॥ ४३॥
व्यासेश्वरस्य पूर्वेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>पराशरेण मुनिना स्थापितं मम भक्तितः॥ ४४व्यासेश्वरके पूर्वमें एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, उसे पराशरमुनिने मेरी भक्तिसे स्थापित किया है॥ ४४॥
पश्चान्मुखं तु तद्देवि मुखलिङ्गं च तिष्ठति।<br>अत्रिणा स्थापितं भद्रे मम भक्तिपरेण च॥ ४५हे देवि! वहाँ पश्चिमकी ओर मुखवाला एक मुखलिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! मेरी भक्तिसे युक्त मुनि

१०- गभस्तीश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य एवं कलशेश्वरलिङ्गकी उत्पत्ति-कथा

८०४श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वशास्त्रप्रदायकम्।<br>व्यासेश्वरस्य पूर्वेण द्वौ लिङ्गौ तत्र सुव्रते॥ ४६<br><br>स्थापितौ देवदेवेशि शङ्खेन लिखितेन च।<br>तौ दृष्ट्वा मानवो भद्रे ऋषिलोकमवाप्नुयात्॥ ४७अत्रिके द्वारा वह लिङ्ग स्थापित किया गया है। पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग सभी शास्त्रोंका ज्ञान देनेवाला है॥ ४५ १/२ ॥<br><br>हे सुव्रते! हे देवदेवेशि! व्यासेश्वरके पूर्वमें वहाँ शंख तथा लिखित [मुनिद्वय]-के द्वारा दो लिङ्ग स्थापित किये गये हैं, हे भद्रे! उन दोनोंका दर्शन करके मनुष्य ऋषिलोक प्राप्त करता है॥ ४६-४७॥
अन्यच्च देवदेवस्य स्थानं गुह्यं यशस्विनि।<br>लिङ्गं विश्वेश्वरं नाम सर्वदेवैस्तु वन्दितम्॥ ४८<br><br>तेन दृष्टेन लभ्येत व्रतात्पाशुपतात्फलम्।हे यशस्विनि! देवदेवका अन्य गुह्य स्थान भी है, विश्वेश्वर नामक वह लिङ्ग सभी देवताओंद्वारा वन्दित है। उसके दर्शनसे मनुष्य पाशुपतव्रतसे होनेवाला फल प्राप्त करता है॥ ४८ १/२ ॥
पूर्वोत्तरदिशाभागे तस्य देवस्य सुन्दरि॥ ४९<br><br>अवधूतं महत्तीर्थं सर्वपापापनुत्तमम्।<br>तस्य पूर्वेण संल्लग्नं नाम्ना पशुपतीश्वरम्॥ ५०<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण पशुयोनिं न गच्छति।<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ ५१हे सुन्दरि! उस लिङ्गके पूर्वोत्तर दिशाभागमें सभी पापोंका नाश करनेवाला अवधूत नामक उत्तम महातीर्थ विद्यमान है। उसके पूर्वमें समीपमें ही पशुपतीश्वर नामक लिङ्ग है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य पशुयोनिमें नहीं जाता है। वह लिङ्ग चतुर्मुख है तथा पश्चिमकी ओर मुख किये स्थित है॥ ४९-५१॥
तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गं पञ्चमुखं स्थितम्।<br>ऋषिणा स्थापितं भद्रे गोभिलेन महात्मना॥ ५२<br><br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि ऋषिलोकं स गच्छति।<br>तस्यैव पश्चिमे देवि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ५३<br><br>विद्याधराधिपतिना कृतं जीमूतवाहिना॥ ५४हे भद्रे! उसके दक्षिण दिशाभागमें पंचमुख लिङ्ग स्थित है, महान् आत्मावाले ऋषि गोभिलने उसे स्थापित किया है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य ऋषिलोकको जाता है। हे देवि! उसीके पश्चिममें विद्याधरोंके अधिपति जीमूतवाहीके द्वारा स्थापित किया गया पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है॥ ५२-५४॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥


