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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

१६- काशीमें लिङ्गार्चनकी महिमा

८३०श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
मन्दाकिनी तथा पुण्या मध्यमेश्वरसंस्थिता।<br>पितामहस्रोतिका च अविमुक्ते तु पुण्यदा॥ ६४॥<br><br>मत्स्योदरी च ओङ्कारे पुण्यदा सर्वदैवतैः।<br>तस्मिन् स्थाने यदि गङ्गा आगमिष्यति भामिनि॥ ६५॥<br><br>तदा पुण्यतमः कालो देवानामपि दुर्लभः।<br>वरणासिक्तसलिले जाह्नवी जलमिश्रिते॥ ६६॥<br><br>तत्र नादेश्वरे पुण्ये स्नातः किमनुशोचति।<br>तस्मिन् काले च तत्रैव स्नानं देवि कृतं मया॥ ६७॥पुण्यमयी मन्दाकिनी [नदी] मध्यमेश्वरमें स्थित हैं, पुण्यदायिनी पितामहस्रोता अविमुक्तेश्वरमें हैं और पुण्यप्रदा मत्स्योदरी सभी देवताओंके साथ ओंकारेश्वरमें स्थित हैं। हे भामिनि! जब गंगा उस स्थानमें आती हैं, तब देवताओंके लिये भी दुर्लभ वह पुण्यतम काल होता है। वरणाके जलसे सिक्त तथा गंगाके जलसे मिश्रित वहाँ पुण्यप्रद नादेश्वरमें स्नान करके मनुष्यको कौन-सा सन्ताप रह जाता है? हे देवि! उस समय वहींपर मैंने स्नान किया था॥ ६४-६७॥
तेन हस्ततलाद्देवि कपालं पतितं क्षणात्।<br>कपालमोचनं नाम तत्रैव सुमहत्सरः॥ ६८॥हे देवि! उस समय हस्ततलसे क्षणभरमें [मेरा] कपाल गिर पड़ा, उससे वहींपर कपालमोचन नामक एक महान् सरोवर हो गया॥ ६८॥
पावनं सर्वसत्त्वानां पुण्यदं सर्वदेहिनाम्।<br>ओङ्कारेश्वरनामानं तत्र स्नानं कृतं मया॥ ६९॥<br><br>तेन स प्रोच्यते देव ओङ्कारेश्वरनामतः।<br>मत्स्योदरीजले गङ्गा ओङ्कारेश्वरसन्निधौ॥ ७०॥<br><br>तदा तस्मिन् जले स्नात्वा ब्रह्महत्यां व्यपोहति।<br>मत्स्योदरी जले स्नात्वा दृष्ट्वा चोङ्कारमीश्वरम्॥ ७१॥<br><br>शोकमोहजरामृत्युर्न च तं स्पृशते पुनः॥ ७२॥सभी जीवोंको पवित्र करनेवाला तथा सभी देहधारियोंको पुण्य प्रदान करनेवाला ओंकारेश्वर नामक जो तीर्थ है, वहाँ भी मैंने स्नान किया था, इसलिये वह लिङ्ग ओंकारेश्वर नामसे पुकारा जाता है। ओंकारेश्वरकी सन्निधिमें मत्स्योदरीके जलमें जब गंगा मिलती हैं, उस समय उस जलमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। मत्स्योदरीके जलमें स्नान करने तथा ओंकारेश्वरका दर्शन करनेसे उस मनुष्यको शोक, मोह, जरा तथा मृत्यु—ये सब स्पर्श भी नहीं करते हैं॥ ६९-७२॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्यायतनवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५॥


सोलहवाँ अध्याय

काशीमें लिङ्गार्चनकी महिमा

विष्णुरुवाच<br>एतच्छ्रुत्वा वचो देवी विस्मयोत्फुल्ललोचना।<br>ओङ्कारदर्शनार्थं वै कपिलेशमुपागता॥ १॥विष्णु बोले—यह सुनकर प्रफुल्लित नेत्रोंवाली वे देवी ओंकारेश्वरका दर्शन करनेके लिये कपिलेश्वरमें आ गयीं॥ १॥
तस्मात्त्वमपि देवेशं पूजयस्व सदाशिवम्।<br>एतत्परममानन्दं प्राप्स्यते परमं पदम्॥ २॥अतः आप भी देवेश सदाशिवका पूजन कीजिये, इससे आपको परम आनन्द तथा परम पद प्राप्त होगा॥ २॥

