भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८३०श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
मन्दाकिनी तथा पुण्या मध्यमेश्वरसंस्थिता।<br>पितामहस्रोतिका च अविमुक्ते तु पुण्यदा॥ ६४॥<br><br>मत्स्योदरी च ओङ्कारे पुण्यदा सर्वदैवतैः।<br>तस्मिन् स्थाने यदि गङ्गा आगमिष्यति भामिनि॥ ६५॥<br><br>तदा पुण्यतमः कालो देवानामपि दुर्लभः।<br>वरणासिक्तसलिले जाह्नवी जलमिश्रिते॥ ६६॥<br><br>तत्र नादेश्वरे पुण्ये स्नातः किमनुशोचति।<br>तस्मिन् काले च तत्रैव स्नानं देवि कृतं मया॥ ६७॥पुण्यमयी मन्दाकिनी [नदी] मध्यमेश्वरमें स्थित हैं, पुण्यदायिनी पितामहस्रोता अविमुक्तेश्वरमें हैं और पुण्यप्रदा मत्स्योदरी सभी देवताओंके साथ ओंकारेश्वरमें स्थित हैं। हे भामिनि! जब गंगा उस स्थानमें आती हैं, तब देवताओंके लिये भी दुर्लभ वह पुण्यतम काल होता है। वरणाके जलसे सिक्त तथा गंगाके जलसे मिश्रित वहाँ पुण्यप्रद नादेश्वरमें स्नान करके मनुष्यको कौन-सा सन्ताप रह जाता है? हे देवि! उस समय वहींपर मैंने स्नान किया था॥ ६४-६७॥
तेन हस्ततलाद्देवि कपालं पतितं क्षणात्।<br>कपालमोचनं नाम तत्रैव सुमहत्सरः॥ ६८॥हे देवि! उस समय हस्ततलसे क्षणभरमें [मेरा] कपाल गिर पड़ा, उससे वहींपर कपालमोचन नामक एक महान् सरोवर हो गया॥ ६८॥
पावनं सर्वसत्त्वानां पुण्यदं सर्वदेहिनाम्।<br>ओङ्कारेश्वरनामानं तत्र स्नानं कृतं मया॥ ६९॥<br><br>तेन स प्रोच्यते देव ओङ्कारेश्वरनामतः।<br>मत्स्योदरीजले गङ्गा ओङ्कारेश्वरसन्निधौ॥ ७०॥<br><br>तदा तस्मिन् जले स्नात्वा ब्रह्महत्यां व्यपोहति।<br>मत्स्योदरी जले स्नात्वा दृष्ट्वा चोङ्कारमीश्वरम्॥ ७१॥<br><br>शोकमोहजरामृत्युर्न च तं स्पृशते पुनः॥ ७२॥सभी जीवोंको पवित्र करनेवाला तथा सभी देहधारियोंको पुण्य प्रदान करनेवाला ओंकारेश्वर नामक जो तीर्थ है, वहाँ भी मैंने स्नान किया था, इसलिये वह लिङ्ग ओंकारेश्वर नामसे पुकारा जाता है। ओंकारेश्वरकी सन्निधिमें मत्स्योदरीके जलमें जब गंगा मिलती हैं, उस समय उस जलमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। मत्स्योदरीके जलमें स्नान करने तथा ओंकारेश्वरका दर्शन करनेसे उस मनुष्यको शोक, मोह, जरा तथा मृत्यु—ये सब स्पर्श भी नहीं करते हैं॥ ६९-७२॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्यायतनवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५॥


सोलहवाँ अध्याय

काशीमें लिङ्गार्चनकी महिमा

विष्णुरुवाच<br>एतच्छ्रुत्वा वचो देवी विस्मयोत्फुल्ललोचना।<br>ओङ्कारदर्शनार्थं वै कपिलेशमुपागता॥ १॥विष्णु बोले—यह सुनकर प्रफुल्लित नेत्रोंवाली वे देवी ओंकारेश्वरका दर्शन करनेके लिये कपिलेश्वरमें आ गयीं॥ १॥
तस्मात्त्वमपि देवेशं पूजयस्व सदाशिवम्।<br>एतत्परममानन्दं प्राप्स्यते परमं पदम्॥ २॥अतः आप भी देवेश सदाशिवका पूजन कीजिये, इससे आपको परम आनन्द तथा परम पद प्राप्त होगा॥ २॥