दसवाँ अध्याय

गभस्तीश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य एवं कलशेश्वरलिङ्गकी उत्पत्ति-कथा

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ईश्वर उवाच<br>अन्यदायतनं देवि वाराणस्यां मम प्रिये।<br>गभस्तीश्वरनामानं लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ १<br>सूर्येण स्थापितं भद्रे मम भक्तिपरेण वै।<br>तस्मिन् ममापि सान्निध्यं नित्यमेव यशस्विनि॥ २**ईश्वर बोले—**हे प्रिये! वाराणसीमें मेरा दूसरा आयतन भी है। गभस्तीश्वर नामक वह लिङ्ग पश्चिमाभिमुख स्थित है, हे भद्रे! मेरी भक्तिसे युक्त होकर सूर्यने उसे स्थापित किया है। हे यशस्विनि! उसमें भी सर्वदा मेरा सान्निध्य रहता है॥ १-२॥

अध्याय १०] गभस्तीश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य एवं कलशेश्वरलिङ्गकी उत्पत्ति-कथा ८०५

ऐशानीं मूर्तिमास्थाय तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि ऐशानं लोकमाप्नुयात्॥ ३ईशानका स्वरूप धारण करके मैं उस स्थानमें स्थित हूँ, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य ईशानका लोक प्राप्त करता है॥ ३॥
तस्य दक्षिणपार्श्वे तु दधिकर्णह्रदं स्थितम्।<br>उत्तरे कूपमेवं तु तस्य नामस्य सुन्दरि॥ ४<br>दधिकर्णेश्वरं देवं मुखलिङ्गं च तिष्ठति।<br>पूर्वामुखं तु देवेशि गभस्तीशस्य चोत्तरे॥ ५उसके दक्षिणभागमें दधिकर्णह्रद स्थित है। हे सुन्दरि! उत्तरमें उसीके नामका कूप विद्यमान है। हे देवेशि! गभस्तीश्वरके उत्तरमें पूर्वकी ओर मुखवाला दधिकर्णेश्वर नामक मुखलिङ्ग स्थित है॥ ४-५॥
दक्षिणेन गभस्तीशाद्वाराणस्यां तु सुव्रते।<br>मानवानां हितार्थाय त्वं च तत्र व्यवस्थिता॥ ६<br>आराधयन्ति देवि त्वामुत्तराभिमुखीं स्थिताम्।<br>ये च त्वा पूजयिष्यन्ति तस्मिन् स्थाने स्थितो ह्यहम्॥ ७<br>तेषां त्वं विविधाँल्लोकान् सम्प्रदास्यसि मोदते।<br>जागरं ये प्रकुर्वन्ति तवाग्रे दीपधारिणः॥ ८हे सुव्रते! वाराणसीमें गभस्तीशके दक्षिणमें मानवोंके कल्याणके लिये [स्वयं] आप विराजमान हैं और उस स्थानमें मैं भी स्थित हूँ। हे देवि! जो लोग वहाँ उत्तरकी ओर मुख करके विराजमान आपकी आराधना करते हैं तथा आपकी पूजा करते हैं, उन्हें प्रसन्न होकर आप विविध लोक प्रदान करती हैं॥ ६-७^{१}/_{२}॥
तेषां त्वमक्षयाँल्लोकान् वितरिष्यसि भामिनि।<br>आलयं ये प्रकुर्वन्ति तवार्थे वरवर्णिनि॥ ९<br>तेषां त्वमक्षयाँल्लोकान् प्रयच्छसि न संशयम्।हे भामिनि! आपके सामने दीप धारण किये हुए जो लोग जागरण करते हैं, उन्हें आप अक्षय लोक प्रदान करती हैं। हे वरवर्णिनि! जो लोग आपके लिये आलयका निर्माण करते हैं, उन्हें आप अक्षय लोक प्रदान करती हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ ८-९^{१}/_{२}॥
