श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय १५ ] | चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन | ८२९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उत्तमं श्रेय आप्नोति सौभाग्येन समन्वितम्।<br>विनायकान् प्रवक्ष्यामि अस्य क्षेत्रस्य विघ्नदान्॥ ५२ | ब्राह्मणको समस्त रस तथा गन्ध समर्पित करता है, वह सौभाग्ययुक्त उत्तम कल्याणकी प्राप्ति करता है। अब मैं इस क्षेत्रके विघ्नदायक विनायकोंका वर्णन करूँगा॥ ४९–५२॥ |
| ढुण्डिं तु प्रथमं दृष्ट्वा तथा कोणविनायकम्।<br>देव्या विनायकं चैव गोप्रेक्षे हस्तिनं स्मृतम्॥ ५३<br><br>विनायकं तथैवान्यं सिन्दूरं नाम विश्रुतम्।<br>चतुर्थो देवि द्रष्टव्य एवं पञ्च विनायकाः॥ ५४<br><br>लड्डुकाश्च प्रदातव्या एतानुद्दिश्य ब्राह्मणे।<br>एतेन चैव धर्मेण सिद्धिमान् जायते नरः॥ ५५ | हे देवि! सर्वप्रथम ढुंढि [विनायक]-का दर्शन करके कोणविनायक, देवीविनायक, गोप्रेक्षमें प्रसिद्ध हस्तीविनायक तथा अन्य चौथे सिन्दूर नामसे विख्यात विनायकका दर्शन करना चाहिये। इस प्रकार ये पाँच विनायक हैं। इन्हें उद्देश्य करके ब्राह्मणोंको मोदक प्रदान करना चाहिये। इस धर्मकृत्यके द्वारा मनुष्य सिद्धिसे युक्त हो जाता है॥ ५३–५५॥ |
| अतः परं प्रवक्ष्यामि चण्डिकाः क्षेत्ररक्षिकाः।<br>दक्षिणे रक्षते दुर्गा नैर्ऋते चोत्तरेश्वरी॥ ५६<br><br>अङ्गारेशी पश्चिमे च वायव्ये भद्रकालिका।<br>उत्तरे भीष्मचण्डी च महामुण्डा च सा ततः॥ ५७ | इसके बाद मैं क्षेत्रकी रक्षा करनेवाली चण्डिकाओंका वर्णन करूँगा। दक्षिणमें दुर्गा, नैर्ऋतकोणमें उत्तरेश्वरी, पश्चिममें अंगारेशी, वायव्यकोणमें भद्रकालिका, उत्तरमें भीष्मचण्डी तथा इसके अनन्तर महामुण्डा रक्षा करती हैं॥ ५६–५७॥ |
| ऊर्ध्वकेशी समायुक्ता शाङ्करी सर्वतः स्मृता।<br>ऊर्ध्वकेशी च आग्नेय्यां चित्रघण्टाथ मध्यतः॥ ५८ | ऊर्ध्वकेशी तथा शांकरी सब ओरसे रक्षा करनेवाली कही गयी हैं। ऊर्ध्वकेशी अग्निकोणमें तथा चित्रघण्टा मध्यमें रक्षा करती हैं॥ ५८॥ |
| एताश्च चण्डिका देवि योऽत्र द्रक्ष्यति मानवः।<br>तस्य तुष्टाश्च ताः सर्वाः क्षेत्रं रक्षन्ति तत्पराः॥ ५९<br><br>विघ्नं कुर्वन्ति सततं पापानां देवि सर्वदा।<br>तस्माच्चैव सदा पूज्याश्चण्डिकाः सविनायकाः॥ ६० | हे देवि! जो मनुष्य इन चण्डिकाओंका दर्शन करता है, उसपर प्रसन्न होकर वे सब [चण्डिकाएँ] तत्पर होकर क्षेत्रकी रक्षा करती हैं और हे देवि! उसके पापोंको निरन्तर नष्ट करती हैं। इसलिये हे देवि! यदि कोई वाराणसीमें सतत शुभ स्थितिको चाहता है, तो उसे विनायकोंसहित चण्डिकाओंकी पूजा सदा करनी चाहिये॥ ५९–६० १/२॥ |
| यदिच्छेत् सततं देवि वाराणस्यां शुभां स्थितिम्।<br>अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि तस्मिन् क्षेत्रे सुरेश्वरि॥ ६१<br><br>तिस्रो नद्यस्तु तत्रस्था वहन्ति च शुभोदकाः।<br>यासां दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्या निवर्तते॥ ६२ | हे सुरेश्वरि! अब मैं उस क्षेत्रमें स्थित अन्य तीर्थोंको बताऊँगा। पवित्र जलवाली तीन नदियाँ वहाँ स्थित हैं और [सदा] प्रवाहित होती रहती हैं, जिनके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्या दूर हो जाती है॥ ६१–६२॥ |
| एका पितामहस्रोता मन्दाकिनी तथापरा।<br>मत्स्योदरी तृतीया च एतास्तिस्रस्तु पुण्यदाः॥ ६३ | पहली पितामहस्रोता, दूसरी मन्दाकिनी, तीसरी मत्स्योदरी—ये तीनों [नदियाँ] पुण्य प्रदान करनेवाली हैं॥ ६३॥ |