श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय १० ] गभस्तीश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य एवं कलशेश्वरलिङ्गकी उत्पत्ति-कथा ८०९
| पश्चिमे तस्य दिग्भागे कलशेश्वरसंज्ञितम्।<br>कलशादुत्थितं लिङ्गं कालस्य भयदायकम्॥ ५३ | उसके पश्चिम दिशाभागमें कलशसे उत्पन्न कलशेश्वर नामक लिङ्ग है, वह कालको भी भय प्रदान करनेवाला है॥ ५३॥ |
|---|---|
| <div align="center">सूर्य उवाच</div>कथं कालस्य भयदं कलशादुत्थितः कथम्।<br>एतद्देव समाचक्ष्व यदनुग्रहवान् मयि॥ ५४ | **सूर्य बोले—**वह [कलशेश्वरलिङ्ग] कालके लिये कैसे भयदायक है और कलशसे किस प्रकार प्रकट हुआ, हे देव! यदि आप मेरे प्रति कृपालु हैं, तो इसे बतायें॥ ५४॥ |
| <div align="center">विष्णुरुवाच</div>तस्यैव देवदेवस्य प्रभावं शृणु भास्कर।<br>श्वेतो नाम महातेजा ऋषिः परमधार्मिकः॥ ५५<br><br>पूजयामास सततं लिङ्गं त्रिपुरघातिनः।<br>तस्य पूजाप्रसक्तस्य कदाचित्कालपर्यये॥ ५६<br><br>आजगाम तमुद्देशं कालः परमदारुणः।<br>रक्तान्तनयनो घोरः सर्पयष्टिकरो महान्॥ ५७<br><br>दंष्ट्राकरालो विकृतो भिन्नाञ्जनसमप्रभः।<br>रक्तवासा महाकायः सर्वाभरणभूषितः॥ ५८ | **विष्णु बोले—**हे भास्कर! उस देवदेवके प्रभावको सुनो। श्वेत नामक महातेजस्वी तथा परम धार्मिक ऋषिने त्रिपुरका विनाश करनेवाले शिवजीके लिङ्गकी निरन्तर पूजा की। किसी समय पूजामें संलग्न उन मुनिके पास महाभयानक काल आया। वह पूर्ण रक्तनेत्रोंवाला, महाभयंकर, हाथमें सर्प-यष्टि धारण किये हुए, विकराल दाढ़ोंवाला, विकृत, अंजनके समान प्रभाव़ाला, रक्त वस्त्र धारण किये हुए, विशाल देहवाला तथा सभी आभरणोंसे विभूषित था॥ ५५-५८॥ |
| पाशहस्तस्तदाभ्येत्य श्वेते पाशमवासृजत्।<br>कण्ठार्पितेन पाशेन श्वेतः कालमथाब्रवीत्॥ ५९<br><br>क्षणमात्रं प्रतीक्षस्व मम त्रिभुवनान्तक।<br>निवर्तयाम्यहं यावत् पूजनं मन्मथद्विषः॥ ६० | हाथमें पाश धारण किये हुए उस कालने आ करके श्वेतके ऊपर पाश फेंका। तब कण्ठमें लिपटे हुए उस पाशसे बद्ध श्वेतने कालसे कहा—हे त्रिभुवनविनाशक! तुम क्षणभर मेरी प्रतीक्षा करो, जबतक मैं कामदेवके शत्रु शिवकी पूजा सम्पन्न न कर लूँ॥ ५९-६०॥ |
| तमब्रवीत्तदा कालः प्रहसन् वै सुरेश्वर।<br>न श्रुतं तत्त्वया मन्ये वृद्धानां ज्ञातजन्मनाम्॥ ६१<br><br>श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्लिकम्।<br>न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वा कृतम्॥ ६२ | हे सुरेश्वर! तब कालने हँसते हुए उनसे कहा—मैं समझता हूँ कि तुमने ज्ञातजन्मा वृद्धोंका यह कथन नहीं सुना है कि कलका कार्य आज ही और अपराह्नका कार्य पूर्वाह्नमें कर लेना चाहिये। मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती है, चाहे उसका कार्य पूर्ण हो गया हो अथवा न हुआ हो॥ ६१-६२॥ |
| गर्भे वाप्यथवा बाल्ये वार्द्धके यौवने तथा।<br>आयुष्ये कर्मणि क्षीणे लोकोऽयं लीयते मया॥ ६३ | प्राणी गर्भमें हो अथवा बाल्यावस्थामें, यौवनावस्था अथवा वृद्धावस्थामें हो—उसके आयु तथा कर्मके क्षीण होनेपर मैं उसका लय कर देता हूँ॥ ६३॥ |
| नौषधानि न मन्त्राश्च न होमा न पुनर्जपः।<br>त्रायन्ते मृत्युनोपेतं जरया वापि मानवाः॥ ६४ | मृत्यु तथा जरासे ग्रसित मनुष्योंकी रक्षा न तो औषधि, न मन्त्र, न होम, न जप अथवा न तो मनुष्य ही कर सकते हैं॥ ६४॥ |
| ८१० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| बहूनीन्द्रसहस्राणि पितामहशतानि च।<br>मयातीतानि कर्तव्यो नात्र मन्युस्त्वयानघ॥ ६५ | अनेक हजार इन्द्र तथा सैकड़ों पितामह मेरे सामने व्यतीत हो गये, हे अनघ ! तुम्हें इस विषयमें क्रोध नहीं करना चाहिये ॥ ६५ ॥ | | विधत्स्व पूजनं चास्य महादेवस्य शूलिनः।<br>देहन्यासो बहुविधो मया वै श्वेत कारितः॥ ६६<br><br>स्वयं प्रभुर्न चैवाहं कर्मायत्तगतिर्मम।<br>कर्मणा हि तथा नाशो नास्ति भूतस्य कस्यचित्॥ ६७ | तुम इन शूलधारी महादेवका पूजन सम्पन्न कर लो। हे श्वेत ! मैंने अनेकविध देहन्यास कराया। चूँकि मैं स्वयं प्रभु नहीं हूँ और मेरी गति कर्मके अधीन है, कर्मके आधारपर किसी भी प्राणीका नाश नहीं होता है॥ ६६-६७॥ | | कर्ममार्गानुसारेण धात्राहं सम्प्रयोजितः।<br>नयामि सर्वमाक्रम्य नीयमानस्त्रिलोचने॥ ६८ | विधाताके द्वारा मैं भी कर्ममार्गके अनुसार नियुक्त किया गया हूँ। सबको ले जानेवाला मैं सभीपर आक्रमण करके उन्हें त्रिनेत्र शिवके पास ले जाता हूँ॥ ६८॥ | | एवमुक्तस्तु कालेन नीयमानस्त्रिलोचनम्।<br>जगाम सर्वभावेन शरणं भक्तवत्सलम्॥ ६९ | कालके इस प्रकार कहनेपर वे उसके द्वारा ले जाये जाते हुए श्वेतमुनि पूर्णरूपसे भक्तवत्सल त्रिलोचनकी शरणको प्राप्त हुए॥ ६९॥ | | श्वेते तु शरणं प्राप्ते लिङ्गं सत्रिपुरान्तकम्।<br>चिन्तयामास कालस्य वधोपायं सुरेश्वरः॥ ७० | तब श्वेतके त्रिपुरान्तकसहित लिङ्गके शरणागत होनेपर सुरेश्वर [शिव] कालके वधका उपाय सोचने लगे॥ ७०॥ | | कलशं यत् स्थितं तस्य उदकेन प्रपूरितम्।<br>तं भित्त्वा तु समुत्तस्थौ क्रोधविस्फारितेक्षणः॥ ७१<br><br>तृतीयलोचनज्वालाप्रकाशितजगत्त्रयः ।<br>दृष्टमात्रस्तदा तस्य कालो वीक्षणतेजसा॥ ७२<br><br>सहसा भस्मभूतः स सर्वभूतनिबर्हणः।<br>श्वेतस्य गत्वा सामीप्यं गणेशत्वं तथैव च॥ ७३<br><br>कृत्वा विनिग्रहं कालं तत्रैवान्तरधीयत।<br>ततः प्रभृति देवेशि कालः सङ्कलयेत् प्रजाः॥ ७४ | वहाँपर उन श्वेतका जो जलपूर्ण कलश था, उसका भेदन करके क्रोधसे विस्फारित नेत्रोंवाले शिव प्रकट हो गये, उस समय वे अपने तीसरे नेत्रकी ज्वालासे तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रहे थे। तब उन्हें देखते ही उनके नेत्रके तेजसे सभी प्राणियोंका अन्त करनेवाला वह काल सहसा भस्म हो गया। इसके बाद श्वेतके पास जाकर शिवने उन्हें गणेशत्व प्रदान किया और कालका विनिग्रह करके वे वहीं अन्तर्धान हो गये। हे देवेशि! तभीसे काल प्रजाओंको संकलित करता है॥ ७१-७४॥ | | न कश्चित् पश्यते लोके विदेहत्वाज्जगत्त्रये।<br>तस्मात्तत्र स्वयंभूतो देवदेवः सुरारिहा॥ ७५<br><br>श्वेतस्य कलशं भित्त्वा कलशेश्वरमुच्यते।<br>तस्मात्तत्र स्थितं देवं यो निरीक्षति मानवः॥ ७६ | उसके विदेहत्वके कारण तीनों लोकोंमें कोई भी उसे देख नहीं पाता है। देवशत्रुओंका संहार करनेवाले देवदेव [शिव] श्वेतके कलशका भेदन करके वहाँ स्वयं प्रकट हुए, इसलिये वे कलशेश्वर कहे जाते हैं। अतः हे भामिनि! जो मनुष्य वहाँपर स्थित देव (लिङ्ग)-का दर्शन करता है, उसका जन्म, मृत्यु, जरा, |
११- कलशेश्वरके समीपस्थ लिङ्गोंके माहात्म्यका वर्णन
अध्याय ११ ] कलशेश्वरके समीपस्थ लिङ्गोंके माहात्म्यका वर्णन [ ८९१
| जन्ममृत्युजराव्याधिर्नश्यते तस्य भामिनि।<br>यत्र श्वेतकृतं लिङ्गं भक्त्या योऽर्चयते नरः॥ ७७<br><br>जन्ममृत्युभयं भित्त्वा संसारं न विशेत्पुनः॥ ७८ । | व्याधि—यह सब नष्ट हो जाता है ॥ ७५-७६^{१}/_{२} ॥<br>जो मनुष्य वहाँ श्वेतमुनिके द्वारा स्थापित किये गये लिङ्गका भक्तिपूर्वक अर्चन करता है, वह जन्म-मृत्युके भयका भेदन करके पुनः संसारमें प्रवेश नहीं करता है॥ ७७-७८॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुहायतनवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुहायतनवर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥
ग्यारहवाँ अध्याय
कलशेश्वरके समीपस्थ लिङ्गोंके माहात्म्यका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| उत्तरे तस्य देवस्य चित्रगुप्तेश्वरं स्थितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं देवं वाराणस्यां सुरेश्वरि॥ १ | हे सुरेश्वरि! वाराणसीमें उस लिङ्गके उत्तरमें पश्चिमकी ओर मुखवाला चित्रगुप्तेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है॥ १॥ |
| चित्रगुप्तं न पश्येत योऽत्र द्रक्ष्यति मानवः।<br>पश्चिमे चित्रगुप्तस्य अन्यल्लिङ्गं स्थितं शुभे॥ २<br><br>छायया स्थापितं लिङ्गं तं दृष्ट्वा नातपं भवेत्।<br>विनायकश्च तत्रैव पश्चिमेन यशस्विनि॥ ३<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण विघ्नैर्नैवाभिभूयते। | यहाँपर जो मनुष्य चित्रगुप्तेश्वरका दर्शन करता है, उसे पुनः संसारको नहीं देखना पड़ता है। हे शुभे! चित्रगुप्तके पश्चिममें छायाके द्वारा स्थापित किया गया अन्य लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गका दर्शन करनेसे आतपका कष्ट नहीं होता है। हे यशस्विनि! वहींपर पश्चिममें विनायक विद्यमान हैं, उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य विघ्नोंसे बाधित नहीं होता है॥ २-३^{१}/_{२}॥ |
| कुण्डं तस्य तु पूर्वेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ४<br><br>मुखलिङ्गं तु तद्देवि विरूपाक्षं स्वयं प्रिये।<br>दक्षिणेन तु तस्यैव कूपस्तिष्ठति भामिनि॥ ५<br><br>दर्शनात्तस्य कूपस्य यमद्वारं न पश्यति।<br>कूपं चापि स्थितं तत्र उपस्पर्शनपुण्यदम्॥ ६ | उनके पूर्वमें एक कुण्ड तथा पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे देवि! हे प्रिये! वह स्वयं विरूपाक्ष नामक मुखलिङ्ग है। हे भामिनि! उसीके दक्षिणमें एक कूप स्थित है, उस कूपके दर्शनसे मनुष्य यमका द्वार नहीं देखता है। वहाँ जो कूप स्थित है, उसमें स्नान करना पुण्यप्रद है॥ ४-६॥ |
