भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 801

अध्याय ८ ] कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन ७९९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भोजयेच्च यतो विप्रान् यतीन् पाशुपतान् बुधः।<br>स्नानं दानं तपो होमः स्वाध्यायं पितृतर्पणम्॥ १०१<br><br>पिण्डनिर्वापणं चैव सर्वं भवति चाक्षयम्।<br>क्षेत्रस्य चास्य सङ्क्षेपान्मया ते कथितं स्फुटम्॥ १०२हमारे कुलमें उत्पन्न जो कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति मन्दाकिनीके जलमें स्नान करके पाशुपत विप्रों तथा यतियोंको भोजन कराता है, उसका स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण, पिण्डनिर्वापण—यह सब अक्षय हो जाता है॥ १००-१०११/२॥<br><br>मैंने इस क्षेत्रका माहात्म्य आपसे संक्षेपमें बता दिया।
दक्षिणं भूमिभागं तु मध्यमेशस्य यद्भवेत्।<br>तत्र पूर्वामुखं लिङ्गं विश्वेदेवैः प्रतिष्ठितम्॥ १०३<br><br>पश्चान्मुखं तु देवेशं वीरभद्रप्रतिष्ठितम्।<br>पश्चान्मुखेन दृष्टेन वीरभद्रसलोकताम्॥ १०४मध्यमेश्वरके दक्षिणमें जो भूमिभाग है, वहाँ विश्वेदेवोंके द्वारा स्थापित एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग है और वीरभद्रके द्वारा स्थापित पश्चिमाभिमुख लिङ्ग भी है, उस पश्चिमाभिमुख देवेशके दर्शनसे मनुष्य वीरभद्रका सालोक्य प्राप्त करता है॥ १०२-१०४॥
तयोस्तु दक्षिणे देवि भद्रकालीह्रदं स्मृतम्।<br>कुण्डस्य पश्चिमे तीरे शौनकेन प्रतिष्ठितम्॥ १०५<br><br>मतङ्गेश्वरनामानं लिङ्गं तत्रैव तिष्ठति।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ १०६हे देवि! उन दोनोंके दक्षिणमें भद्रकालीह्रद बताया गया है। वहींपर उस कुण्डके पश्चिमी तटपर शौनकके द्वारा एक लिङ्ग स्थापित किया गया है। मतंगेश्वर नामक लिङ्ग भी वहींपर स्थित है, पूर्वकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाला है॥ १०५-१०६॥
मतङ्गेश्वरकोणे तु वायव्ये तु यशस्विनि।<br>प्रतिष्ठितानि लिङ्गानि नरैस्तत्र महात्मभिः॥ १०७<br><br>तस्यैव दक्षिणे भागे जयन्तेन प्रतिष्ठितम्।<br>देवराजस्य पुत्रेण आत्मनो जयमिच्छता॥ १०८हे यशस्विनि! वहाँ मतंगेश्वरके वायव्यकोणमें महात्मा पुरुषोंके द्वारा [अनेक] लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। उसीके दक्षिणभागमें अपनी विजयकी कामना करनेवाले देवराजपुत्र जयन्तके द्वारा [एक] लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ १०७-१०८॥
ब्रह्मतारेश्वरं चैवं तस्मिन् स्थाने सुरेश्वरि।<br>पितृभिः याज्ञवल्क्येन तत्र लिङ्गं प्रतिष्ठितम्॥ १०९हे सुरेश्वरि! उस स्थानमें ब्रह्मतारेश्वर [लिङ्ग] विद्यमान है, वह लिङ्ग पितरों तथा याज्ञवल्क्यके द्वारा स्थापित किया गया है॥ १०९॥
तस्य दक्षिणदिग्भागे सिद्धिकूटः प्रकीर्तितः।<br>सिद्धाः पाशुपतास्तत्र मम लिङ्गार्चने रताः॥ ११०उसके दक्षिण दिशाभागमें सिद्धिकूट बताया गया है, वहाँपर सिद्धपाशुपत मेरे लिङ्गके अर्चनमें संलग्न रहते हैं॥ ११०॥
तेषां वै तत्र कूतोऽयं सिद्धकूटः स सिध्यते।<br>तत्र ध्यानरताः केचिज्जपं कुर्वन्ति चापरे॥ १११<br><br>स्वाध्यायमन्ये कुर्वन्ति तपः कुर्वन्ति चापरे।<br>आकाशशयनं केचित्केचिद्भावं समाश्रिताः॥ ११२<br><br>अधोमुखास्तथैवान्ये धूमपेयास्तथापरे।<br>प्रदक्षिणामन्ये कुर्वन्ति काष्ठमौनं तथापरे॥ ११३<br><br>कुर्वन्ति पुष्पाहरणं गडूकानां तथा परे।<br>तैः सर्वैः स्थापितं लिङ्गमर्चापूजनतत्परैः॥ ११४वहाँ उनका जो कूट है, वह सिद्धकूट कहा जाता है। वहाँपर कुछ लोग ध्यानपरायण रहते हैं, दूसरे लोग जप करते हैं, अन्य लोग स्वाध्याय करते हैं, कुछ लोग तप करते हैं, कुछ लोग आकाशशयन करते हैं, कुछ लोग भक्तिभावमें लीन रहते हैं, कुछ लोग अधोमुख होकर स्थित रहते हैं, कुछ लोग धूम ग्रहण करते हुए तपमें रत रहते हैं, कुछ लोग प्रदक्षिणा करते रहते हैं, कुछ लोग काष्ठकी भाँति मौन रहते हैं और कुछ लोग गडूकेके पुष्पोंको एकत्र करनेमें संलग्न रहते हैं। अर्चन-पूजनमें तत्पर उन सभीके द्वारा वहाँ लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ १११-११४॥