भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १५] चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन ८२७


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मृत्युकालमें अमृत (अमरत्व) प्रदान करनेवाले हैं ॥ २५ ॥
कारणं तस्य क्षेत्रस्य मया ते कथितं शुभे।<br>इयं वाराणसी पुण्या श्रेष्ठा पाशुपती स्थली।<br>सर्वेषां चैव जन्तूनां हेतुर्मोक्षस्य सुन्दरि॥ २६हे शुभे! मैंने उस क्षेत्रके महत्त्वका कारण आपको बता दिया। यह वाराणसी पुण्यमयी, श्रेष्ठ तथा पशुपतिके भक्तोंकी स्थली है और हे सुन्दरि! यह सभी प्राणियोंके मोक्षकी हेतु है॥ २६॥
अविमुक्तं च स्वर्लीनमोङ्कारं चण्डमीश्वरम्।<br>मध्यमं कृत्तिवासं च षडङ्गमीश्वरं स्मृतम्॥ २७अविमुक्तेश्वर, स्वर्लीनेश्वर, ओंकारेश्वर, चण्डेश्वर, मध्यमेश्वर, कृत्तिवासेश्वर—यह षडंग लिङ्ग कहा गया है॥ २७॥
अविमुक्ते महाक्षेत्रे गुह्यमेतत्परं मम।<br>सोपदेशेन ज्ञातव्यं यदीच्छेत् परं पदम्॥ २८अविमुक्त महाक्षेत्रमें यह मेरा परम गुह्य स्थान है, यदि कोई परम पद चाहता है, तो उसे उपदेशपूर्वक इसे जानना चाहिये॥ २८॥
एतद्रहस्यमाहात्म्यं न देयं यस्य कस्यचित्।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि यात्राकालं च सर्वदा॥ २९इस रहस्यमय माहात्म्यको जिस-किसीसे भी प्रकाशित नहीं करना चाहिये। अब मैं यात्राकालका वर्णन करूँगा॥ २९॥
चैत्रमासे तु देवैस्तु यात्रेयं च कृता शुभा।<br>तस्यैव कामकुण्डे तु स्नानपूजनतत्परैः॥ ३०उसीके कामकुण्डमें स्नान तथा पूजनमें तत्पर देवताओंने चैत्रमासमें इस शुभ यात्राको किया था॥ ३०॥
वैशाखे दैत्यराजैस्तु यात्रेयं च कृता पुरा।<br>विमलेश्वरकुण्डे तु स्नानपूजनतत्परैः॥ ३१विमलेश्वर कुण्डके स्नान-पूजनमें तत्पर दैत्यराजोंने वैशाखमासमें इस यात्राको पूर्वकालमें किया था॥ ३१॥
ज्येष्ठमासेऽपि सिद्धैस्तु यात्रेयं च कृता पुरा।<br>रुद्रवासस्य कुण्डे तु स्नानपूजनतत्परैः॥ ३२रुद्रवासकुण्डके स्नान-पूजनमें तत्पर सिद्धोंने ज्येष्ठमासमें पूर्वकालमें इस यात्राको किया था॥ ३२॥
आषाढे चाऽपि गन्धर्वैर्यात्रेयं च कृता मम।<br>श्रिया देव्यास्तु कुण्डस्थैः स्नानपूजनतत्परैः॥ ३३श्रीदेवीके कुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर रहनेवाले गन्धर्वोंके द्वारा आषाढ़मासमें मेरी यह यात्रा की गयी थी॥ ३३॥
विद्याधरैस्तु यात्रेयं श्रावणे मासि तत्परैः।<br>लक्ष्मीकुण्डस्य संस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३४लक्ष्मीकुण्डमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर विद्याधरोंने श्रावण महीनेमें इस यात्राको किया था॥ ३४॥
पितृभिश्चाऽपि यात्रेयमाश्विने मासि तत्परैः।<br>कपिलाह्रदसंस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३५<br><br>ऋषिभिश्चापि यात्रेयं कार्तिके मासि तत्परैः।<br>मार्कण्डेयह्रदस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३६कपिलाह्रदमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर पितरोंने आश्विनमासमें इस यात्राको किया था। मार्कण्डेयह्रदमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर ऋषियोंने कार्तिकमासमें यह यात्रा की थी॥ ३५-३६॥
विद्याधरैश्च यात्रेयं मासि मार्गशिरे कृता।<br>कपालमोचनस्थैश्च स्नानपूजनतत्परैः॥ ३७<br><br>गुह्यकैश्चैव यात्रेयं पुष्यमासे तु तत्परैः।<br>पिशाचैश्चैव यात्रेयं माघमासे च तत्परैः॥ ३८कपालमोचनमें स्थित होकर स्नान-पूजनमें तत्पर विद्याधरोंने मार्गशीर्षमासमें यह यात्रा की थी। गुह्यकोंने समाहित होकर पौषमासमें यह यात्रा की थी। पिशाचोंने समाहित होकर माघमासमें इस यात्राको किया था॥ ३७-३८॥