| अन्यानि तत्र लिङ्गानि सुरैः संस्थापितानि च।<br>दक्षिणे कलशेशस्य लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ७<br><br>गुहेश्वरेति नामानं सर्वपुण्यफलप्रदम्।<br>तस्यैव दक्षिणे पार्श्वे द्वावेतौ तत्र संस्थितौ॥ ८<br><br>उत्तमेश्वरनामानं वामदेवमतः परम्। | वहाँपर देवताओंके द्वारा अन्य लिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं। कलशेशके दक्षिणमें समस्त पुण्योंका फल प्रदान करनेवाला गुहेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। उसीके दक्षिणभागमें वहाँपर उत्तमेश्वर तथा वामदेव नामक—ये दो लिङ्ग स्थित हैं॥ ७-८^{१}/_{२}॥ |
| तस्यैव पश्चिमे देवि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ९<br><br>कम्बलाश्वतराक्षं तु गन्धर्वपददायकम्।<br>अपरं तस्य देवस्य लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ १० | हे देवि! उसीके पश्चिममें गन्धर्वपद प्रदान करनेवाला कम्बलाश्वतराक्ष नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। वहाँ उन प्रभुका दूसरा पश्चिमाभिमुख लिङ्ग |
| ८१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| Sanskrit Shloka | Hindi Meaning |
|---|---|
| नलकूबरेश्वरं नाम सर्वसिद्धिप्रदायकम्।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि मणिकर्णी च विश्रुता॥ ११ | स्थित है, नलकूबरेश्वर नामक वह लिङ्ग सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाला है॥ ९-१०१/२॥ |
| तस्य चाग्रे महत्तीर्थं सर्वपातकनाशनम्।<br>मणिकर्णीश्वरं देवं कुण्डमध्ये च तिष्ठति॥ १२ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें प्रसिद्ध मणिकर्णी विद्यमान है और उसके आगे सभी पापोंका नाश करनेवाला महातीर्थ स्थित है। मणिकर्णीश्वरदेव कुण्डके मध्यमें स्थित हैं, उनके दर्शनसे इसी शरीरसे सिद्धि प्राप्त हो जाती है॥ ११-१२१/२॥ |
| अनेनैव तु देहेन सिध्यते तस्य दर्शनात्।<br>तस्य चोत्तरदिग्भागे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ १३ | उसके उत्तर दिशाभागमें परमेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, उसके पूजनसे मनुष्य जरारहित हो जाता है॥ १३१/२॥ |
| परमेश्वरनामानं पूजनादजरो भवेत्।<br>तस्यैव च समीपस्थं लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ १४ | हे सुश्रोणि! उसीके समीपमें धर्मराजके द्वारा स्थापित पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह पापोंका नाश करनेवाला है। हे देवि! उसीके पश्चिममें निर्जरेश्वर नामक अन्य चतुर्मुख लिङ्ग विद्यमान है, वह श्रेष्ठ लिङ्ग व्याधियोंका नाश करनेवाला है॥ १४-१५१/२॥ |
| धर्मराजेन सुश्रोणि स्थापितं पापनाशनम्।<br>तस्यैव पश्चिमे देवि लिङ्गमन्यच्चतुर्मुखम्॥ १५ | उसके नैर्ऋत्यकोणमें एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। शुभ कर्मवाले जो पितामह तथा अतिकाय आदि हैं, वे पुण्यशाली लोग यहाँ स्नान करके शास्त्रोक्त विधिसे पिण्डदान करके तथा नदीश्वरलिङ्गका दर्शन करके ब्रह्मलोकसे कभी च्युत नहीं होते हैं॥ १६-१७१/२॥ |
| निर्जरेश्वरनामानं व्याधीनां नाशनं परम्।<br>तस्य नैर्ऋतकोणे तु लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ १६ | उस लिङ्गके दक्षिणमें वरुणके द्वारा स्थापित वारुणेश्वर नामक दूसरा लिङ्ग स्थित है। उसके दक्षिणभागमें एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, मेरी भक्तिसे युक्त होकर दैत्यराज बाणने उसे स्थापित किया है॥ १८-१९१/२॥ |
| पितामहाश्चातिकायाः स्नाता ये शुभकर्मिणः।<br>पिण्डं दत्त्वा तथोक्तं च दृष्ट्वा देवं नदीश्वरम्॥ १७ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें सभी धर्मोंका फल प्रदान करनेवाला कूष्माण्डेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! उसीके पूर्वमें राक्षसके द्वारा स्थापित एक लिङ्ग विद्यमान है॥ २०-२१॥ |
| ब्रह्मलोकात्तु ते पुण्या न च्यवन्ति कदाचन।<br>दक्षिणे तस्य देवस्य लिङ्गमन्यच्च तिष्ठति॥ १८ | उसके दक्षिणभागमें गंगाके द्वारा स्थापित गंगेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह देवलोक प्रदान करनेवाला है। हे देवेशि! हे शुभे! हे यशस्विनि! उसके उत्तरमें यहाँपर नदियोंके द्वारा गंगाके तटपर [अनेक] लिङ्ग स्थापित किये गये हैं॥ २२-२३॥ |
| वारुणेश्वरनामानं स्थापितं वरुणेन हि।<br>तस्य दक्षिणपार्श्वे तु लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ १९ | वहाँ वैवस्वतेश्वर नामक लिङ्गका दर्शन करनेसे |
| बाणेन दैत्यराजेन स्थापितं मम भक्तितः।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ २० | |
| कूष्माण्डेश्वरनामानं सर्वधर्मफलप्रदम्।<br>तस्यैव पूर्वतो देवि राक्षसेन प्रतिष्ठितम्॥ २१ | |
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु गङ्गया स्थापितेन तु।<br>गङ्गेश्वरेति नामानं सुरलोकप्रदायकम्॥ २२ | |
| तस्योत्तरेण देवेशि निम्नगाभिस्ततः शुभे।<br>लिङ्गानि स्थापितानीह गङ्गातीरे यशस्विनि॥ २३ | |
| वैवस्वतेश्वरं नाम दृष्ट्वा मृत्युभयापहम्।<br>वैवस्वतात्पश्चिमे तु लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ २४ |
अध्याय ११] कलशेश्वरके समीपस्थ लिङ्गोंके माहात्म्यका वर्णन ८१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मृत्युका भय दूर हो जाता है। वैवस्वतके पश्चिममें पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ २४॥ | |
| आदित्यैः स्थापितं भद्रे आत्मनः श्रेयसोऽर्थिभिः।<br>तस्यैव चाग्रतो भद्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ २५<br><br>वज्रेश्वरेति नामाख्यं सर्वपातकनाशनम्।<br>तस्यैव चाग्रतो भद्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ २६ | हे भद्रे! अपने कल्याणकी इच्छावाले आदित्योंके द्वारा वह स्थापित किया गया है। हे भद्रे! उसीके आगे सभी पापोंका नाश करनेवाला वज्रेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ २५<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| कनकेश्वरनामानं गुह्यं देवि सनातनम्।<br>छायेव दृश्यते लिङ्गे स्थाप्यमाने यशस्विनि॥ २७<br><br>छायां च पश्यते यो वै न स पापेन लिप्यते।<br>तस्यैव चाग्रतो देवि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ २८<br><br>तारकेश्वरनामानं सर्वपापहरं शुभम्।<br>पूजनाच्चास्य लिङ्गस्य ज्ञानावाप्तिर्भवेन्नृणाम्॥ २९ | हे भद्रे! हे देवि! उसीके आगे कनकेश्वर नामक गुह्य तथा सनातन पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे यशस्विनि! उस स्थापित लिङ्गमें छाया-जैसी दिखायी देती है, जो उसमें छायाका दर्शन करता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता है। हे देवि! उसीके आगे सभी पापोंका नाश करनेवाला तारकेश्वर नामक पूर्वाभिमुख शुभ लिङ्ग स्थित है, इस लिङ्गके पूजनसे मनुष्योंको ज्ञानकी प्राप्ति होती है॥ २६-२९॥ |
| अपरं तत्र देवेशि कनकेश्वरसंज्ञितम्।<br>पूजनात्स्वयमेवात्र हिरण्यं संप्रयच्छति॥ ३० | हे देवेशि! वहाँ कनकेश्वर नामक दूसरा लिङ्ग है, इसके पूजनसे यह स्वयं सुवर्ण प्रदान करता है॥ ३०॥ |
| कनकेश्वरस्योत्तरेण नाम्ना च मनुजेश्वरम्।<br>मुखलिङ्गं पश्चिमतः सर्वपापप्रणाशनम्॥ ३१ | कनकेश्वरके उत्तरमें सभी पापोंको नष्ट करनेवाला मनुजेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख मुखलिङ्ग स्थित है॥ ३१॥ |
| तस्यैव चाग्रतो देवि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>इन्द्रेण स्थापितं देवि मम भक्त्या प्रतिष्ठितम्॥ ३२<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण देवि ज्ञानं प्रवर्तते।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि रम्भया सम्प्रतिष्ठितम्॥ ३३ | हे देवि! उसीके आगे एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! इन्द्रने मेरी भक्तिसे उसे स्थापित किया है। हे देवि! उसके दर्शनमात्रसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है॥ ३२<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| मुखलिङ्गं च तं देवि दक्षिणाभिमुखं स्थितम्।<br>इन्द्रेश्वरस्योत्तरेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ३४<br><br>शच्या च स्थापितं भद्रे देवराजस्य भार्यया।<br>तस्योत्तरदिशाभागे लोकपालैः प्रतिष्ठितम्॥ ३५ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें रम्भाके द्वारा मुखलिङ्ग स्थापित किया गया है, हे देवि! वह दक्षिणाभिमुख स्थित है। इन्द्रेश्वरके उत्तरमें एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे भद्रे! देवराजकी पत्नी शचीने उसे स्थापित किया है। उसके उत्तर दिशाभागमें लोकपालोंके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ ३३-३५॥ |
| अन्यानि तत्र लिङ्गानि देवासुरमरुद्गणैः।<br>यक्षैर्नागैश्च गन्धर्वैः किन्नराप्सरसां गणैः॥ ३६<br><br>लोकपालैः सुरैश्चैव लिङ्गानि स्थापितानि तु।<br>तस्यैव दक्षिणे लिङ्गं महापातकनाशनम्॥ ३७<br><br>पूर्वामुखं तु तं भद्रे फाल्गुनेन प्रतिष्ठितम्।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे महापाशुपतेश्वरम्॥ ३८ | देवताओं, असुरों, मरुद्गणों, यक्षों, नागों, गन्धर्वों, किन्नरों, अप्सराओं, लोकपालों तथा सुरोंके द्वारा वहाँपर अनेक लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। उसीके दक्षिणमें महापातकोंका नाश करनेवाला पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! वह फाल्गुनके द्वारा स्थापित किया गया है॥ ३६-३७<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| ८१४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| तेन दृष्टेन देवेशि सर्वज्ञानस्य भाजनम्।<br>तस्यैव पश्चिमे देवि समुद्रेण प्रतिष्ठितम्॥ ३९<br><br>तस्यैव दक्षिणे पार्श्वे ईशानं लोकविश्रुतम्।<br>आत्मानमुद्धरेद्देवि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ४० | उसके दक्षिण दिशाभागमें महापाशुपतेश्वर [नामक] लिङ्ग स्थित है। हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य सम्पूर्ण ज्ञानका भाजन हो जाता है। हे देवि! उसीके पश्चिममें समुद्रके द्वारा एक लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ ३८-३९॥<br><br>उसीके दक्षिणभागमें लोकप्रसिद्ध पश्चिमाभिमुख ईशानलिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसके दर्शनसे मनुष्य अपना उद्धार कर लेता है॥ ४०॥ | | तस्यापि देवि पूर्वेण वाराणस्यां तु लाङ्गलिः।<br>मोक्षप्रदं तु तल्लिङ्गं सर्वैश्वर्यमयं शुभम्॥ ४१ | हे देवि! उसके भी पूर्वमें वाराणसीके अन्तर्गत लांगलि नामक लिङ्ग है, सभी ऐश्वर्योंसे युक्त और शुभ वह लिङ्ग मोक्ष देनेवाला है॥ ४१॥ | | ज्ञात्वा कलियुगं घोरं हाहाभूतमचेतनम्।<br>ब्राह्मणानां हितार्थाय तस्मिन् देशे स्थितो ह्यहम्॥ ४२ | कलियुगको भयंकर, हाहाकारसे युक्त तथा अचेतन जानकर मैं ब्राह्मणोंके हितके लिये उस स्थानमें स्थित हूँ॥ ४२॥ | | दिव्या हि सा परा मूर्तिर्दिव्यज्ञानं हि तत् स्मृतम्।<br>अनुग्रहाय विप्राणां योजयिष्ये व्रतेन तु॥ ४३ | वह मूर्ति दिव्य है तथा उसे दिव्यज्ञान कहा गया है। विप्रोंपर अनुग्रह करनेके लिये मैं उन्हें [पाशुपत] व्रतसे युक्त करता हूँ॥ ४३॥ | | ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा।<br>एतेषां हि विभेदस्तु भिन्नाश्चैव पृथक् पृथक्॥ ४४ | ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा यति—इनमें परस्पर भेद है और ये भिन्न-भिन्न रूपोंमें पृथक् रूपसे स्थित हैं॥ ४४॥ | | ज्ञानेन रहिताः सर्वे पुनरावर्तकाः स्मृताः।<br>ब्राह्मणानां हितार्थाय ज्ञानं चैव प्रकाशितम्॥ ४५ | ज्ञानरहित ये सब बार-बार जन्म लेनेवाले कहे गये हैं। ब्राह्मणोंके हितके लिये मैंने पाशुपतका ज्ञान प्रकाशित किया है॥ ४५॥ | | वेदाः सर्वे समादाय षडङ्गाः सपदक्रमाः।<br>सर्वाणि योगशास्त्राणि दध्ना चैव घृतेन च॥ ४६<br><br>तथा वेदे महाभागे व्रतं पाशुपतं प्रिये।<br>षण्मासैस्तु महाभागे योगैश्वर्यं प्रवर्त्तते॥ ४७ | हे महाभागे! हे प्रिये! जो छः अंगों और पद एवं क्रमसहित सभी वेद तथा सभी योगशास्त्र हैं, उन्हें लेकर दधिसे घृतकी भाँति वेदमें पाशुपतव्रतको प्रकाशित किया गया है। हे महाभागे! पाशुपतव्रत करनेपर छः महीनेमें योगैश्वर्य प्राप्त होता है॥ ४६-४७॥ | | यस्य यस्य प्रभावोऽस्ति योगस्यैव व्रतस्य च।<br>योगज्ञेषु हि तिष्ठेत धर्मं सुखं हि तेषु च॥ ४८ | जिसके-जिसके योग तथा व्रतका प्रभाव होता है, उन्हीं योगज्ञानियोंमें धर्म तथा सुख स्थित रहते हैं॥ ४८॥ | | ब्राह्मणानां समो धर्मो दमो वाथ यशस्विनि।<br>अहिंसा चैव सत्यं च विद्याभिगम एव च॥ ४९ | हे यशस्विनि! धर्म, इन्द्रियनिग्रह, अहिंसा, सत्य तथा विद्याध्ययन—ये सब ब्राह्मणोंके लिये समानरूपसे विहित हैं॥ ४९॥ | | मैत्रो वै ब्राह्मणो नित्यं गतिं प्राप्नोति चोत्तमाम्।<br>भस्मशायी तु तिष्ठेत अन्तस्सवनकृत्तथा॥ ५० | सभीसे मित्रताका भाव रखनेवाला ब्राह्मण सदा उत्तम गति प्राप्त करता है। पाशुपतव्रतीको चाहिये कि |
अध्याय ११ ] कलशेश्वरके समीपस्थ लिङ्गोंके माहात्म्यका वर्णन ८१५
| लिङ्गनिर्माल्यधारी च यतिस्त्वायतने वसेत्।<br>जपगीतहुडुङ्कारस्तुतिकृत्यपरः सदा॥ ५१<br>भावनाद्देवदेवस्य दक्षिणां मूर्त्तिमास्थितः।<br>अकस्मात्तत्र मूत्रं तु पुरीषं वा न संक्षिपेत्॥ ५२ | भस्मधारण किये रहे, अन्तर्याग करनेवाला तथा लिङ्गनिर्माल्यधारी यतिको अपने निवासस्थानमें रहना चाहिये। शिवकी भावना करके उन देवाधिदेवकी दक्षिणामूर्त्तिमें आस्था रखकर जप, गीत, हुडुङ्कार, स्तुति आदि कृत्योंमें सदा संलग्न रहना चाहिये। सहसा मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये॥ ५०–५२॥ |
|---|---|
| स्त्रीशूद्रौ नाभिभाषेत शूद्रान्नं वर्जयेत् सदा।<br>शूद्रान्नरसपुष्टस्य निष्कृतिस्तस्य कीदृशी॥ ५३ | स्त्री तथा शूद्रसे भाषण नहीं करना चाहिये और शूद्रके अन्नका सदा त्याग करना चाहिये। शूद्रके अन्न तथा रससे पुष्ट व्यक्तिकी निष्कृति कैसे हो सकती है?॥ ५३॥ |
| अमृतं ब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियान्नं पयः स्मृतम्।<br>वैश्यान्नमन्नमित्याहुः शूद्रान्नं रुधिरं स्मृतम्॥ ५४ | ब्राह्मणका अन्न अमृत तथा क्षत्रियका अन्न दुग्ध कहा गया है। वैश्यके अन्नको अन्न कहा गया है और शूद्रके अन्नको रुधिर कहा गया है॥ ५४॥ |
| तस्माद्वर्जैत तद्देवि यदीच्छेन्मामकं पदम्।<br>श्मशानवासी धर्मात्मा यथालब्धेन वर्तते॥ ५५ | अतः हे देवि! यदि कोई मेरे लोककी इच्छा करता हो, तो उसे शूद्रके अन्नका त्याग कर देना चाहिये और श्मशानवासी तथा धर्मात्मा होकर यथोपलब्ध अन्नसे निर्वाह करना चाहिये॥ ५५॥ |
| लभेत रुद्रसायुज्यं सदा रुद्रमनुस्मरन्।<br>षण्मासाल्लभते ज्ञानमस्मिन् क्षेत्रे विशेषतः॥ ५६ | सर्वदा रुद्रका स्मरण करनेवाला रुद्रका सायुज्य प्राप्त करता है और विशेष रूपसे इस क्षेत्रमें छः महीनेमें ही ज्ञान प्राप्त करता है॥ ५६॥ |
| नित्यं पूजयते देवं ध्रुवं मोक्षं न संशयः।<br>रागद्वेषविनिर्मुक्ताः सिद्धायतनपूजकाः॥ ५७ | जो शिवजीकी नित्य पूजा करता है, वह निश्चित रूपसे मोक्ष प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है। सिद्धलिङ्गोंकी पूजा करनेवाले राग-द्वेषसे मुक्त होते हैं॥ ५७॥ |
| तेषां मोक्षो मयाख्यातस्तत्र यैर्मानुषैः कृताः।<br>द्वाविंशे परिवर्ते तु वाराणस्यां महाब्रते॥ ५८<br>नाम्ना तु नकुलीशेति तस्मिन् स्थाने स्थितो ह्यहम्।<br>द्रक्ष्यन्ति मां कलौ तस्मिन्नवतीर्णं दिवौकसः॥ ५९ | जो मनुष्य वहाँ सिद्ध आयतनोंकी पूजामें संलग्न रहते हैं, मेरे द्वारा उनका मोक्ष बताया गया है। हे महाव्रते! मैं बाईसवें चतुर्युगीमें वाराणसीमें नकुलीश नामसे उस स्थानमें स्थित रहूँगा। देवतालोग कलियुगमें उस लिङ्गमें आविर्भूत मेरा दर्शन करेंगे॥ ५८-५९॥ |
| अत्र स्थानेऽपि देवेशि मम पुत्रा दिवौकसः।<br>वक्रानिर्मधुपिङ्गश्च श्वेतकेतुस्तथापरः॥ ६०<br>अस्मिन् माहेश्वरं योगं प्राप्य योगगतिं पराम्।<br>नकुलीशाख्यदेवस्य लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ६१<br>चतुर्भिः पुरुषैर्युक्तं तल्लिङ्गं तच्च संस्थितम्।<br>तद् दृष्ट्वा मानवो देवि रुद्रस्यैव सलोकताम्॥ ६२<br>नकुलीशेश्वरं देवं कपिलेश्वरमेव च।<br>पञ्चायतनमेतत्तु यत्तु पूर्वमुदाहृतम्॥ ६३ | हे देवेशि! इस स्थानपर भी स्वर्गमें निवास करनेवाले वक्रानि, मधुपिंग, श्वेतकेतु नामवाले मेरे पुत्र इस लिङ्गमें माहेश्वरयोग प्राप्त करके श्रेष्ठ योगगतिको प्राप्त हुए। नकुलीश नामक देवका लिङ्ग पूर्वाभिमुख स्थित है। वह लिङ्ग चार पुरुषोंसे युक्त होकर स्थित है। हे देवि! उसका तथा नकुलीशेश्वर और कपिलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य रुद्रका सालोक्य प्राप्त करता है। यही पंचायतन है, जिसे |
१२- अविमुक्त तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य-वर्णन
| ८१६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| रहस्यं परमं वेदं मम व्रतनिषेवणम्।<br>तेषां न कथनीयोऽहं ये मद्भक्तिविवर्जिताः ॥ ६४ | पहले ही कह दिया गया है॥ ६०-६३॥<br>मेरा यह व्रत-सेवन परम रहस्यमय है, जो मेरी भक्तिसे रहित हैं, उनसे मेरे विषयमें नहीं बताना चाहिये॥ ६४॥ | | शक्रः पाशुपते चोक्तं पदे सम्यङ्निषेवितम्।<br>तत् पदं विन्दते देवि दृष्टैरेव न संशयः ॥ ६५ | पाशुपतपदमें सम्यक् व्रतनिषेवण कहा गया है। हे देवि! इन्द्रने इन लिङ्गोंके दर्शनसे उस पदको प्राप्त किया था, इसमें सन्देह नहीं है। इन लिङ्गोंके दर्शनसे मनुष्य सदा शिवमें प्रीति रखनेवाला हो जाता है॥ ६५ १/२॥ | | प्रीतिमान् सततं देवि एभिर्दृष्टैश्च जायते।<br>अविमुक्तं महाक्षेत्रं सिद्धसङ्घनिषेवितम् ॥ ६६<br><br>अत्र पूजयते देवि ध्रुवं मोक्षो न संशयः।<br>सिद्धिकामास्तथा सिद्धिं यास्यन्ति द्विजसत्तमाः ॥ ६७ | अविमुक्त महाक्षेत्र है तथा सिद्धगणोंके द्वारा सेवित है, हे देवि! जो यहाँ [शिवका] पूजन करता है, उसका निश्चित रूपसे मोक्ष हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। सिद्धिकी इच्छावाले द्विजश्रेष्ठ यहाँ सिद्धि प्राप्त करेंगे॥ ६६-६७॥ | | इह दत्तं सदाक्षय्यं भविष्यति महात्मनाम्।<br>द्विजानां धर्मनित्यानां मम व्रतनिषेविणाम् ॥ ६८<br><br>एकाहमुपवासं यः करिष्यति यशस्विनि।<br>फलं वर्षशतस्येह लभते मत्परायणः ॥ ६९ | मेरा व्रत करनेवाले धर्मनिष्ठ महात्माओं तथा द्विजोंको यहाँ दिया हुआ दान सदा अक्षय होगा। हे यशस्विनि! जो व्यक्ति मेरे प्रति परायण होकर यहाँ एक दिन उपवास करता है, वह सौ वर्षके उपवासका फल प्राप्त करता है॥ ६८-६९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्यायतनवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११॥
