श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 827, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 827
अध्याय १५ ] चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन [ ८२५
पन्द्रहवाँ अध्याय
चतुर्दशायतन, अष्टायतन तथा पंचायतनयात्राका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ईश्वर उवाच<br>अन्यच्चैव प्रवक्ष्यामि महाभाग्यं वरानने।<br>चतुर्दशायतनं कृत्वा अष्टायतनमेव च॥ १<br>पञ्चायतनमेवं तु ललिता च विनायकः।<br>नवदुर्गास्तथा प्रोक्ता एतत् कृत्यं वरानने॥ २<br>रहस्यमेतत् कथितं न देयं यस्य कस्यचित्। | **ईश्वर बोले—**हे वरानने! अब मैं अन्य महाभाग्यप्रद लिङ्गोंका वर्णन करूँगा। चतुर्दशायतन, अष्टायतन, पंचायतन, ललिता, विनायक तथा जो नौ दुर्गा हैं—इन सबको मैं बता चुका हूँ। हे वरानने! इस यात्राको करना चाहिये और इस बताये गये रहस्यको जिस-किसीसे प्रकाशित नहीं करना चाहिये॥ १-२ १/२॥ |
| शैलेशं प्रथमं दृष्ट्वा स्नात्वा वै वरणां नदीम्॥ ३<br>स्नानं तु सङ्गमे कृत्वा दृष्ट्वा वै सङ्गेश्वरम्।<br>स्वर्लीने तु कृतस्नानो दृष्ट्वा स्वर्लीनमीश्वरम्॥ ४<br>मन्दाकिन्यां नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै मध्यमेश्वरम्।<br>हिरण्यगर्भे स्नातस्तु दृष्ट्वा चैव तु ईश्वरम्॥ ५<br>मणिकर्ण्यां नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चेशानमीश्वरम्।<br>तस्मिन् कूप उपस्पृश्य दृष्ट्वा गोप्रेक्षमीश्वरम्॥ ६<br>कपिलायां ह्रदे स्नात्वा दृष्ट्वा वै वृषभध्वजम्।<br>उपशान्तस्य देवस्य दक्षिणे कूपमुत्तमम्॥ ७<br>तस्मिन् कूपे उपस्पृश्य दृष्ट्वोपशान्तमीश्वरम्।<br>पञ्चचूडाह्रदे स्नात्वा ज्येष्ठस्थानं ततोऽर्चयेत्॥ ८ | सर्वप्रथम शैलेशका दर्शन करके तथा वरणानदीमें स्नान करके पुनः संगममें स्नानकर तथा संगमेश्वरका दर्शन करके, इसके बाद स्वर्लीनमें स्नान करके तथा स्वर्लीनेश्वरका दर्शन करके पुनः मन्दाकिनीमें स्नान करके तथा मध्यमेश्वरका दर्शन करके पुनः हिरण्यगर्भमें स्नान करके तथा ईश्वरका दर्शन करके इसके बाद मणिकर्णीमें स्नान करके तथा भगवान् ईशानका दर्शन करके पुनः [वहाँपर] उस कूपमें स्नान करके तथा गोप्रेक्षेश्वरका दर्शन करके, पुनः कपिलाह्रदमें स्नान करके तथा वृषभध्वजका दर्शन करके उपशान्तदेवके दक्षिणमें स्थित जो उत्तम कूप है, उस कूपमें स्नान करके तथा उपशान्तेश्वरका दर्शन करनेके अनन्तर पंचचूडाह्रदमें स्नान करके मनुष्यको ज्येष्ठस्थानका अर्चन करना चाहिये॥ ३-८॥ |
| चतुःसमुद्रकूपे तु स्नात्वा देवं ततोऽर्चयेत्।<br>देवस्याग्रे तु कूपस्य तत्रोपस्पर्शनं कृते॥ ९<br>ततोऽर्चयेत देवेशं शुद्धेश्वरमतः परम्।<br>दण्डखाते नरः स्नात्वा व्यादेशं तु ततोऽर्चयेत्॥ १० | इसके बाद चतुःसमुद्रकूपमें स्नान करके देव (लिङ्ग)-का दर्शन-पूजन करना चाहिये। देवके आगे स्थित कूपके जलसे स्नान करनेके बाद देवेश शुद्धेश्वरका अर्चन करना चाहिये। इसके पश्चात् दण्डखातमें स्नान करके मनुष्यको व्यादेशका पूजन करना चाहिये॥ ९-१०॥ |
| शौनकेश्वरकुण्डे तु स्नानं कृत्वा ततोऽर्चयेत्।<br>जम्बुकेश्वरनामानं दृष्ट्वा चैव यशस्विनि॥ ११<br>दृष्ट्वा न जायते मर्त्यः संसारे दुःखसागरे।<br>प्रतिपत्प्रभृति देवेशि यावत् कृष्णचतुर्दशीम्॥ १२ | पुनः शौनकेश्वरकुण्डमें स्नान करके उस लिङ्गका अर्चन करना चाहिये। हे यशस्विनि! जम्बुकेश्वर नामक लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य दुःखसागररूपी संसारमें पुनः जन्म नहीं लेता है। हे देवेशि! हे शुभे! प्रतिपदासे आरम्भ करके कृष्णचतुर्दशीतक क्रमसे इस महान् |