भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८१२श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
Sanskrit ShlokaHindi Meaning
नलकूबरेश्वरं नाम सर्वसिद्धिप्रदायकम्।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि मणिकर्णी च विश्रुता॥ ११स्थित है, नलकूबरेश्वर नामक वह लिङ्ग सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाला है॥ ९-१०१/२॥
तस्य चाग्रे महत्तीर्थं सर्वपातकनाशनम्।<br>मणिकर्णीश्वरं देवं कुण्डमध्ये च तिष्ठति॥ १२हे देवि! उसीके दक्षिणमें प्रसिद्ध मणिकर्णी विद्यमान है और उसके आगे सभी पापोंका नाश करनेवाला महातीर्थ स्थित है। मणिकर्णीश्वरदेव कुण्डके मध्यमें स्थित हैं, उनके दर्शनसे इसी शरीरसे सिद्धि प्राप्त हो जाती है॥ ११-१२१/२॥
अनेनैव तु देहेन सिध्यते तस्य दर्शनात्।<br>तस्य चोत्तरदिग्भागे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ १३उसके उत्तर दिशाभागमें परमेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, उसके पूजनसे मनुष्य जरारहित हो जाता है॥ १३१/२॥
परमेश्वरनामानं पूजनादजरो भवेत्।<br>तस्यैव च समीपस्थं लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ १४हे सुश्रोणि! उसीके समीपमें धर्मराजके द्वारा स्थापित पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह पापोंका नाश करनेवाला है। हे देवि! उसीके पश्चिममें निर्जरेश्वर नामक अन्य चतुर्मुख लिङ्ग विद्यमान है, वह श्रेष्ठ लिङ्ग व्याधियोंका नाश करनेवाला है॥ १४-१५१/२॥
धर्मराजेन सुश्रोणि स्थापितं पापनाशनम्।<br>तस्यैव पश्चिमे देवि लिङ्गमन्यच्चतुर्मुखम्॥ १५उसके नैर्ऋत्यकोणमें एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। शुभ कर्मवाले जो पितामह तथा अतिकाय आदि हैं, वे पुण्यशाली लोग यहाँ स्नान करके शास्त्रोक्त विधिसे पिण्डदान करके तथा नदीश्वरलिङ्गका दर्शन करके ब्रह्मलोकसे कभी च्युत नहीं होते हैं॥ १६-१७१/२॥
निर्जरेश्वरनामानं व्याधीनां नाशनं परम्।<br>तस्य नैर्ऋतकोणे तु लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ १६उस लिङ्गके दक्षिणमें वरुणके द्वारा स्थापित वारुणेश्वर नामक दूसरा लिङ्ग स्थित है। उसके दक्षिणभागमें एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, मेरी भक्तिसे युक्त होकर दैत्यराज बाणने उसे स्थापित किया है॥ १८-१९१/२॥
पितामहाश्चातिकायाः स्नाता ये शुभकर्मिणः।<br>पिण्डं दत्त्वा तथोक्तं च दृष्ट्वा देवं नदीश्वरम्॥ १७हे देवि! उसीके दक्षिणमें सभी धर्मोंका फल प्रदान करनेवाला कूष्माण्डेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! उसीके पूर्वमें राक्षसके द्वारा स्थापित एक लिङ्ग विद्यमान है॥ २०-२१॥
ब्रह्मलोकात्तु ते पुण्या न च्यवन्ति कदाचन।<br>दक्षिणे तस्य देवस्य लिङ्गमन्यच्च तिष्ठति॥ १८उसके दक्षिणभागमें गंगाके द्वारा स्थापित गंगेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह देवलोक प्रदान करनेवाला है। हे देवेशि! हे शुभे! हे यशस्विनि! उसके उत्तरमें यहाँपर नदियोंके द्वारा गंगाके तटपर [अनेक] लिङ्ग स्थापित किये गये हैं॥ २२-२३॥
वारुणेश्वरनामानं स्थापितं वरुणेन हि।<br>तस्य दक्षिणपार्श्वे तु लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ १९वहाँ वैवस्वतेश्वर नामक लिङ्गका दर्शन करनेसे
बाणेन दैत्यराजेन स्थापितं मम भक्तितः।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ २०
कूष्माण्डेश्वरनामानं सर्वधर्मफलप्रदम्।<br>तस्यैव पूर्वतो देवि राक्षसेन प्रतिष्ठितम्॥ २१
तस्य दक्षिणपार्श्वे तु गङ्गया स्थापितेन तु।<br>गङ्गेश्वरेति नामानं सुरलोकप्रदायकम्॥ २२
तस्योत्तरेण देवेशि निम्नगाभिस्ततः शुभे।<br>लिङ्गानि स्थापितानीह गङ्गातीरे यशस्विनि॥ २३
वैवस्वतेश्वरं नाम दृष्ट्वा मृत्युभयापहम्।<br>वैवस्वतात्पश्चिमे तु लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ २४