भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८२६श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
चतुर्दशायतनको सम्पन्न करना चाहिये॥ ११-१२१/२॥
एतत्क्रमेण कर्तव्यं महदायतनं शुभे।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि अष्टायतनमुत्तमम्॥ १३<br><br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि लाङ्गलीशं ततो व्रजेत्।<br>तं दृष्ट्वा तु ततो देवि आषाढीशं ततोऽर्चयेत्॥ १४अब मैं उत्तम अष्टायतनको बताऊँगा। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्यको लांगलीशके स्थानमें जाना चाहिये। हे देवि! उसका दर्शन करनेके बाद आषाढीशका अर्चन करना चाहिये॥ १३-१४॥
दृष्ट्वा चाषाढिनं देवि भारभूतं ततो व्रजेत्।<br>तं दृष्ट्वा तु ततो देवं गच्छेद्वै त्रिपुरान्तकम्॥ १५हे देवि! आषाढीशका दर्शन करनेके बाद भारभूतेश्वरके पास जाना चाहिये। उसका दर्शन करके त्रिपुरान्तकदेवके पास जाना चाहिये॥ १५॥
तं दृष्ट्वापि ततो देवि नकुलीशं ततो व्रजेत्।<br>दक्षिणे नकुलीशस्य त्र्यम्बकं च ततो व्रजेत्॥ १६हे देवि! उसका दर्शन करके नकुलीशके पास जाना चाहिये। इसके बाद नकुलीशके दक्षिणमें स्थित त्र्यम्बकके पास जाना चाहिये॥ १६॥
अष्टायतनमेवं हि मया ते परिकीर्तितम्।<br>अष्टायतनमेतद्धि करिष्यन्ति हि ये नराः॥ १७<br><br>ते मृतापि बहिः क्षेत्रे रुद्रलोकस्य भाजनाः॥ १८[हे देवि!] इस प्रकार मैंने आपको अष्टायतनके विषयमें बता दिया। जो मनुष्य इस अष्टायतनका दर्शन-पूजन करेंगे, वे इस क्षेत्रके बाहर मरनेपर भी रुद्रलोकके भाजन होंगे॥ १७-१८॥
ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
पूर्वं चैव मया देवि पञ्चायतनमुत्तमम्।<br>रोचते मे सदा वासः पञ्चायतन उत्तमे॥ १९हे देवि! मैं पहले ही उत्तम पंचायतनका वर्णन कर चुका हूँ। उत्तम पंचायतनमें निवास करना मुझे अच्छा लगता है॥ १९॥
एषां दिगुत्तरा देवि वाराणस्यां सदा प्रिये।<br>मम चोत्तरतो नित्यमस्मिन् स्थाने विशेषतः॥ २०<br><br>एकान्तवासिनो विप्रा भस्मनिष्ठा दृढव्रताः।<br>तेषां तु चोत्तमं स्थानं तद्वदन्ति च केचन॥ २१हे देवि! हे प्रिये! वाराणसीमें इनके उत्तर दिशामें और मेरे उत्तरमें इस स्थानपर भस्म धारण करके दृढव्रतमें स्थित होकर विप्रलोग सदा एकान्तवास करते हैं। कुछ लोग उसे उनका उत्तम स्थान बताते हैं॥ २०-२१॥
दिव्या हि सा परा मूर्तिरोङ्कारे ह स्थितः सदा।<br>उत्पत्तिस्थितिकालेऽहं तस्मिन्नायतने स्थितः॥ २२वह मूर्ति दिव्य तथा श्रेष्ठ है, मैं सदा उस ओंकारेश्वरमें स्थित हूँ। उत्पत्ति तथा स्थितिके समय मैं उस आयतनमें स्थित रहता हूँ॥ २२॥
एवं च यो विजानाति न स पापेन लिप्यते।<br>सत्यं सत्यं पुनः सत्यं त्रिः सत्यं नान्यथशुभे॥ २३जो इस बातको जानता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता है। हे शुभे! यह सत्य है, सत्य है, सत्य है—तीन बार सत्य है, यह अन्यथा नहीं है॥ २३॥
शीघ्रं तत्र च संयातु यदीच्छेन्मामकं पदम्।<br>एवं ते कथितं देवि पुनर्विस्तरतो मया॥ २४यदि कोई मेरे लोककी इच्छा करता हो, तो शीघ्र ही वहाँ जाय। हे देवि! इस प्रकार मैंने विस्तारपूर्वक फिरसे आपको यह बता दिया॥ २४॥
ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
अविमुक्तं च स्वर्लीनं तथा मध्यमकं शुभम्।<br>एतत् त्रिकण्टकं नाम मृत्युकालेऽमृतप्रदम्॥ २५अविमुक्तेश्वर, स्वर्लीनेश्वर तथा शुभ मध्य्मेश्वर—ये त्रिकण्टक नामवाले हैं तथा