बारहवाँ अध्याय
अविमुक्त तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य-वर्णन
| ईश्वर उवाच | |
|---|---|
| अन्यदायतनं वक्ष्ये वाराणस्यां सुरेश्वरि।<br>यत्र वै देवदेवस्य रुचिरं स्थानमीप्सितम् ॥ १ | **ईश्वर बोले—**हे सुरेश्वरि! अब मैं वाराणसीमें स्थित अन्य आयतनका वर्णन करूँगा, जो देवदेवका रुचिर अभीष्ट स्थान है॥ १॥ |
| नीयमानं पुरा देवि तल्लिङ्गं शशिमौलिनः।<br>राक्षसैरन्तरिक्षस्थैर्व्रजमानं सुसत्वरम् ॥ २ | हे देवि! पूर्वकालमें अन्तरिक्षमें स्थित राक्षसोंके द्वारा चन्द्रशेखर शिवका वह लिङ्ग शीघ्रतापूर्वक लाया गया॥ २॥ |
| अस्मिन् देशे यदायातास्तदा देवेन चिन्तितम्।<br>अविमुक्ते न मोक्षस्तु कथं मे सम्भविष्यति ॥ ३ | जब वे राक्षस इस स्थानमें आये, तब शिवजीने सोचा कि अब मेरे अविमुक्तमें मोक्ष सम्भव नहीं है, तो फिर यह कैसे होगा? जब वे देवेश प्रभु इस बातको |
| इममर्थं तु देवेशो यावच्चिन्तयते प्रभुः।<br>तावत् कुक्कुटशब्दस्तु तस्मिन् देशे समुत्थितः ॥ ४ | सोच रहे थे, उसी समय उस स्थानमें कुक्कुटका शब्द |
| अध्याय १२ ] | अविमुक्त तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य-वर्णन | ८१७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| होने लगा॥ ३-४॥ | |
| शब्दं श्रुत्वा तु तं देवि राक्षसास्त्रस्तचेतसः।<br>लिङ्गमुत्सृज्य भीतास्ते प्रभातसमये गताः॥ ५ | हे देवि! उस शब्दको सुनकर सन्तप्त मनवाले वे राक्षस डरकर लिङ्गको छोड़कर प्रभात वेलामें चले गये॥ ५॥ |
| गतैस्तु राक्षसैर्देवि लिङ्गं तत्रैव संस्थितम्।<br>स्थाने तु रुचिरे शुभ्रे देवदेवः स्वयं प्रभुः॥ ६<br><br>अविमुक्तस्तत्र मध्ये अविमुक्तं ततः स्मृतम्॥ ७ | हे देवि! राक्षसोंके चले जानेपर वह लिङ्ग वहींपर स्थित हो गया। उस सुन्दर तथा शुभ्र स्थानमें स्वयं देवदेव प्रभु विराजमान हो गये। उसके मध्यमें वे अविमुक्तरूपमें स्थित हुए, इसलिये उसे अविमुक्त कहा गया है॥ ६-७॥ |
| तदाविमुक्ते तु सुरैर्हरस्य<br>नाम स्मृतं पुण्यतमाक्षराढ्यम्।<br>मोक्षप्रदं स्थावरजङ्गमानां<br>ये प्राणिनः पञ्चतां यत्र याताः॥ ८ | अविमुक्तमें देवताओंके द्वारा शिवका नाम पुण्यतम अक्षरोंसे युक्त कहा गया है, स्थावर-जंगमोंमें जो प्राणी वहाँ पंचत्वको प्राप्त होते हैं, उनके लिये यह मोक्षप्रद है॥ ८॥ |
| कुक्कुटाश्चापि देवेशि तस्मिन् स्थाने स्थिताः सदा।<br>अद्यापि तत्र दृश्यन्ते पूज्यमानाः शुभार्थिभिः॥ ९ | हे देवेशि! उस स्थानमें कुक्कुट सदा रहते हैं, [अपने] कल्याणकी कामना करनेवाले लोगोंके द्वारा पूजित होते हुए वे [कुक्कुट] आज भी वहाँ देखे जाते हैं॥ ९॥ |
| अविमुक्तं सदा लिङ्गं योऽत्र द्रक्ष्यति मानवः।<br>न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥ १० | जो मनुष्य यहाँ अविमुक्तलिङ्गका सदा दर्शन करेगा, उसका पुनर्जन्म सौ करोड़ कल्पोंमें भी नहीं होगा॥ १०॥ |
| देवस्य दक्षिणे भागे वापी तिष्ठति शोभना।<br>तस्यास्तथोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥ ११ | उस लिङ्गके दक्षिणभागमें एक सुन्दर [ज्ञान-] वापी है, उसका जल पीनेसे पुनर्जन्म नहीं होता है॥ ११॥ |
| पीतमात्रेण तेनैव उदकेन यशस्विनि।<br>त्रीणि लिङ्गानि वर्धन्ते हृदये पुरुषस्य तु॥ १२ | हे यशस्विनि! उस जलके पानमात्रसे ही पुरुषके हृदयमें तीन लिङ्ग उत्पन्न होते हैं॥ १२॥ |
| एतद्गुह्यं महादेवि न देयं यस्य कस्यचित्।<br>दण्डपाणिस्तु तत्रस्थो रक्षते तज्जलं सदा॥ १३<br><br>पश्चिमं तीरमासाद्य देवदेवस्य शासनात्।<br>पूर्वेण तारको देवो जलं रक्षति सर्वदा॥ १४<br><br>नन्दीशश्चोत्तरेणैव महाकालस्तु दक्षिणे।<br>रक्षते तज्जलं नित्यं मद्भक्तानां तु मोहनम्॥ १५ | हे महादेवि! इस रहस्यको जिस-किसीको भी नहीं बताना चाहिये। देवदेवकी आज्ञासे पश्चिम तटपर आकर वहाँ विद्यमान दण्डपाणि उस जलकी सदा रक्षा करते हैं। पूर्वमें तारकदेव सदा जलकी रक्षा करते हैं। उत्तरमें नन्दीश तथा दक्षिणमें महाकाल मेरे भक्तोंके लिये प्रिय उस जलकी नित्य रक्षा करते हैं॥ १३-१५॥ |
| विष्णुरुवाच<br>ममापि सा परा देवि तनुरापोमयी शुभा।<br>अप्राप्या दुर्लभा देवि मानवैरकृतात्मभिः॥ १६ | **विष्णु बोले—**हे देवि! वह श्रेष्ठ तथा शुभ जलमयी मूर्ति मेरी ही है। हे देवि! वह दुर्लभ मूर्ति |
| ८१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| पापात्मा मनुष्योंके द्वारा अप्राप्य है॥ १६॥ | |
|---|---|
| यैस्तु तत्र जलं पीतं कृतार्थास्ते तु मानवाः।<br>तेषां तु तारकं ज्ञानमुत्पत्स्यति न संशयः॥ १७ | जिन्होंने उस जलका पान कर लिया, वे मनुष्य धन्य हैं और उनमें तारक ज्ञान उत्पन्न हो जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ १७॥ |
| वापीजले नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै दण्डनामकम्।<br>अविमुक्तं ततो दृष्ट्वा कैवल्यं लभते क्षणात्॥ १८ | उस वापीके जलमें स्नान करके दण्ड-पाणिका दर्शनकर और इसके बाद अविमुक्त [लिङ्ग]-का दर्शन करके मनुष्य क्षणभरमें कैवल्य प्राप्त करता है॥ १८॥ |
| अविमुक्तस्य चाग्रे तु लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>प्रीतिकेश्वरनामानं प्रीतिं यच्छति शाश्वतीम्॥ १९<br><br>अविमुक्तोत्तरेणैव लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>अविमुक्तं च तं देवि नाम्ना वै मोक्षकेश्वरम्॥ २० | अविमुक्तके आगे प्रीतिकेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह शाश्वत प्रीति प्रदान करता है। अविमुक्तके उत्तरमें ही एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे देवि! वह भी अविमुक्त है तथा मोक्षकेश्वर नामसे प्रसिद्ध है॥ १९-२०॥ |
| तेन दृष्टेन देवेशि ज्ञानवान् जायते नरः।<br>तस्य चोत्तरतो देवि लिङ्गं चैव चतुर्मुखम्॥ २१ | हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य ज्ञानी हो जाता है। हे देवि! उसके उत्तरमें पापियोंके भयका नाश करनेवाला वरुणेश्वर नामक चतुर्मुख लिङ्ग विद्यमान है॥ २१ १/२॥ |
| वरुणेश्वरनामानं पापानां भयमोचनम्।<br>पूर्वेण तस्य संलग्नं मुखलिङ्गं च तिष्ठति॥ २२<br><br>सुवर्णाक्षेश्वरं नाम यज्ञानां फलदायकम्।<br>तस्य चैवोत्तरे गौरी स्वयं तिष्ठति पुण्यदा॥ २३ | उसके पूर्वमें समीपमें ही यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाला सुवर्णाक्षेश्वर नामक मुखलिङ्ग स्थित है। उसीके उत्तरमें पुण्यदायिनी स्वयं गौरी स्थित हैं, उन देवीके दर्शनसे परम सौभाग्य प्राप्त होता है॥ २२-२३ १/२॥ |
| तस्यास्तु दर्शनाद्देव्याः सौभाग्यं जायते परम्।<br>दक्षिणे तस्य देवस्य निकुम्भो नाम वै गणः॥ २४<br><br>तं दृष्ट्वा मानुषो देवि क्षेत्रवासं तु विन्दति।<br>विनायकश्च तत्रैव पश्चिमेन यशस्विनि॥ २५<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण विघ्नैर्नैवाभिभूयते।<br>निकुम्भस्य तु पूर्वेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ २६ | उस [सुवर्णाक्षेश्वर] देवके दक्षिणमें निकुम्भ नामक गण विद्यमान है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य क्षेत्रवास प्राप्त करता है। हे यशस्विनि! वहींपर पश्चिममें विनायक स्थित हैं, उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य विघ्नोंसे बाधित नहीं होता है॥ २४-२५ १/२॥ |
| मुखलिङ्गं तु तं देवि विजयाख्यं स्वयं प्रिये।<br>दक्षिणेन तु तत्रैव शुक्लेश्वरमिति स्मृतम्॥ २७<br><br>मुखलिङ्गं तु तं भद्रे शुक्रेण स्थापितं पुरा।<br>पूर्वामुखं तु तं भद्रे शिवलोकप्रदायकम्॥ २८ | निकुम्भके पूर्वमें एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे देवि! हे प्रिये! वह साक्षात् विजय नामक मुखलिङ्ग है। वहींपर दक्षिणमें शुक्लेश्वर नामक मुखलिङ्ग बताया गया है, हे भद्रे! शुक्राचार्यने उसे पूर्वकालमें स्थापित किया था। हे भद्रे! वह पूर्वाभिमुख है तथा शिवलोक प्रदान करनेवाला है॥ २६-२८॥ |
| तस्यैव चोत्तरे देवि मुखलिङ्गं च तिष्ठति।<br>पश्चान्मुखं तु तं देवि देवयान्या तु स्थापितम्॥ २९ | हे देवि! उसीके उत्तरमें पश्चिमकी ओर मुखवाला एक मुखलिङ्ग स्थित है, हे देवि! वह देवयानीके द्वारा स्थापित किया गया है॥ २९॥ |
१३- भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत तथा ब्रह्माजीद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन
अध्याय १३ ] भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत आदिद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन । ८९९
| तस्यैव चाग्रतो भद्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>कचेन स्थापितं भद्रे देवाचार्यस्य सूनुना॥ ३० | हे भद्रे! उसीके आगे पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे भद्रे! देवताओंके आचार्य बृहस्पति के पुत्र कचके द्वारा वह स्थापित किया गया है॥ ३०॥ |
| तस्यैव च समीपे तु कूपस्तिष्ठति सुव्रते।<br>तस्योपस्पर्शनाद्देवि सर्वमेधफलं लभेत्॥ ३१ | हे सुव्रते! उसीके समीपमें एक कूप स्थित है, हे देवि! उसमें स्नान करनेसे मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ ३१॥ |
| तस्यैव पश्चिमे भागे देवो देवी च तिष्ठतः।<br>भक्तिदौ तौ तु सर्वेषां येऽपि दुष्कृतिनो नराः॥ ३२ | उसीके पश्चिमभागमें देव (शिव) तथा देवी (पार्वती) स्थित हैं। जो बुरा कर्म करनेवाले मनुष्य हैं, उन सबको भी वे भक्ति देनेवाले हैं॥ ३२॥ |