आलयं ये प्रकुर्वन्ति भूमिं सम्मार्जयन्ति च॥ १०<br>तेषामष्टसहस्त्रस्य सुवर्णस्य फलं लभेत्।<br>त्वामुद्दिश्य तु यो देवि ब्राह्मणान् ब्राह्मणीश्च ह॥ ११<br>भोजयिष्यति यो देवि तस्य पुण्यफलं शृणु।<br>तव लोके वसेत्कल्पमिहैवागच्छते पुनः॥ १२<br>नरो वा यदि वा नारी सर्वभोगसमन्वितौ।<br>धनधान्यसमायुक्तौ जायेते च महाकुले॥ १३<br>सुभगौ दर्शनीयौ च रूपयौवनदर्पितौ।<br>भवेतामीदृशौ देवि सर्वसौख्यस्य भाजने॥ १४जो लोग आलयका निर्माण करते हैं तथा वहाँकी भूमिका सम्मार्जन करते हैं, उन्हें आठ हजार स्वर्णमुद्राकी प्राप्ति होती है। हे देवि! आपको उद्देश्य करके जो ब्राह्मणों तथा ब्राह्मणियोंको भोजन कराता है, उसके पुण्यफलको सुनिये—वह कल्पपर्यन्त आपके लोकमें वास करता है, इसके बाद इस लोकमें आता है! पुरुष हो अथवा स्त्री—वे सभी प्रकारके भोगोंसे युक्त तथा धनधान्यसे समन्वित रहते हैं और श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न होते हैं। हे देवि! वे सौभाग्यशाली, दर्शनीय, रूपयौवनसे सम्पन्न तथा सभी प्रकारके सुखोंके भाजन होते हैं॥ १०-१४॥
मानुषं दुर्लभं प्राप्य विद्युत्सम्पातचञ्चलम्।<br>येन दृष्टासि सुश्रोणि तस्य जन्मभयं कुतः॥ १५<br>मायापुर्यां तु ललितां दृष्ट्वा यल्लभते फलम्।<br>तत्फलं तस्य देवेशि यस्त्वां तत्र निरीक्षयेत्॥ १६हे सुश्रोणि! विद्युत्-सम्पाततुल्य चंचल दुर्लभ मनुष्यशरीर प्राप्त करके जिसने आपका दर्शन कर लिया, उसे जन्मका भय कहाँसे हो सकता है? मायापुरीमें ललिता [देवी]-का दर्शन करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, हे देवेशि! यदि वह यहाँपर आपका दर्शन करे, तो उसे वही फल प्राप्त हो जाता है॥ १५-१६॥
पृथ्वीं प्रदक्षिणं कृत्वा यत्फलं लभते नरः।<br>तत्फलं ललितायां च वाराणस्यां न संशयः॥ १७पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह वाराणसीमें ललिताकी प्रदक्षिणासे प्राप्त कर
८०६श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
लेता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ १७ ॥
तेन ते नाम विख्यातं तथा मुखनिरीक्षिणी।<br>मुखप्रेक्षणिकां दृष्ट्वा सौभाग्यं चोत्तमं लभेत् ॥ १८अतः आपका नाम मुखनिरीक्षिणी विख्यात हो गया, मुखप्रेक्षणीका दर्शन करके मनुष्य उत्तम सौभाग्य प्राप्त करता है ॥ १८ ॥
माघे मासि चतुर्थ्यां तु तस्मिन् काल उपोषितः।<br>अर्चयित्वा तु यो देवि जागरं तत्र कारयेत् ॥ १९<br><br>तस्यर्द्धिमत् कुलं देवि त्रैलोक्ये याति दुर्लभम्।हे देवि! माघमासमें चतुर्थी तिथिमें उस समय उपवास करके तथा पूजन करके जो वहाँपर जागरण करता है, हे देवि! वह तीनों लोकोंमें समृद्धिशाली तथा दुर्लभ कुलमें जन्म लेता है ॥ १९१/२ ॥
