भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ११] कलशेश्वरके समीपस्थ लिङ्गोंके माहात्म्यका वर्णन ८१३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मृत्युका भय दूर हो जाता है। वैवस्वतके पश्चिममें पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ २४॥
आदित्यैः स्थापितं भद्रे आत्मनः श्रेयसोऽर्थिभिः।<br>तस्यैव चाग्रतो भद्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ २५<br><br>वज्रेश्वरेति नामाख्यं सर्वपातकनाशनम्।<br>तस्यैव चाग्रतो भद्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ २६हे भद्रे! अपने कल्याणकी इच्छावाले आदित्योंके द्वारा वह स्थापित किया गया है। हे भद्रे! उसीके आगे सभी पापोंका नाश करनेवाला वज्रेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ २५<sup></sup>/<sub></sub>
कनकेश्वरनामानं गुह्यं देवि सनातनम्।<br>छायेव दृश्यते लिङ्गे स्थाप्यमाने यशस्विनि॥ २७<br><br>छायां च पश्यते यो वै न स पापेन लिप्यते।<br>तस्यैव चाग्रतो देवि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ २८<br><br>तारकेश्वरनामानं सर्वपापहरं शुभम्।<br>पूजनाच्चास्य लिङ्गस्य ज्ञानावाप्तिर्भवेन्नृणाम्॥ २९हे भद्रे! हे देवि! उसीके आगे कनकेश्वर नामक गुह्य तथा सनातन पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे यशस्विनि! उस स्थापित लिङ्गमें छाया-जैसी दिखायी देती है, जो उसमें छायाका दर्शन करता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता है। हे देवि! उसीके आगे सभी पापोंका नाश करनेवाला तारकेश्वर नामक पूर्वाभिमुख शुभ लिङ्ग स्थित है, इस लिङ्गके पूजनसे मनुष्योंको ज्ञानकी प्राप्ति होती है॥ २६-२९॥
अपरं तत्र देवेशि कनकेश्वरसंज्ञितम्।<br>पूजनात्स्वयमेवात्र हिरण्यं संप्रयच्छति॥ ३०हे देवेशि! वहाँ कनकेश्वर नामक दूसरा लिङ्ग है, इसके पूजनसे यह स्वयं सुवर्ण प्रदान करता है॥ ३०॥
कनकेश्वरस्योत्तरेण नाम्ना च मनुजेश्वरम्।<br>मुखलिङ्गं पश्चिमतः सर्वपापप्रणाशनम्॥ ३१कनकेश्वरके उत्तरमें सभी पापोंको नष्ट करनेवाला मनुजेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख मुखलिङ्ग स्थित है॥ ३१॥
तस्यैव चाग्रतो देवि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>इन्द्रेण स्थापितं देवि मम भक्त्या प्रतिष्ठितम्॥ ३२<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण देवि ज्ञानं प्रवर्तते।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि रम्भया सम्प्रतिष्ठितम्॥ ३३हे देवि! उसीके आगे एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! इन्द्रने मेरी भक्तिसे उसे स्थापित किया है। हे देवि! उसके दर्शनमात्रसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है॥ ३२<sup></sup>/<sub></sub>
मुखलिङ्गं च तं देवि दक्षिणाभिमुखं स्थितम्।<br>इन्द्रेश्वरस्योत्तरेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ३४<br><br>शच्या च स्थापितं भद्रे देवराजस्य भार्यया।<br>तस्योत्तरदिशाभागे लोकपालैः प्रतिष्ठितम्॥ ३५हे देवि! उसीके दक्षिणमें रम्भाके द्वारा मुखलिङ्ग स्थापित किया गया है, हे देवि! वह दक्षिणाभिमुख स्थित है। इन्द्रेश्वरके उत्तरमें एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे भद्रे! देवराजकी पत्नी शचीने उसे स्थापित किया है। उसके उत्तर दिशाभागमें लोकपालोंके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ ३३-३५॥
अन्यानि तत्र लिङ्गानि देवासुरमरुद्गणैः।<br>यक्षैर्नागैश्च गन्धर्वैः किन्नराप्सरसां गणैः॥ ३६<br><br>लोकपालैः सुरैश्चैव लिङ्गानि स्थापितानि तु।<br>तस्यैव दक्षिणे लिङ्गं महापातकनाशनम्॥ ३७<br><br>पूर्वामुखं तु तं भद्रे फाल्गुनेन प्रतिष्ठितम्।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे महापाशुपतेश्वरम्॥ ३८देवताओं, असुरों, मरुद्गणों, यक्षों, नागों, गन्धर्वों, किन्नरों, अप्सराओं, लोकपालों तथा सुरोंके द्वारा वहाँपर अनेक लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। उसीके दक्षिणमें महापातकोंका नाश करनेवाला पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! वह फाल्गुनके द्वारा स्थापित किया गया है॥ ३६-३७<sup></sup>/<sub></sub>
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