| शुक्रेश्वरस्य पूर्वेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>अनर्केश्वरनामानं मोक्षदं सर्वदेहिनाम्॥ ३३ | शुक्रेश्वरके पूर्वमें सभी प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला अनर्केश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। |
| तस्यैव पूर्वतो भागे गणैस्तु परिवारितम्।<br>गणेश्वरमिति ख्यातं सर्वहर्षप्रदायकम्॥ ३४ | उसीके पूर्वभागमें गणोंसे घिरा हुआ गणेश्वर नामसे प्रसिद्ध लिङ्ग विद्यमान है, वह सभीको हर्ष प्रदान करनेवाला है॥ ३३-३४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्यायतनावर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्यायतनावर्णनं' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२॥
तेरहवाँ अध्याय
भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत तथा ब्रह्माजीद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| अन्यदायतनं वक्ष्ये वाराणस्यां सुरेश्वरि।<br>रामेण स्थापितं लिङ्गं लङ्कायाश्चागतेन हि॥ १ | अब मैं वाराणसीमें स्थित अन्य लिङ्गोंका वर्णन करूँगा। लंकासे लौटकर श्रीरामचन्द्रजीने एक लिङ्ग स्थापित किया है॥ १॥ |
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>त्रिपुरान्तकरं नाम सर्वपापप्रणाशनम्॥ २ | उसके दक्षिणभागमें सभी पापोंका नाश करनेवाला त्रिपुरान्तकर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ २॥ |
| तस्यैव दक्षिणे लिङ्गं दत्तात्रेयप्रतिष्ठितम्।<br>ज्ञानं चोत्पद्यते देवि तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ ३ | उसीके दक्षिणमें [महर्षि] दत्तात्रेयद्वारा स्थापित लिङ्ग है, हे देवि! उस लिङ्गके दर्शनसे ज्ञान उत्पन्न होता है॥ ३॥ |
| तस्य पश्चिमदिग्भागे हरिकेशेश्वरं शुभम्।<br>तत्रैवाराधितो देवि हरिकेशेन सुव्रते॥ ४ | उसके पश्चिम दिशाभागमें हरिकेशेश्वर नामक शुभ लिङ्ग है। हे देवि! हे सुव्रते! हरिकेशने वहाँपर मेरी आराधना की थी। |
| हरिकेशेश्वरं देवं सर्वकिल्विषनाशनम्।<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे गोकर्णं नाम विश्रुतम्॥ ५ | हरिकेशेश्वरलिङ्ग सभी पापोंका नाश करनेवाला है। उसके पश्चिम-दिशाभागमें गोकर्ण नामक प्रसिद्ध तीर्थ विद्यमान है॥ ४-५॥ |
| तत्र स्नातो वरारोहे राजते देवि चन्द्रवत्।<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं काशिपुर्यां च सुव्रते॥ ६ | हे वरारोहे! हे देवि! वहाँ स्नान किया हुआ मनुष्य चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होता है। हे सुव्रते! काशीपुरीमें |
८२० श्रीलिङ्गमहापुराण [ परिशिष्ट ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उत्तरं सर्वसिद्धानामनन्तफलदायकम्।<br>देवदेवस्य चैवाग्रे तडागं देवविश्रुतम्॥ ७ | उत्तरकी ओर सभी सिद्धोंको अनन्त फल देनेवाला पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। उस देवदेवके आगे देवविश्रुत तडाग विद्यमान है॥ ६-७॥ |
| तत्र स्नातो वरारोहे राजते देवि चन्द्रवत्।<br>तस्यैव पश्चिमे तीरे लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ८ | हे वरारोहे! हे देवि! वहाँ स्नान किया हुआ मनुष्य चन्द्रमाकी भाँति प्रकाशमान् हो जाता है। हे भद्रे! उसीके पश्चिम तटपर मेरी भक्तिसे युक्त देवताके द्वारा स्थापित पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ ८ १/२॥ |
| देवेन स्थापितं भद्रे मम भक्तिपरेण वै।<br>तस्यैव चाग्रतो देवि कुण्डं तिष्ठति भामिनि॥ ९<br><br>तस्मिन् स्नातो वरारोहे देवलोकमवाप्नुयात्।<br>देवेश्वरस्योत्तरेण पिशाचैः स्थापितं पुरा॥ १०<br><br>पिशाचेश्वरनामानं मोक्षदं सर्वदेहिनाम्। | हे देवि! हे भामिनि! उसीके आगे एक कुण्ड स्थित है। हे वरारोहे! उसमें स्नान करनेवाला देवलोक प्राप्त करता है। देवेश्वरके उत्तरमें पूर्वकालमें पिशाचोंके द्वारा स्थापित पिशाचेश्वर नामक लिङ्ग है, वह सभी प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है॥ ९-१० १/२॥ |
| ध्रुवेशस्याग्रतो देवि मुखलिङ्गं च तिष्ठति॥ ११<br><br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं तीरे कुण्डस्य भामिनि।<br>वैद्यनाथं तु तं विद्यात् सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ १२ | हे देवि! ध्रुवेशके आगे पश्चिमाभिमुख मुखलिङ्ग स्थित है, हे भामिनि! वह लिङ्ग कुण्डके तटपर विद्यमान है। सभी प्रकारका सुख प्रदान करनेवाले उस लिङ्गको वैद्यनाथ नामवाला जानना चाहिये॥ ११-१२॥ |
| तस्यैव नैर्ऋते भागे मनुना स्थापितं पुरा।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं तस्य कुण्डस्य दक्षिणे॥ १३<br><br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि सर्वपापक्षयो भवेत्। | उसीके नैर्ऋतकोणमें पूर्वकालमें मनुके द्वारा स्थापित पूर्वाभिमुख लिङ्ग है, वह लिङ्ग कुण्डके दक्षिणमें स्थित है। हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे सभी पापोंका नाश हो जाता है॥ १३ १/२॥ |
| वैद्यनाथस्य पूर्वेण लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ १४<br><br>मुचुकुन्देश्वरं नाम देवानां तु वरप्रदम्।<br>प्रियव्रतस्य तद्देवि सर्वयज्ञफलप्रदम्॥ १५ | वैद्यनाथके पूर्वमें देवताओंको वर प्रदान करनेवाला मुचुकुन्देश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! वह लिङ्ग [राजा] प्रियव्रतके सभी यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाला है॥ १४-१५॥ |
| तस्यैव दक्षिणे देवि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>सर्वपापप्रशमनं गौतमेशं च नामतः॥ १६<br><br>तेन दृष्टेन देवेशि सामवेदफलं लभेत्।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि विभाण्डेश्वरसंज्ञितम्॥ १७ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें समस्त पापोंका नाश करनेवाला गौतमेश नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य सामवेदका फल प्राप्त करता है। हे देवि! उसीके दक्षिणमें विभाण्डेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है॥ १६-१७॥ |
| ऋष्यशृङ्गेश्वरं नाम तस्य दक्षिणतः स्थितम्।<br>तस्यैव पूर्वतो देवि ब्रह्मोश्वरमिति स्मृतम्॥ १८ | उसके दक्षिणमें ऋष्यशृंगेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। हे देवि! उसीके पूर्वमें ब्रह्मोश्वरलिङ्ग बताया गया है॥ १८॥ |
| ब्रह्मोश्वराच्च कोणेन पिशाचेश्वरसंज्ञितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं देवि पर्जन्येश्वरनामतः॥ १९ | ब्रह्मोश्वरके कोणमें पिशाचेश्वर नामक लिङ्ग है। हे देवि! पर्जन्येश्वर नामसे प्रसिद्ध लिङ्ग पश्चिमाभिमुख स्थित है॥ १९॥ |
अध्याय १३] भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत आदिद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन | ८२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पर्जन्येश्वरनामानं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्।<br>पर्जन्येश्वरपूर्वेण नाम्ना तु नहुषेश्वरम्॥ २०<br><br>नहुषेश्वरपूर्वेण देवदेवी च तिष्ठति।<br>विशालाक्षीति विख्याता भक्तानां तु फलप्रदा॥ २१ | पर्जन्येश्वर नामक लिङ्ग भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है। पर्जन्येश्वरके पूर्वमें नहुषेश्वर नामक लिङ्ग है। नहुषेश्वरके पूर्वमें देव-देवी स्थित हैं, विशालाक्षी नामसे विख्यात वे [सभी] भक्तोंको फल प्रदान करनेवाली हैं॥ २०-२१॥ |
| तस्यैव दक्षिणे भागे जरासन्धेश्वरं स्थितम्।<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं दृष्ट्वा देवि फलप्रदम्॥ २२ | उसीके दक्षिणभागमें जरासन्धेश्वर नामक चतुर्मुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! उस लिङ्गका दर्शन करनेसे वह [समस्त] फल प्रदान करता है॥ २२॥ |
| तस्यैव दक्षिणे देवि भोगदा सर्वदेहिनाम्।<br>भोगा ललितका देवि सर्वसिद्धिप्रदायिका॥ २३ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें सभी प्राणियोंको सुख प्रदान करनेवाली भोगा ललितका स्थित हैं, हे देवि! वे सभी सिद्धियाँ देनेवाली हैं॥ २३॥ |
| जरासन्धेश्वरस्याग्रे लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>हिरण्याक्षेश्वरं नाम हिरण्यफलदायकम्॥ २४ | जरासन्धेश्वरके आगे सुवर्णका फल प्रदान करनेवाला हिरण्याक्षेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ २४॥ |
| तस्यैव दक्षिणे लिङ्गं ययातीश्वरनामतः।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं सर्वकामफलप्रदम्॥ २५ | उसीके दक्षिणमें ययातीश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग विद्यमान है, वह लिङ्ग सभी कामनाओंका फल देनेवाला है॥ २५॥ |
| तस्यैव पश्चिमे भागे ब्रह्मोशस्य समीपतः।<br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं दृष्ट्वा वेदफलं लभेत्॥ २६ | उसीके पश्चिमभागमें ब्रह्मोशके समीप पश्चिमकी ओर मुखवाला एक लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य वेदोंका फल प्राप्त करता है॥ २६॥ |
| अगस्त्यस्य समीपे तु मुखलिङ्गं तु तिष्ठति।<br>विश्वावसुस्तु गन्धर्वो लिङ्गं स्थापितवान् पुरा॥ २७ | अगस्त्यके समीपमें एक मुखलिङ्ग स्थित है, पूर्वकालमें गन्धर्व विश्वावसुने उस लिङ्गको स्थापित किया था॥ २७॥ |