मुखप्रेक्षा चोत्तरतो द्वौ लिङ्गौ तत्र विश्रुतौ ॥ २०<br><br>पश्चान्मुखौ तु तौ देवि वृत्रत्वाष्ट्रेश्वरावुभौ।<br>काञ्चनीं पृथिवीं दत्त्वा यत्पुण्यं लभते नरः ॥ २१<br><br>सुवर्णस्य च यत्पुण्यं लिङ्गयोर्दर्शनेन तत्।<br>त्रिरात्रं यः प्रकुरुते तत्रैव वरवर्णिनि ॥ २२<br><br>गौरीलोकोऽक्षयस्तस्य पुनरावृत्तिदुर्लभः।<br>तस्माद्यत्नः सदा कार्यः सर्वदर्शनकाङ्क्षया ॥ २३मुखप्रेक्षाके उत्तरदिशामें दो प्रसिद्ध लिङ्ग हैं, हे देवि! पश्चिमकी ओर मुखवाले वे दोनों लिङ्ग वृत्रेश्वर तथा त्वाष्ट्रेश्वर नामवाले हैं। सुवर्णमयी भूमिका दान करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है और सुवर्णके दानका जो पुण्य होता है, वह पुण्यफल उन दोनोंके दर्शनसे प्राप्त कर लेता है। हे वरवर्णिनि! जो वहाँपर तीन रात व्यतीत करता है, उसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति न करानेवाले अक्षय गौरीलोककी प्राप्ति होती है। इसलिये इन सबके दर्शनकी अभिलाषाके लिये सदा प्रयत्न करना चाहिये ॥ २०–२३ ॥
ललितायाश्चोत्तरेण चर्चिकाधिष्ठिता शुभा।<br>मानवानां हितार्थाय वरदा सर्वदेहिनाम् ॥ २४<br><br>चर्चिकायास्तथैवाग्रे तिष्ठते लिङ्गमुत्तमम्।<br>पूर्वामुखं तु तद्देवि रेवन्तेन प्रतिष्ठितम् ॥ २५ललिताके उत्तरमें मनुष्योंके कल्याणके लिये सभी प्राणियोंको वर देनेवाली शुभ चर्चिका [देवी] विराजमान हैं। इसी प्रकार चर्चिकाके आगे एक उत्तम लिङ्ग स्थित है, हे देवि! पूर्वकी ओर मुखवाला वह [लिङ्ग] रेवन्तके द्वारा स्थापित किया गया है ॥ २४-२५ ॥
तस्याग्रतो वरारोहे लिङ्गं पञ्चनदीश्वरम्।<br>पश्चान्मुखं तु तद्देवि सर्वस्नानफलप्रदम् ॥ २६हे वरारोहे! उसके आगे पंचनदीश्वर नामक लिङ्ग है। हे देवि! पश्चिमकी ओर मुखवाला वह [लिङ्ग] समस्त स्नानोंका फल प्रदान करनेवाला है ॥ २६ ॥
ललितायाश्च संलग्नं पूर्वे कूपस्तु तिष्ठति।<br>तस्मिन् कूपे जलं स्पृष्ट्वा अतिरात्रफलं लभेत् ॥ २७ललिताके समीपमें पूर्वकी ओर एक कूप स्थित है, उस कूपके जलका स्पर्श करके मनुष्य अतिरात्रयज्ञका फल प्राप्त करता है ॥ २७ ॥
ततो दक्षिणतो देवि तीर्थं पञ्चनदं स्मृतम्।<br>नरः पञ्चनदे स्नात्वा दृष्ट्वा लिङ्गं गभस्तिनः ॥ २८<br><br>अनन्तं फलमाप्नोति यत्र तत्राभिजायते।हे देवि! उसके दक्षिणमें पंचनद [नामक] तीर्थ बताया गया है, [उस] पंचनदमें स्नान करके तथा गभस्तीश्वरका दर्शन करके मनुष्य जहाँ-कहीं भी हो, अनन्त फल प्राप्त करता है ॥ २८१/२ ॥
उपमन्युश्च सुश्रोणि लिङ्गं स्थापितवांस्तथा ॥ २९<br><br>मुखानि तस्य तिष्ठन्ति तस्मिँल्लिङ्गे यशस्विनि।<br>तच्च पश्चान्मुखं देवि ललितादक्षिणेन तु ॥ ३०हे सुश्रोणि! उपमन्युने एक लिङ्ग स्थापित किया है, हे यशस्विनि! उस लिङ्गमें उसके मुख स्थित हैं। हे देवि! पश्चिमाभिमुख वह लिङ्ग ललिताके दक्षिणमें

अध्याय १०] गभस्तीश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य एवं कलशेश्वरलिङ्गकी उत्पत्ति-कथा ८०७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तेन दृष्टेन देवेशि न पुनर्जन्मभाग्भवेत्।<br>तस्यैव तु समीपे तु पश्चिमे वरवर्णिनि॥ ३१है। हे देवेशि! उस [लिङ्ग]-के दर्शनसे मनुष्य पुनर्जन्म नहीं प्राप्त करता है॥ २९-३०½॥<br><br>हे वरवर्णिनि! उसीके समीप पश्चिममें दूसरा लिङ्ग विद्यमान है, हे सुश्रोणि! वह [महर्षि] व्याघ्रपादके द्वारा स्थापित किया गया है, हे देवि! उसके दर्शनसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ३१-३२॥
अन्यल्लिङ्गं तु सुश्रोणि व्याघ्रपादप्रतिष्ठितम्।<br>तस्य सन्दर्शनाद्देवि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ३२
गभस्तीशाग्रतो देवि विश्वकर्मप्रतिष्ठितम्।<br>अन्यानि तत्र लिङ्गानि स्थापितानि महात्मभिः॥ ३३हे देवि! गभस्तीशके आगे विश्वकर्माके द्वारा स्थापित लिङ्ग विद्यमान है। वहाँपर महात्माओंके द्वारा अन्य लिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं॥ ३३॥
गभस्तीशस्य लिङ्गस्य नैर्ऋते वरवर्णिनि।<br>शशाङ्केश्वरनामानं लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ३४हे वरवर्णिनि! गभस्तीशके लिङ्गके नैर्ऋतभागमें शशाङ्केश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। गन्धर्व-नगर जाकर राजा चित्ररथने लिङ्ग स्थापित किया था, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य अभीष्ट फल प्राप्त करता है॥ ३४-३५॥
गन्धर्वनगरं गत्वा राज्ञा चित्ररथेन हि।<br>तेन दृष्टेन देवेशि ईप्सितं फलमाप्नुयात्॥ ३५
चित्रेश्वरात् पश्चिमतो लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>जैमिनिस्थापितं पूर्वं महापातकनाशनम्॥ ३६चित्रेश्वरके पश्चिममें महापातकोंका नाश करनेवाला एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, उसे पूर्वकालमें [महर्षि] जैमिनिने स्थापित किया था। जैमिनीशके आगे [ऋषि] सुमन्तुके द्वारा स्थापित लिङ्ग विद्यमान है। वहाँ अन्य ऋषियोंने भी बहुत-से लिङ्ग स्थापित किये हैं॥ ३६-३७॥
अग्रे तु जैमिनीशस्य कृतं लिङ्गं सुमन्तुना।<br>अन्यैश्च ऋषिभिस्तत्र लिङ्गानि सुबहूनि च॥ ३७
तेषां तु दक्षिणे भागे लिङ्गं पश्चान्मुखस्थितम्।<br>बुधेश्वरं तथा कोणे सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ ३८उनके दक्षिणभाग कोणमें सभी प्रकारका सुख प्रदान करनेवाला बुधेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। बुधेश्वरके वायव्यकोणमें समीपमें ही राक्षस
बुधेश्वरात्तु कोणेन वायव्ये नातिदूरतः।<br>रावणेश्वरनामानं स्थापितं राक्षसेन तु॥ ३९रावणके द्वारा रावणेश्वर नामक लिङ्ग स्थापित किया
८०८श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गया है॥ ३८-३९॥
रावणेश्वरपूर्वे तु लिङ्गं देवि चतुर्मुखम्।<br>तेन दृष्टेन देवेशि यातुधानैर्न हन्यते॥ ४०हे देवि! रावणेश्वरके पूर्वमें एक चतुर्मुख लिङ्ग है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य राक्षसोंके द्वारा नहीं मारा जा सकता है॥ ४०॥
रावणेशाद्दक्षिणतो लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>वराहेश्वरनामानं सर्वपातकनाशनम्॥ ४१<br><br>वराहाशाद्दक्षिणतो लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>तस्यैवाराधनाद्देवि षण्मासाद्योगमाप्नुयात्॥ ४२रावणेश्वरके दक्षिणमें सभी पापोंका नाश करनेवाला वराहेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। वराहेश्वरके दक्षिणमें पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे देवि! मनुष्य उसकी आराधनासे छः महीनेमें योग प्राप्त कर लेता है॥ ४१-४२॥
तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गं वै दक्षिणामुखम्।<br>गालवेश्वरनामानं गुरुभक्तिप्रदायकम्॥ ४३उसके दक्षिण दिशाभागमें गुरुभक्ति प्रदान करनेवाला गालवेश्वर नामक दक्षिणाभिमुख लिङ्ग विद्यमान है॥ ४३॥
गालवेश्वरदेवस्य लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>अयोगसिद्धिनामानं सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ ४४<br><br>तस्यैव दक्षिणे देवि नाम्ना वातेश्वरं शुभम्।<br>तस्यैव चाग्रतो देवि मुखलिङ्गं च तिष्ठति॥ ४५<br><br>सोमेश्वरेति विख्यातं लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>तं दृष्ट्वा देवदेवेशं सर्वव्याधिक्षयो भवेत्।<br>तस्यैव नैर्ऋते भागे लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ४६गालवेश्वरदेवके समीपमें सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला अयोगसिद्धि नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! उसीके दक्षिणमें वातेश्वर नामक शुभ लिङ्ग विद्यमान है। हे देवि! उसीके आगे मुखलिङ्ग स्थित है, वह लिङ्ग सोमेश्वर नामसे विख्यात है तथा पश्चिमाभिमुख स्थित है। उन देवदेवेशका दर्शन करनेसे सभी व्याधियोंका नाश हो जाता है॥ ४४-४५ १/२॥
अङ्गारेश्वरनामानं सर्वसिद्धैर्नमस्कृतम्।<br>पूर्वेण तस्य देवस्य लिङ्गमन्यच्च तिष्ठति॥ ४७उसीके नैर्ऋतभागमें सभी सिद्धोंसे नमस्कृत अंगारेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। उसके पूर्वमें शिवजीका कुक्कुटेश्वर नामक अन्य लिङ्ग स्थित है, वह गति तथा सुख प्रदान करनेवाला है॥ ४६-४७ १/२॥
कुक्कुटेश्वरनामानं गतिसौख्यप्रदायकम्।<br>तस्यैव चोत्तरे देवि पाण्डवैः सुमहात्मभिः॥ ४८<br><br>पञ्च लिङ्गानि पुण्यानि पश्चिमाभिमुखानि तु।<br>तेषामेते तु देवेशि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ४९<br><br>संवर्तेश्वरनामानं स्थापितं यन्महर्षिणा।<br>ममैवात्यन्तसान्निध्यं तस्मिँल्लिङ्गे सुरेश्वरि॥ ५०<br><br>तल्लिङ्गमर्चयेद्यो वै तस्य सिद्धिः करे स्थिता।हे देवि! उसीके उत्तरमें महात्मा पाण्डवोंके द्वारा पश्चिमाभिमुख पाँच पुण्यप्रद लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। हे देवेशि! उनके सामने संवर्तेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, जिसे महर्षि [संवर्त]-ने स्थापित किया है। हे सुरेश्वरि! उस लिङ्गमें मेरा अत्यन्त सान्निध्य रहता है। जो उस लिङ्गका अर्चन करता है, सिद्धि उसके हाथमें स्थित रहती है॥ ४८-५० १/२॥
संवर्तेशात् पश्चमतो लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ५१<br><br>श्वेतेश्वरं तु विख्यातं श्वेतेन स्थापितं पुरा।<br>तेन दृष्टेन लिङ्गेन गाणपत्यं लभेद ध्रुवम्॥ ५२संवर्तेश्वरके पश्चिममें एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। वह श्वेतेश्वर नामसे विख्यात है, उसे पूर्वकालमें श्वेत [मुनि]-ने स्थापित किया था। उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य निश्चित रूपसे गाणपत्य प्राप्त करता है॥ ५१-५२॥