श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ८०० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| तेषां तत्र तदा भक्तिं ज्ञात्वा देवे हि सुव्रते।<br>सान्निध्यं कृतवांस्तस्मिंस्तदनुग्रहकाम्यया॥ ११५ | हे सुव्रते! उस समय वहाँपर लिङ्गके प्रति उन सबकी भक्ति जानकर मैंने अनुग्रहकी इच्छासे उस लिङ्गमें वास किया॥ ११५॥ |
| सिद्धेश्वरं तु विख्यातं सर्वपापहरं शुभम्।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं सिद्धकूटे व्यवस्थितम्॥ ११६ | सिद्धेश्वर नामसे विख्यात तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला वह शुभ लिङ्ग पूर्वकी ओर मुख किये सिद्धकूटमें स्थित है॥ ११६॥ |
| मानवानां हितार्थाय तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम्।<br>देवस्य पश्चिमे भागे वापी तिष्ठति सुन्दरि॥ ११७<br><br>तत्र वापीजले स्नात्वा दृष्ट्वा सिद्धेश्वरं नरः।<br>अस्मिन् क्षेत्रे तु निर्माल्यं पापं सङ्क्रमते तु यत्॥ ११८<br><br>तत् सर्वं विलयं याति सिद्धेश्वरस्य दर्शनात्॥ ११९ | मैं मनुष्योंके कल्याणके लिये उस स्थानपर स्थित हूँ। हे सुन्दरि! उस लिङ्गके पश्चिमभागमें [एक] वापी विद्यमान है, वहाँ वापीके जलमें स्नान करके तथा सिद्धेश्वरका दर्शन करके मनुष्य इस क्षेत्रमें पापरहित हो जाता है। उसे जो भी पाप लिप्त किये होता है, वह सब सिद्धेश्वरके दर्शनसे विनष्ट हो जाता है॥ ११७—११९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुहायतनवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गपुराणके वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुहायतनवर्णन' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८॥
नौवाँ अध्याय
व्याघ्रेश्वर, दण्डीश्वर, जैगीषव्येश्वर तथा शातातपेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन
| ईश्वर उवाच<br>सिद्धकूटस्य पूर्वेण देवं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>व्याघ्रेश्वरेति विख्यातं सर्वदेवैः स्तुतं शुभे॥ १ | ईश्वर बोले—हे शुभे! सिद्धकूटके पूर्वमें व्याघ्रेश्वर नामसे विख्यात एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह सभी देवताओंके द्वारा स्तुत है॥ १॥ |
| तेन दृष्टेन लभते उत्तमं पदमव्ययम्।<br>व्याघ्रेश्वराद्दक्षिणे च स्वयम्भूस्तत्र तिष्ठति॥ २<br><br>दिव्यं लिङ्गं तु तत्रस्थं देवानामपि दुर्लभम्।<br>रहस्यं सर्वदेवानां भूमिं भित्त्वा तु चोत्थितम्॥ ३<br><br>तेन लिङ्गेन दृष्टेन पूजितेन स्तुतेन च।<br>कृतकृत्यो भवेद्देवि संसारे न पुनर्विशेत्॥ ४ | उसके दर्शनसे मनुष्य उत्तम अव्यय (शाश्वत) पद प्राप्त करता है। वहाँ व्याघ्रेश्वरके दक्षिणमें स्वयम्भू लिङ्ग स्थित है। वहाँपर विद्यमान वह दिव्य लिङ्ग देवताओंके लिये भी दुर्लभ है, देवताओंके लिये रहस्यमय वह लिङ्ग भूमिको भेदन करके प्रकट हुआ है। हे देवि! उस लिङ्गके दर्शन, पूजन तथा स्तवनसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और संसारमें पुनः जन्म नहीं लेता है॥ २—४॥ |
| पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं ज्येष्ठस्थानमिदं शुभम्।<br>मानवानां हितार्थाय तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम्॥ ५ | वह लिङ्ग पूर्वाभिमुख है, यह शुभ ज्येष्ठस्थान कहा जाता है। मैं मनुष्योंके हितके लिये उस स्थानमें स्थित हूँ॥ ५॥ |