श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| धनेश्वरकुण्डस्थैः स्नानपूजनतत्परैः।<br>यक्षेशैश्चापि यात्रेयं माघमासे च तत्परैः॥ ३९<br><br>कोटितीर्थे तु संस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः।<br>पिशाचैश्चैव यात्रेयं फाल्गुने मासि तत्परैः॥ ४० | धनेश्वरकुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर यक्षेशोंने भी समाहित होकर माघमासमें यह यात्रा की थी। कोटितीर्थमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर पिशाचोंने समाहित होकर फाल्गुनमासमें इस यात्राको किया था॥ ३९-४०॥ | | गोकर्णकुण्डसंस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः।<br>पिशाचैस्तु यदा यस्मिन् फाल्गुनस्य चतुर्दशीम्॥ ४१<br><br>तेन सा प्रोच्यते देवि पिशाची नाम विश्रुता।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि यात्रायां निष्कृतिः परा॥ ४२ | गोकर्णकुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर पिशाचोंने समाहित होकर फाल्गुनमासकी चतुर्दशी तिथिको यह यात्रा की थी, इसलिये हे देवि! वह प्रसिद्ध पिशाची नामवाली कही जाती है। अब मैं यात्रामें श्रेष्ठ निष्कृतिके विषयमें बताऊँगा॥ ४१-४२॥ | | उदकुम्भास्तु दातव्या मिष्टान्नेन समन्विताः।<br>तेन देवि तदा प्राप्तं पूर्वोक्तं फलमेव च॥ ४३ | हे देवि! [यात्रामें] मिष्टान्नसे युक्त उदकुम्भोंका दान करना चाहिये, उससे पूर्वकथित [समस्त] फल प्राप्त होता है॥ ४३॥ | | अतः परं प्रवक्ष्यामि यात्रायां च वरानने।<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां तव यात्रा महाफला॥ ४४ | हे वरानने! अब मैं यात्राके लिये तिथिको बताऊँगा, शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिमें आपकी यात्रा महाफल प्रदान करती है॥ ४४॥ | | यत्र गौरी तु द्रष्टव्या तां च शृणु वरानने।<br>स्नानं कृत्वा तु गन्तव्यं गोप्रेक्षे तु यशस्विनि॥ ४५<br><br>अहनि कालिका देवी अर्चितव्या प्रयत्नतः।<br>ज्येष्ठस्थाने ततो गौरी अर्चितव्या प्रयत्नतः॥ ४६ | हे वरानने! जहाँ गौरीका दर्शन होता है, उस [यात्रा]-को सुनो। हे यशस्विनि! स्नान करके गोप्रेक्षमें जाना चाहिये और दिनमें प्रयत्नपूर्वक कालिकादेवीकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद ज्येष्ठस्थानमें प्रयत्नपूर्वक गौरीकी पूजा करनी चाहिये॥ ४५-४६॥ | | तस्मात् स्थानात्तु गन्तव्यमविमुक्तस्य चोत्तरे।<br>तत्र देवी सदा गौरी पूजितव्या च भक्तितः॥ ४७ | पुनः उस स्थानसे अविमुक्तके उत्तरमें जाना चाहिये और वहाँ सदा भक्तिपूर्वक देवी गौरीकी पूजा करनी चाहिये॥ ४७॥ | | अन्या वापि परा प्रोक्ता संवर्तललिता शुभा।<br>द्रष्टव्या चापि सा देवी सर्वकामफलप्रदा॥ ४८<br><br>सर्वकामानवाप्नोति यदि ध्यायेत मानवः।<br>ततस्तु भोजयेद्विप्रान् शिवभक्तान् शुचिव्रतान्॥ ४९ | श्रेष्ठ तथा शुभ अन्य संवर्त-ललिता भी बतायी गयी हैं, समस्त कामनाओंका फल देनेवाली उन देवीका भी दर्शन करना चाहिये। यदि मनुष्य उनका ध्यान करता है, तो वह सभी वांछित फल प्राप्त करता है॥ ४८१/२॥ | | वासैः सदक्षिणैश्चैव यथार्हमतिपुष्कलैः।<br>पञ्चगौरीं तु यः कृत्वा भक्त्या देवि समाहितः॥ ५०<br><br>सर्वांश्चैव रसान् गन्धान् गौरीमुद्दिश्य ब्राह्मणे॥ ५१ | तत्पश्चात् शुद्ध व्रतवाले शिवभक्त विप्रोंको अपने सामर्थ्यके अनुसार पर्याप्त दक्षिणा तथा वस्त्रके साथ भोजन कराना चाहिये। हे देवि! जो समाहितचित्त होकर पंचगौरीका दर्शन-पूजन करके गौरीको उद्देश्यकर |