श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ११ ] कलशेश्वरके समीपस्थ लिङ्गोंके माहात्म्यका वर्णन [ ८९१
| जन्ममृत्युजराव्याधिर्नश्यते तस्य भामिनि।<br>यत्र श्वेतकृतं लिङ्गं भक्त्या योऽर्चयते नरः॥ ७७<br><br>जन्ममृत्युभयं भित्त्वा संसारं न विशेत्पुनः॥ ७८ । | व्याधि—यह सब नष्ट हो जाता है ॥ ७५-७६^{१}/_{२} ॥<br>जो मनुष्य वहाँ श्वेतमुनिके द्वारा स्थापित किये गये लिङ्गका भक्तिपूर्वक अर्चन करता है, वह जन्म-मृत्युके भयका भेदन करके पुनः संसारमें प्रवेश नहीं करता है॥ ७७-७८॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुहायतनवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुहायतनवर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥
ग्यारहवाँ अध्याय
कलशेश्वरके समीपस्थ लिङ्गोंके माहात्म्यका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| उत्तरे तस्य देवस्य चित्रगुप्तेश्वरं स्थितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं देवं वाराणस्यां सुरेश्वरि॥ १ | हे सुरेश्वरि! वाराणसीमें उस लिङ्गके उत्तरमें पश्चिमकी ओर मुखवाला चित्रगुप्तेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है॥ १॥ |
| चित्रगुप्तं न पश्येत योऽत्र द्रक्ष्यति मानवः।<br>पश्चिमे चित्रगुप्तस्य अन्यल्लिङ्गं स्थितं शुभे॥ २<br><br>छायया स्थापितं लिङ्गं तं दृष्ट्वा नातपं भवेत्।<br>विनायकश्च तत्रैव पश्चिमेन यशस्विनि॥ ३<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण विघ्नैर्नैवाभिभूयते। | यहाँपर जो मनुष्य चित्रगुप्तेश्वरका दर्शन करता है, उसे पुनः संसारको नहीं देखना पड़ता है। हे शुभे! चित्रगुप्तके पश्चिममें छायाके द्वारा स्थापित किया गया अन्य लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गका दर्शन करनेसे आतपका कष्ट नहीं होता है। हे यशस्विनि! वहींपर पश्चिममें विनायक विद्यमान हैं, उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य विघ्नोंसे बाधित नहीं होता है॥ २-३^{१}/_{२}॥ |
| कुण्डं तस्य तु पूर्वेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ४<br><br>मुखलिङ्गं तु तद्देवि विरूपाक्षं स्वयं प्रिये।<br>दक्षिणेन तु तस्यैव कूपस्तिष्ठति भामिनि॥ ५<br><br>दर्शनात्तस्य कूपस्य यमद्वारं न पश्यति।<br>कूपं चापि स्थितं तत्र उपस्पर्शनपुण्यदम्॥ ६ | उनके पूर्वमें एक कुण्ड तथा पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे देवि! हे प्रिये! वह स्वयं विरूपाक्ष नामक मुखलिङ्ग है। हे भामिनि! उसीके दक्षिणमें एक कूप स्थित है, उस कूपके दर्शनसे मनुष्य यमका द्वार नहीं देखता है। वहाँ जो कूप स्थित है, उसमें स्नान करना पुण्यप्रद है॥ ४-६॥ |
| अन्यानि तत्र लिङ्गानि सुरैः संस्थापितानि च।<br>दक्षिणे कलशेशस्य लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ७<br><br>गुहेश्वरेति नामानं सर्वपुण्यफलप्रदम्।<br>तस्यैव दक्षिणे पार्श्वे द्वावेतौ तत्र संस्थितौ॥ ८<br><br>उत्तमेश्वरनामानं वामदेवमतः परम्। | वहाँपर देवताओंके द्वारा अन्य लिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं। कलशेशके दक्षिणमें समस्त पुण्योंका फल प्रदान करनेवाला गुहेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। उसीके दक्षिणभागमें वहाँपर उत्तमेश्वर तथा वामदेव नामक—ये दो लिङ्ग स्थित हैं॥ ७-८^{१}/_{२}॥ |
| तस्यैव पश्चिमे देवि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ९<br><br>कम्बलाश्वतराक्षं तु गन्धर्वपददायकम्।<br>अपरं तस्य देवस्य लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ १० | हे देवि! उसीके पश्चिममें गन्धर्वपद प्रदान करनेवाला कम्बलाश्वतराक्ष नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। वहाँ उन प्रभुका दूसरा पश्चिमाभिमुख लिङ्ग |