| अगस्त्येश्वरपूर्वेण मुण्डेशो नाम नामतः।<br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं वीरसिद्धिप्रदं नृणाम्॥ २८ | अगस्त्येश्वरके पूर्वमें मुण्डेश नामसे प्रसिद्ध पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग विद्यमान है, वह लिङ्ग मनुष्योंको वीरसिद्धि प्रदान करनेवाला है॥ २८॥ |
| तस्यैव दक्षिणे देवि विधिस्तिष्ठति पार्वति।<br>विधिना स्थापितं लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ २९ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें विधि [लिङ्ग] स्थित है, हे पार्वति! विधि (ब्रह्मा)-के द्वारा स्थापित वह लिङ्ग पश्चिमाभिमुख स्थित है॥ २९॥ |
| विधीश्वराद्दक्षिणेन तीर्थं सर्वत्र विश्रुतम्।<br>दशाश्वमेधिकं नाम लिङ्गं तत्र स्वयं स्थितम्॥ ३०<br><br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि अश्वमेधफलं लभेत्। | विधीश्वरके दक्षिणमें सर्वत्र प्रसिद्ध एक तीर्थ है, वहाँपर दशाश्वमेधिक नामक लिङ्ग स्वयं स्थित है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य अश्वमेधका फल प्राप्त करता है॥ ३० १/२॥ |
| दशाश्वमेधाच्चोत्तरतो मातरस्तत्र संस्थिताः॥ ३१<br><br>तासां मुखे तु तत्कुण्डं तिष्ठते वरवर्णिनि।<br>तत्र स्नानं नरः कुर्यान्नारी वा पुरुषोऽपि वा॥ ३२ | दशाश्वमेधके उत्तरमें वहाँपर मातृकाएँ स्थित हैं, हे वरवर्णिनि! उनके मुखमें एक कुण्ड स्थित है। वहाँ जो |
१४- हरिश्चन्द्रेश्वर, नैर्ऋतेश्वर, अम्बरीषेश्वर, शंकुकर्णेश्वर, कपर्दीश्वर, अंगारेश्वर तथा छागलेश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन
| ८२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| ईप्सितं फलमाप्नोति मातृणां च प्रसादतः।<br>अगस्त्येशाद्दक्षिणतो लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ३३<br><br>पुलस्त्येश्वरनामानं सर्वरोगविवर्धनम्।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गमन्यच्च तिष्ठति॥ ३४ | मनुष्य, चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष हो, स्नान करता है, वह मातृकाओंकी कृपासे वांछित फल प्राप्त करता है। अगस्त्येशके दक्षिणमें सभी प्रकारके आरोग्यकी वृद्धि करनेवाला पुलस्त्येश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ ३१-३३१/२॥ | | पुष्पदन्तेश्वरं नाम सर्वसिद्धिप्रदायकम्।<br>तस्यैवाग्रे तु कोणे तु लिङ्गानि सुमहन्ति च॥ ३५<br><br>देवर्षिगणपुष्टानि सर्वसिद्धिकराणि च।<br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे महदाश्चर्यदायकम्॥ ३६<br><br>पञ्चोपचारपूजायां स्वप्नसिद्धिं करिष्यति।<br>लिङ्गं सिद्धेश्वरं नाम पूर्वाभिमुखसंस्थितम्॥ ३७ | उसके दक्षिण दिशाभागमें सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाला पुष्पदन्तेश्वर नामक एक अन्य लिङ्ग स्थित है। उसीके आगे कोणमें महान् लिङ्ग विद्यमान हैं; वे देवर्षियोंके द्वारा स्थापित किये गये हैं और सभी प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाले हैं। उसीके पूर्व दिशाभागमें महान् आश्चर्यजनक लिङ्ग विद्यमान हैं। सिद्धेश्वर नामक पूर्वाभिमुख स्थित वह लिङ्ग पंचोपचारपूजाके द्वारा स्वप्नसिद्धि प्रदान करता है॥ ३४-३७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्यायतनावर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्यातनवर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १३॥
चौदहवाँ अध्याय
हरिश्चन्द्रेश्वर, नैर्ऋतेश्वर, अम्बरीषेश्वर, शंकुकर्णेश्वर, कपर्दीश्वर, अंगारेश्वर तथा छागलेश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| अन्यच्चैव प्रवक्ष्यामि हरिश्चन्द्रेश्वरं शुभम्।<br>यत्र सिद्धो महात्मा वै हरिश्चन्द्रो महाबलः॥ १ | अब मैं हरिश्चन्द्रेश्वर नामक अन्य शुभ लिङ्गका वर्णन करूँगा, जहाँपर महाबली हरिश्चन्द्र सिद्ध महात्मा हुए थे॥ १॥ |
| तं दृष्ट्वा मानवो देवि रुद्रस्य पदमाप्नुयात्।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं स्वर्गलोकप्रदायकम्॥ २ | हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य रुद्रका पद प्राप्त करता है। वह पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्वर्गलोक प्रदान करनेवाला है॥ २॥ |
| हरिश्चन्द्रेश्वराद्देवि अन्यल्लिङ्गं तु पश्चिमे।<br>पूर्वामुखं तु तं देवि नाम्ना वै नैर्ऋतेश्वरम्॥ ३<br><br>तस्य सन्दर्शनाद्देवि कैवल्यं ज्ञानमाप्नुयात्।<br>तस्यैव दक्षिणे लिङ्गं पूर्वामुखमवस्थितम्॥ ४<br><br>नाम्ना ह्याङ्गिरसेशं तद्वैराग्यसुखदायकम्।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि क्षेमेश्वरमनुत्तमम्॥ ५ | हे देवि! हरिश्चन्द्रेश्वरके पश्चिममें दूसरा पूर्वाभिमुख एक लिङ्ग स्थित है। हे देवि! वह नैर्ऋतेश्वर नामसे प्रसिद्ध है। हे देवि! उसके दर्शनसे मनुष्य कैवल्यज्ञान प्राप्त करता है। उसीके दक्षिणमें आंगिरसेश नामसे प्रसिद्ध पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह वैराग्यसुख प्रदान करनेवाला है॥ ३-४१/२॥ |
| तस्य दक्षिणदिग्भागे केदारं नाम विश्रुतम्।<br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि रुद्रस्यानुचरो भवेत्॥ ६ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें अत्युत्तम क्षेमेश्वर [लिङ्ग] विद्यमान है। उसके दक्षिण दिशाभागमें केदार नामक प्रसिद्ध लिङ्ग है। हे देवि! उसका दर्शन |
अध्याय १४ ] हरिश्चन्द्रेश्वर, नैर्ऋतेश्वर, अम्बरीषेश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन [ ८२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| केदाराद्दाक्षिणे चैव लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>नीलकण्ठेति नामानं सुरलोकप्रदायकम्॥ ७ | करके मनुष्य रुद्रका अनुचर हो जाता है॥ ५-६॥<br>केदारके ही दक्षिणमें देवलोक प्रदान करनेवाला नीलकण्ठ नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ ७॥ |
| तस्यैव वायवे कोणे अम्बरीषेश्वरं शुभम्।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गं वै दक्षिणामुखम्॥ ८<br>नाम्ना कालञ्जरं देवं सर्वपातकनाशनम्।<br>तस्यैव दक्षिणे भागे लोलार्को नाम वै रविः॥ ९ | उसीके वायव्य कोणमें अम्बरीषेश्वर नामक शुभ लिङ्ग स्थित है। उसके दक्षिण दिशाभागमें कालेंजर नामक दक्षिणाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है॥ ८½॥<br>उसीके दक्षिण भागमें लोलार्क नामक सूर्यदेव विद्यमान हैं, उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सूर्यलोक प्राप्त करता है। |
| तस्य दर्शनमात्रेण सूर्यलोकमवाप्नुयात्।<br>लोलार्कात् पश्चिमे भागे दुर्गादेवी च तिष्ठति॥ १०<br>मानवानां हितार्थाय कूटे क्षेत्रस्य दक्षिणे।<br>दुर्गायाः पश्चिमे देवि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ११<br>असितेन च तद्देवि भक्त्या वै संप्रतिष्ठितम्। | लोलार्कके पश्चिमभागमें तथा क्षेत्रके दक्षिणमें कूटपर मनुष्योंके हितके लिये दुर्गादेवी स्थित हैं। हे देवि! दुर्गाके पश्चिममें पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! वह लिङ्ग महात्मा असितके द्वारा भक्तिपूर्वक स्थापित किया गया है॥ ९-११½॥ |
| शुष्कनद्यास्तु नाम्ना वै शुष्केश्वरमिति स्मृतम्॥ १२<br>शुष्केश्वरात् पश्चिमेन नाम्ना तु जनकेश्वरम्।<br>जनकेन महाभागे भक्त्या चापि प्रतिष्ठितम्॥ १३<br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं दर्शनाद्व्यथः शुभे। | शुष्क नदीके नामसे शुष्केश्वर लिङ्ग भी बताया गया है। शुष्केश्वरके पश्चिममें जनकेश्वर नामक लिङ्ग विद्यमान है। हे महाभागे! जनकके द्वारा भक्तिपूर्वक उसे स्थापित किया गया है। हे शुभे! वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला है, उसके दर्शनसे मनुष्य व्यथारहित हो जाता है॥ १२-१३½॥ |
| तस्यैव चोत्तरे भागे नातिदूरे यशस्विनि॥ १४<br>शङ्कुकर्णेश्वरं नाम लिङ्गं तत्रैव तिष्ठति।<br>तस्य दर्शनमात्रेण व्रतसिद्धिर्भवेन्नृणाम्॥ १५ | हे यशस्विनि! उसीके उत्तरभागमें समीपमें वहींपर शंकुकर्णेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्योंके व्रतकी सिद्धि हो जाती है॥ १४-१५॥ |
| शुष्केश्वराच्चोत्तरेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>सिद्धेश्वरेति नामानं कुण्डस्यैव तटस्थितम्॥ १६<br>तत्र कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा सिद्धेश्वरं तु वै।<br>सर्वासामेव सिद्धीनां पारं गच्छति मानवः॥ १७ | शुष्केश्वरके उत्तरमें सिद्धेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह कुण्डके तटपर ही स्थित है। वहाँपर कुण्डमें स्नान करके तथा सिद्धेश्वरका दर्शन करके मनुष्य समस्त सिद्धियोंके पार चला जाता है॥ १६-१७॥ |
| वायव्ये तु दिशाभागे शङ्कुकर्णेश्वरस्य तु।<br>माण्डव्येशमिति ख्यातं सुरसिद्धैस्तु वन्दितम्॥ १८ | शंकुकर्णेश्वरके वायव्य दिशाभागमें देवताओं तथा सिद्धोंसे वन्दित माण्डव्येश नामक लिङ्ग विद्यमान है॥ १८॥ |
| तस्य चैव समीपे तु स्वयं देवश्च तिष्ठति।<br>गणैः परिवृतो देवि देव्या सह महाप्रभुः॥ १९<br>द्वारे स्वे तिष्ठते देवि स्वयं क्षेत्रं च रक्षति।<br>देवस्य चोत्तरे भागे नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ २० | उसके समीपमें स्वयं देव [शिवजी] स्थित हैं। हे देवि! वे महाप्रभु [वहाँ] गणों तथा देवी [पार्वती]-से घिरे रहकर अपने द्वारपर विराजमान रहते हैं और स्वयं क्षेत्रकी रक्षा करते हैं॥ १९½॥ |
| मुखलिङ्गं तु तत्रैव लिङ्गं पूर्वामुखं शुभे।<br>तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे छागलेश्वरसंज्ञितम्॥ २१ | देवके उत्तरभागमें समीपमें ही वहाँपर एक मुख-लिङ्ग है, हे शुभे! वह लिङ्ग पूर्वाभिमुख है। उसीके उत्तरभागमें छागलेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग |
| ८२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वसिद्धिप्रदायकम्।<br>अन्यदायतनं देवि पश्चिमेन यशस्विनि॥ २२<br>कपर्दीश्वरनामानमुत्तमं सर्वदायकम्। | स्थित है। वह सभी सिद्धियाँ देनेवाला है। हे देवि! उसके पश्चिममें अन्य आयतन स्थित है। हे यशस्विनि! कपर्दीश्वर नामक वह उत्तम आयतन (लिङ्ग) सब कुछ प्रदान करनेवाला है॥ २०-२२ १/२॥ | | तस्य पूर्वेण सुश्रोणि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ २३<br>हरितेश्वरनामानं सर्वपापक्षयङ्करम्।<br>कात्यायनेश्वरं नाम तस्य दक्षिणतः स्थितम्।<br>तेन दृष्टेन मनुजः सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ २४ | हे सुश्रोणि! उसके पूर्वमें सभी पापोंका नाश करनेवाला हरितेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। उसके दक्षिणमें कात्यायनेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनसे मनुष्य समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ २३-२४॥ | | अन्यत्तस्यैव पार्श्वे तु अङ्गारेस्वरसंज्ञितम्।<br>तडागं चापि तत्रस्थमङ्गारेस्वरसंज्ञितम्॥ २५ | उसीके पासमें अंगारेश्वर नामक अन्य लिङ्ग विद्यमान है और वहींपर अंगारेश्वर नामक तडाग भी स्थित है॥ २५॥ | | तस्य दक्षिणदिग्भागे नातिदूरे व्यवस्थितम्।<br>मुकुरेश्वरनामानं सर्वयात्राफलप्रदम्॥ २६<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं कुण्डस्य पुरतः स्थितम्।<br>तस्य कुण्डस्य पार्श्वे तु छागलेश्वरसंज्ञितम्॥ २७<br>तस्य दर्शनमात्रेण योगैश्वर्यं प्रवर्तते।<br>अन्यानि सन्ति लिङ्गानि शतशोऽथ सहस्रशः॥ २८<br>न मया तानि चोक्तानि बहुत्वान्नामधेयतः।<br>सप्तकोट्यस्तु लिङ्गानि अस्मिन् स्थाने स्थिता भुवि॥ २९<br>तेषां दर्शनमात्रेण ज्ञानं चोत्पद्यते क्षणात्। | उसके दक्षिण दिशाभागमें समीपमें ही सभी यात्राओंका फल प्रदान करनेवाला मुकुरेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। पश्चिमाभिमुख वह लिङ्ग कुण्डके सामने स्थित है। उस कुण्डके पासमें छागलेश्वर नामक लिङ्ग विद्यमान है, उसके दर्शनमात्रसे योगैश्वर्य प्राप्त होता है। वहाँपर अन्य सैकड़ों-हजारों लिङ्ग स्थित हैं, बहुत-से होनेके कारण नाम लेकर मैंने उन्हें नहीं बताया। पृथिवीपर इस स्थानमें सात करोड़ लिङ्ग हैं, उनके दर्शनमात्रसे क्षणभरमें ज्ञान उत्पन्न हो जाता है॥ २६-२९ १/२॥ | | उद्देशमात्रं कथितं मया तुभ्यं वरानने॥ ३०<br>न शक्यं विस्तराद्वक्तुं वर्षकोटिशतैरपि।<br>एतानि सिद्धलिङ्गानि कूपाः पुण्या हृदास्तथा॥ ३१<br>वाप्यो नद्योऽथ कुण्डानि मया ते परिकीर्तिताः।<br>एतेषु चैव यः स्नानं करिष्यति समाहितः॥ ३२<br>लिङ्गानि स्पर्शयित्वा च संसारे न विशेत् पुनः। | हे वरानने! मैंने संक्षेपमें आपको बताया है, सौ करोड़ वर्षोंमें भी विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं किया जा सकता है। मैंने आपसे इन सिद्धलिङ्गों, कूपों, पवित्र हदों, वापियों, नदियों तथा कुण्डोंका वर्णन कर दिया। जो एकाग्रचित्त होकर इन [कुण्ड आदि]-में स्नान करता है तथा लिङ्गोंका स्पर्श करता है, वह संसारमें पुनः प्रवेश नहीं करता है॥ ३०-३२ १/२॥ | | पृथिव्यां यानि तीर्थानि अन्तरिक्षचराणि च॥ ३३<br>तेषां मध्ये तु ये श्रेष्ठा मया ते कथिता शुभे।<br>तीर्थयात्रा वरारोहे कथिता पापनाशिनी॥ ३४<br>येन चैषा कृता देवि सोऽवश्यं मुक्तिभाग्भवेत्॥ ३५ | हे शुभे! पृथिवीपर तथा अन्तरिक्षमें जो तीर्थ हैं, उनमें जो श्रेष्ठ हैं, उनका वर्णन मैंने कर दिया। हे वरारोहे! मैंने पापोंका नाश करनेवाली तीर्थयात्राको भी बता दिया, हे देवि! जिसने इसे कर लिया, वह अवश्य ही मुक्तिका भागी होता है॥ ३३-३५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुहायतनवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुहायतनवर्णन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४॥
१५- चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन
अध्याय १५ ] चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन [ ८२५
पन्द्रहवाँ अध्याय
चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ईश्वर उवाच<br>अन्यच्चैव प्रवक्ष्यामि महाभाग्यं वरानने।<br>चतुर्दशायतनं कृत्वा अष्टायतनमेव च॥ १<br>पञ्चायतनमेवं तु ललिता च विनायकः।<br>नवदुर्गास्तथा प्रोक्ता एतत् कृत्यं वरानने॥ २<br>रहस्यमेतत् कथितं न देयं यस्य कस्यचित्। | **ईश्वर बोले—**हे वरानने! अब मैं अन्य महाभाग्यप्रद लिङ्गोंका वर्णन करूँगा। चतुर्दशायतन, अष्टायतन, पंचायतन, ललिता, विनायक तथा जो नौ दुर्गा हैं—इन सबको मैं बता चुका हूँ। हे वरानने! इस यात्राको करना चाहिये और इस बताये गये रहस्यको जिस-किसीसे प्रकाशित नहीं करना चाहिये॥ १-२ १/२॥ |
| शैलेशं प्रथमं दृष्ट्वा स्नात्वा वै वरणां नदीम्॥ ३<br>स्नानं तु सङ्गमे कृत्वा दृष्ट्वा वै सङ्गेश्वरम्।<br>स्वर्लीने तु कृतस्नानो दृष्ट्वा स्वर्लीनमीश्वरम्॥ ४<br>मन्दाकिन्यां नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै मध्यमेश्वरम्।<br>हिरण्यगर्भे स्नातस्तु दृष्ट्वा चैव तु ईश्वरम्॥ ५<br>मणिकर्ण्यां नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चेशानमीश्वरम्।<br>तस्मिन् कूप उपस्पृश्य दृष्ट्वा गोप्रेक्षमीश्वरम्॥ ६<br>कपिलायां ह्रदे स्नात्वा दृष्ट्वा वै वृषभध्वजम्।<br>उपशान्तस्य देवस्य दक्षिणे कूपमुत्तमम्॥ ७<br>तस्मिन् कूपे उपस्पृश्य दृष्ट्वोपशान्तमीश्वरम्।<br>पञ्चचूडाह्रदे स्नात्वा ज्येष्ठस्थानं ततोऽर्चयेत्॥ ८ | सर्वप्रथम शैलेशका दर्शन करके तथा वरणानदीमें स्नान करके पुनः संगममें स्नानकर तथा संगमेश्वरका दर्शन करके, इसके बाद स्वर्लीनमें स्नान करके तथा स्वर्लीनेश्वरका दर्शन करके पुनः मन्दाकिनीमें स्नान करके तथा मध्यमेश्वरका दर्शन करके पुनः हिरण्यगर्भमें स्नान करके तथा ईश्वरका दर्शन करके इसके बाद मणिकर्णीमें स्नान करके तथा भगवान् ईशानका दर्शन करके पुनः [वहाँपर] उस कूपमें स्नान करके तथा गोप्रेक्षेश्वरका दर्शन करके, पुनः कपिलाह्रदमें स्नान करके तथा वृषभध्वजका दर्शन करके उपशान्तदेवके दक्षिणमें स्थित जो उत्तम कूप है, उस कूपमें स्नान करके तथा उपशान्तेश्वरका दर्शन करनेके अनन्तर पंचचूडाह्रदमें स्नान करके मनुष्यको ज्येष्ठस्थानका अर्चन करना चाहिये॥ ३-८॥ |
| चतुःसमुद्रकूपे तु स्नात्वा देवं ततोऽर्चयेत्।<br>देवस्याग्रे तु कूपस्य तत्रोपस्पर्शनं कृते॥ ९<br>ततोऽर्चयेत देवेशं शुद्धेश्वरमतः परम्।<br>दण्डखाते नरः स्नात्वा व्यादेशं तु ततोऽर्चयेत्॥ १० | इसके बाद चतुःसमुद्रकूपमें स्नान करके देव (लिङ्ग)-का दर्शन-पूजन करना चाहिये। देवके आगे स्थित कूपके जलसे स्नान करनेके बाद देवेश शुद्धेश्वरका अर्चन करना चाहिये। इसके पश्चात् दण्डखातमें स्नान करके मनुष्यको व्यादेशका पूजन करना चाहिये॥ ९-१०॥ |
| शौनकेश्वरकुण्डे तु स्नानं कृत्वा ततोऽर्चयेत्।<br>जम्बुकेश्वरनामानं दृष्ट्वा चैव यशस्विनि॥ ११<br>दृष्ट्वा न जायते मर्त्यः संसारे दुःखसागरे।<br>प्रतिपत्प्रभृति देवेशि यावत् कृष्णचतुर्दशीम्॥ १२ | पुनः शौनकेश्वरकुण्डमें स्नान करके उस लिङ्गका अर्चन करना चाहिये। हे यशस्विनि! जम्बुकेश्वर नामक लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य दुःखसागररूपी संसारमें पुनः जन्म नहीं लेता है। हे देवेशि! हे शुभे! प्रतिपदासे आरम्भ करके कृष्णचतुर्दशीतक क्रमसे इस महान् |
| ८२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| चतुर्दशायतनको सम्पन्न करना चाहिये॥ ११-१२१/२॥ | |
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| एतत्क्रमेण कर्तव्यं महदायतनं शुभे।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि अष्टायतनमुत्तमम्॥ १३<br><br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि लाङ्गलीशं ततो व्रजेत्।<br>तं दृष्ट्वा तु ततो देवि आषाढीशं ततोऽर्चयेत्॥ १४ | अब मैं उत्तम अष्टायतनको बताऊँगा। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्यको लांगलीशके स्थानमें जाना चाहिये। हे देवि! उसका दर्शन करनेके बाद आषाढीशका अर्चन करना चाहिये॥ १३-१४॥ |
| दृष्ट्वा चाषाढिनं देवि भारभूतं ततो व्रजेत्।<br>तं दृष्ट्वा तु ततो देवं गच्छेद्वै त्रिपुरान्तकम्॥ १५ | हे देवि! आषाढीशका दर्शन करनेके बाद भारभूतेश्वरके पास जाना चाहिये। उसका दर्शन करके त्रिपुरान्तकदेवके पास जाना चाहिये॥ १५॥ |
| तं दृष्ट्वापि ततो देवि नकुलीशं ततो व्रजेत्।<br>दक्षिणे नकुलीशस्य त्र्यम्बकं च ततो व्रजेत्॥ १६ | हे देवि! उसका दर्शन करके नकुलीशके पास जाना चाहिये। इसके बाद नकुलीशके दक्षिणमें स्थित त्र्यम्बकके पास जाना चाहिये॥ १६॥ |
| अष्टायतनमेवं हि मया ते परिकीर्तितम्।<br>अष्टायतनमेतद्धि करिष्यन्ति हि ये नराः॥ १७<br><br>ते मृतापि बहिः क्षेत्रे रुद्रलोकस्य भाजनाः॥ १८ | [हे देवि!] इस प्रकार मैंने आपको अष्टायतनके विषयमें बता दिया। जो मनुष्य इस अष्टायतनका दर्शन-पूजन करेंगे, वे इस क्षेत्रके बाहर मरनेपर भी रुद्रलोकके भाजन होंगे॥ १७-१८॥ |
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
| पूर्वं चैव मया देवि पञ्चायतनमुत्तमम्।<br>रोचते मे सदा वासः पञ्चायतन उत्तमे॥ १९ | हे देवि! मैं पहले ही उत्तम पंचायतनका वर्णन कर चुका हूँ। उत्तम पंचायतनमें निवास करना मुझे अच्छा लगता है॥ १९॥ |
| एषां दिगुत्तरा देवि वाराणस्यां सदा प्रिये।<br>मम चोत्तरतो नित्यमस्मिन् स्थाने विशेषतः॥ २०<br><br>एकान्तवासिनो विप्रा भस्मनिष्ठा दृढव्रताः।<br>तेषां तु चोत्तमं स्थानं तद्वदन्ति च केचन॥ २१ | हे देवि! हे प्रिये! वाराणसीमें इनके उत्तर दिशामें और मेरे उत्तरमें इस स्थानपर भस्म धारण करके दृढव्रतमें स्थित होकर विप्रलोग सदा एकान्तवास करते हैं। कुछ लोग उसे उनका उत्तम स्थान बताते हैं॥ २०-२१॥ |
| दिव्या हि सा परा मूर्तिरोङ्कारे ह स्थितः सदा।<br>उत्पत्तिस्थितिकालेऽहं तस्मिन्नायतने स्थितः॥ २२ | वह मूर्ति दिव्य तथा श्रेष्ठ है, मैं सदा उस ओंकारेश्वरमें स्थित हूँ। उत्पत्ति तथा स्थितिके समय मैं उस आयतनमें स्थित रहता हूँ॥ २२॥ |
| एवं च यो विजानाति न स पापेन लिप्यते।<br>सत्यं सत्यं पुनः सत्यं त्रिः सत्यं नान्यथशुभे॥ २३ | जो इस बातको जानता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता है। हे शुभे! यह सत्य है, सत्य है, सत्य है—तीन बार सत्य है, यह अन्यथा नहीं है॥ २३॥ |
| शीघ्रं तत्र च संयातु यदीच्छेन्मामकं पदम्।<br>एवं ते कथितं देवि पुनर्विस्तरतो मया॥ २४ | यदि कोई मेरे लोककी इच्छा करता हो, तो शीघ्र ही वहाँ जाय। हे देवि! इस प्रकार मैंने विस्तारपूर्वक फिरसे आपको यह बता दिया॥ २४॥ |
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
| अविमुक्तं च स्वर्लीनं तथा मध्यमकं शुभम्।<br>एतत् त्रिकण्टकं नाम मृत्युकालेऽमृतप्रदम्॥ २५ | अविमुक्तेश्वर, स्वर्लीनेश्वर तथा शुभ मध्य्मेश्वर—ये त्रिकण्टक नामवाले हैं तथा |
अध्याय १५] चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन ८२७
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मृत्युकालमें अमृत (अमरत्व) प्रदान करनेवाले हैं ॥ २५ ॥ | |
| कारणं तस्य क्षेत्रस्य मया ते कथितं शुभे।<br>इयं वाराणसी पुण्या श्रेष्ठा पाशुपती स्थली।<br>सर्वेषां चैव जन्तूनां हेतुर्मोक्षस्य सुन्दरि॥ २६ | हे शुभे! मैंने उस क्षेत्रके महत्त्वका कारण आपको बता दिया। यह वाराणसी पुण्यमयी, श्रेष्ठ तथा पशुपतिके भक्तोंकी स्थली है और हे सुन्दरि! यह सभी प्राणियोंके मोक्षकी हेतु है॥ २६॥ |
| अविमुक्तं च स्वर्लीनमोङ्कारं चण्डमीश्वरम्।<br>मध्यमं कृत्तिवासं च षडङ्गमीश्वरं स्मृतम्॥ २७ | अविमुक्तेश्वर, स्वर्लीनेश्वर, ओंकारेश्वर, चण्डेश्वर, मध्यमेश्वर, कृत्तिवासेश्वर—यह षडंग लिङ्ग कहा गया है॥ २७॥ |
| अविमुक्ते महाक्षेत्रे गुह्यमेतत्परं मम।<br>सोपदेशेन ज्ञातव्यं यदीच्छेत् परं पदम्॥ २८ | अविमुक्त महाक्षेत्रमें यह मेरा परम गुह्य स्थान है, यदि कोई परम पद चाहता है, तो उसे उपदेशपूर्वक इसे जानना चाहिये॥ २८॥ |
| एतद्रहस्यमाहात्म्यं न देयं यस्य कस्यचित्।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि यात्राकालं च सर्वदा॥ २९ | इस रहस्यमय माहात्म्यको जिस-किसीसे भी प्रकाशित नहीं करना चाहिये। अब मैं यात्राकालका वर्णन करूँगा॥ २९॥ |
| चैत्रमासे तु देवैस्तु यात्रेयं च कृता शुभा।<br>तस्यैव कामकुण्डे तु स्नानपूजनतत्परैः॥ ३० | उसीके कामकुण्डमें स्नान तथा पूजनमें तत्पर देवताओंने चैत्रमासमें इस शुभ यात्राको किया था॥ ३०॥ |
| वैशाखे दैत्यराजैस्तु यात्रेयं च कृता पुरा।<br>विमलेश्वरकुण्डे तु स्नानपूजनतत्परैः॥ ३१ | विमलेश्वर कुण्डके स्नान-पूजनमें तत्पर दैत्यराजोंने वैशाखमासमें इस यात्राको पूर्वकालमें किया था॥ ३१॥ |
| ज्येष्ठमासेऽपि सिद्धैस्तु यात्रेयं च कृता पुरा।<br>रुद्रवासस्य कुण्डे तु स्नानपूजनतत्परैः॥ ३२ | रुद्रवासकुण्डके स्नान-पूजनमें तत्पर सिद्धोंने ज्येष्ठमासमें पूर्वकालमें इस यात्राको किया था॥ ३२॥ |
| आषाढे चाऽपि गन्धर्वैर्यात्रेयं च कृता मम।<br>श्रिया देव्यास्तु कुण्डस्थैः स्नानपूजनतत्परैः॥ ३३ | श्रीदेवीके कुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर रहनेवाले गन्धर्वोंके द्वारा आषाढ़मासमें मेरी यह यात्रा की गयी थी॥ ३३॥ |
| विद्याधरैस्तु यात्रेयं श्रावणे मासि तत्परैः।<br>लक्ष्मीकुण्डस्य संस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३४ | लक्ष्मीकुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर विद्याधरोंने श्रावण महीनेमें इस यात्राको किया था॥ ३४॥ |
| पितृभिश्चाऽपि यात्रेयमाश्विने मासि तत्परैः।<br>कपिलाह्रदसंस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३५<br><br>ऋषिभिश्चापि यात्रेयं कार्तिके मासि तत्परैः।<br>मार्कण्डेयह्रदस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३६ | कपिलाह्रदमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर पितरोंने आश्विनमासमें इस यात्राको किया था। मार्कण्डेयह्रदमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर ऋषियोंने कार्तिकमासमें यह यात्रा की थी॥ ३५-३६॥ |
| विद्याधरैश्च यात्रेयं मासि मार्गशिरे कृता।<br>कपालमोचनस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३७<br><br>गुह्यकैश्चैव यात्रेयं पुष्यमासे तु तत्परैः।<br>पिशाचैश्चैव यात्रेयं माघमासे च तत्परैः॥ ३८ | कपालमोचनमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर विद्याधरोंने मार्गशीर्षमासमें यह यात्रा की थी। गुह्यकोंने समाहित होकर पौषमासमें यह यात्रा की थी। पिशाचोंने समाहित होकर माघमासमें इस यात्राको किया था॥ ३७-३८॥ |
| ८२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| धनेश्वरकुण्डस्थैः स्नानपूजनतत्परैः।<br>यक्षेशैश्चापि यात्रेयं माघमासे च तत्परैः॥ ३९<br><br>कोटितीर्थे तु संस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः।<br>पिशाचैश्चैव यात्रेयं फाल्गुने मासि तत्परैः॥ ४० | धनेश्वरकुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर यक्षेशोंने भी समाहित होकर माघमासमें यह यात्रा की थी। कोटितीर्थमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर पिशाचोंने समाहित होकर फाल्गुनमासमें इस यात्राको किया था॥ ३९-४०॥ | | गोकर्णकुण्डसंस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः।<br>पिशाचैस्तु यदा यस्मिन् फाल्गुनस्य चतुर्दशीम्॥ ४१<br><br>तेन सा प्रोच्यते देवि पिशाची नाम विश्रुता।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि यात्रायां निष्कृतिः परा॥ ४२ | गोकर्णकुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर पिशाचोंने समाहित होकर फाल्गुनमासकी चतुर्दशी तिथिको यह यात्रा की थी, इसलिये हे देवि! वह प्रसिद्ध पिशाची नामवाली कही जाती है। अब मैं यात्रामें श्रेष्ठ निष्कृतिके विषयमें बताऊँगा॥ ४१-४२॥ | | उदकुम्भास्तु दातव्या मिष्टान्नेन समन्विताः।<br>तेन देवि तदा प्राप्तं पूर्वोक्तं फलमेव च॥ ४३ | हे देवि! [यात्रामें] मिष्टान्नसे युक्त उदकुम्भोंका दान करना चाहिये, उससे पूर्वकथित [समस्त] फल प्राप्त होता है॥ ४३॥ | | अतः परं प्रवक्ष्यामि यात्रायां च वरानने।<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां तव यात्रा महाफला॥ ४४ | हे वरानने! अब मैं यात्राके लिये तिथिको बताऊँगा, शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिमें आपकी यात्रा महाफल प्रदान करती है॥ ४४॥ | | यत्र गौरी तु द्रष्टव्या तां च शृणु वरानने।<br>स्नानं कृत्वा तु गन्तव्यं गोप्रेक्षे तु यशस्विनि॥ ४५<br><br>अहनि कालिका देवी अर्चितव्या प्रयत्नतः।<br>ज्येष्ठस्थाने ततो गौरी अर्चितव्या प्रयत्नतः॥ ४६ | हे वरानने! जहाँ गौरीका दर्शन होता है, उस [यात्रा]-को सुनो। हे यशस्विनि! स्नान करके गोप्रेक्षमें जाना चाहिये और दिनमें प्रयत्नपूर्वक कालिकादेवीकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद ज्येष्ठस्थानमें प्रयत्नपूर्वक गौरीकी पूजा करनी चाहिये॥ ४५-४६॥ | | तस्मात् स्थानात्तु गन्तव्यमविमुक्तस्य चोत्तरे।<br>तत्र देवी सदा गौरी पूजितव्या च भक्तितः॥ ४७ | पुनः उस स्थानसे अविमुक्तके उत्तरमें जाना चाहिये और वहाँ सदा भक्तिपूर्वक देवी गौरीकी पूजा करनी चाहिये॥ ४७॥ | | अन्या वापि परा प्रोक्ता संवर्तललिता शुभा।<br>द्रष्टव्या चापि सा देवी सर्वकामफलप्रदा॥ ४८<br><br>सर्वकामानवाप्नोति यदि ध्यायेत मानवः।<br>ततस्तु भोजयेद्विप्रान् शिवभक्तान् शुचिव्रतान्॥ ४९ | श्रेष्ठ तथा शुभ अन्य संवर्त-ललिता भी बतायी गयी हैं, समस्त कामनाओंका फल देनेवाली उन देवीका भी दर्शन करना चाहिये। यदि मनुष्य उनका ध्यान करता है, तो वह सभी वांछित फल प्राप्त करता है॥ ४८१/२॥ | | वासैः सदक्षिणैश्चैव यथार्हमतिपुष्कलैः।<br>पञ्चगौरीं तु यः कृत्वा भक्त्या देवि समाहितः॥ ५०<br><br>सर्वांश्चैव रसान् गन्धान् गौरीमुद्दिश्य ब्राह्मणे॥ ५१ | तत्पश्चात् शुद्ध व्रतवाले शिवभक्त विप्रोंको अपने सामर्थ्यके अनुसार पर्याप्त दक्षिणा तथा वस्त्रके साथ भोजन कराना चाहिये। हे देवि! जो समाहितचित्त होकर पंचगौरीका दर्शन-पूजन करके गौरीको उद्देश्यकर |