अध्याय १६ ] काशीमें लिङ्गार्चनकी महिमा ८३१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतच्छ्रुत्वा परं गुह्यं सकाशाच्चक्रपाणिनः ।<br>ओङ्कारमर्चयेद्देवं सदा तद्गतमानसः ॥ ३यह परम रहस्य सुनकर चक्रपाणि विष्णुके पाससे आकर वे शिवमें आसक्तचित्त होकर प्रभु ओंकारेश्वरका अर्चन निरन्तर करने लगे ॥ ३ ॥
सूर्य उवाच<br>तस्मात्त्वमपि दुर्धर्षमाराधय सुरेश्वरम् ।<br>तेन तत्पदमाप्नोषि यदन्यैरपि दुर्लभम् ॥ ४**सूर्य बोले—**अतः आप भी दुर्धर्ष सुरेश्वरकी आराधना कीजिये, इसके द्वारा आप उस पदको प्राप्त कर लोगे, जो अन्य लोगोंसे दुर्लभ है ॥ ४ ॥
सूर्यस्य वचनं श्रुत्वा वाराणस्यामुपागतः ।<br>तत्र देवि तदोङ्कारं दृष्ट्वा चैव प्रणम्य च ॥ ५<br>आराधनपरो भूत्वा लिङ्गं स्थाप्य चतुर्मुखम् ।<br>देवदेवसकाशाद्वै कृतकृत्यो भवेच्छुचिः ॥ ६<br>यः सम्प्राप्य महत्तत्त्वमीश्वरे कृतनिश्चयः ।<br>तस्मात्त्वमपि गार्गेय यदि श्रेयोऽभिवाञ्छसि ॥ ७<br>आराधयस्व देवेशं मनसः स्थैर्यमात्मनः ।<br>तस्मिंस्तु यः शिवः साक्षादोङ्कारेश्वरसंज्ञितः ॥ ८भगवान् सूर्यका वचन सुनकर वे वाराणसीमें आ गये और हे देवि! वहाँपर ओंकारेश्वरका दर्शन करके उन्हें प्रणामकर आराधनापरायण होकर देवदेवके पास चतुर्मुखलिङ्गकी स्थापना करके कृतकृत्य तथा पवित्र हो गये और महत्तत्त्वकी प्राप्ति करके ईश्वरमें निश्चय बुद्धिवाले हो गये। अतः हे गार्गेय! यदि आप भी कल्याण तथा अपने मनकी स्थिरता चाहते हैं, तो देवेशकी आराधना कीजिये। जो साक्षात् शिव हैं, वे ही ओंकारेश्वर नामसे उस स्थानमें विराजमान हैं ॥ ५–८ ॥
एतद्गुह्यस्य माहात्म्यं तव स्नेहान्महामुने ।<br>अकारं च उकारं च मकारं च प्रकीर्तितः ॥ ९<br>अस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धो मुनिकालिकवृक्षयः ।<br>अकारस्तत्र विज्ञेयो विष्णुलोकगतिप्रदः ॥ १०हे महामुने! मैंने आपके स्नेहके कारण ही इस लिङ्गके माहात्म्यको बताया है। यह अकार, उकार तथा मकारसे युक्त कहा गया है। मुनि कालिकवृक्षिय इस लिङ्गमें सिद्ध हुए हैं। उसमें अकारको विष्णुलोककी गति प्रदान करनेवाला जानना चाहिये ॥ ९–१० ॥
तस्य दक्षिणपार्श्वे तु ओङ्काराख्येति कीर्तितः ।<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्तो देवाचार्यो बृहस्पतिः ॥ ११उसके दक्षिणभागमें ही ओंकार नामक लिङ्ग बताया गया है। वहाँ देवाचार्य बृहस्पति परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ॥ ११ ॥
उकारं तत्र विज्ञेयं ब्रह्मणः पदमव्ययम् ।<br>तस्य चोत्तरदिग्भागे मकारं विष्णुसंज्ञकम् ॥ १२<br>तस्मिँल्लिङ्गे च संसिद्धः कपिलर्षिर्महामुनिः ।<br>तस्मात्त्वमपि गार्गेय मनस्स्थैर्यं यदीच्छसि ॥ १३<br>लिङ्गस्याराधने यत्नं कुरुष्व नियतव्रतः ।<br>विद्यां पाशुपतीं प्राप्य तस्मिन् स्तुत्ये व्यपाश्रयः ॥ १४<br>निर्ममो निरहङ्कारः पदमाप्नोषि शाश्वतम् ।उसमें उकारको ब्रह्माका अव्यय पद देनेवाला जानना चाहिये। उसके उत्तरदिशामें विष्णुसंज्ञक मकारको जानना चाहिये, उस लिङ्गमें महामुनि ऋषि कपिल सिद्ध हुए हैं। अतः हे गार्गेय! यदि आप भी मनकी शान्ति चाहते हैं तो व्रतमें स्थित होकर लिङ्गकी आराधनाके लिये प्रयत्न कीजिये। अनन्यचित्तवाला, मोहरहित तथा अहंकारशून्य होकर उसकी उपासना करनेपर पाशुपतीविद्या प्राप्त करके आप शाश्वत पद प्राप्त कर लेंगे ॥ १२–१४ १/२ ॥
एतच्छ्रुत्वा वचः स्तुत्वा याज्ञवल्क्यस्य दर्शिताः ॥ १५<br>वाराणसीं समभ्येत्य पञ्चायतनमुत्तमम् ।<br>आराध्यमानो देवेशस्तस्मिन् स्थाने स्थितः सदा ॥ १६यह वचन सुनकर याज्ञवल्क्यकी मन्त्रसंहिताओंकी स्तुति करके वे वाराणसीमें आकर उत्तम पंचायतनकी
८३२श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

| तस्मादन्येऽपि ये केचिल्लिङ्गस्याराधने रताः ।<br>तेषां वै पश्चिमे काले ज्ञानमुत्पद्यते सदा ॥ १७ | आराधना करने लगे, उस स्थानमें सबके द्वारा आराधित होनेवाले देवेश सदा स्थित रहते हैं॥ १५-१६॥<br><br>अतः जो कोई दूसरे लोग भी लिङ्गकी आराधनामें संलग्न रहते हैं, उन्हें अन्तिम समयमें ज्ञानका उदय हो जाता है॥ १७॥ | | एवं ज्ञात्वा तु यो मर्त्यः सदा लिङ्गार्चने रतः ।<br>न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ॥ १८ | इसे जानकर जो मनुष्य लिङ्गके अर्चनमें सदा रत रहता है, सौ करोड़ कल्पोंमें भी उसका पुनर्जन्म नहीं होता है॥ १८॥ | | तस्माद्वै सम्प्रदायाच्च अर्चितव्यं प्रयत्नतः ।<br>मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य विद्युत्सम्पातचञ्चलम् ॥ १९ | अतः विद्युत्-सम्पातके समान चंचल (अस्थिर) दुर्लभ मानवशरीर प्राप्त करके शैवविधानके अनुसार प्रयत्नपूर्वक लिङ्गका अर्चन करना चाहिये। जो विप्र लिङ्गका अर्चन करता है, वह अपना उद्धार कर लेता है और जो लिङ्गका अर्चन नहीं करता है, वह अपनेको विनष्ट कर लेता है॥ १९-२०॥ | | लिङ्गं योऽर्चयते विप्र आत्मानं स समुद्धरेत् ।<br>आत्मानं घातयेन्नित्यं यो न लिङ्गं समर्चयेत् ॥ २० | |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्वायतनवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्वायतनवर्णन' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥

॥ श्रीलिङ्गमहापुराण-परिशिष्ट पूर्ण हुआ ॥