श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ११ ] कलशेश्वरके समीपस्थ लिङ्गोंके माहात्म्यका वर्णन ८१५
| लिङ्गनिर्माल्यधारी च यतिस्त्वायतने वसेत्।<br>जपगीतहुडुङ्कारस्तुतिकृत्यपरः सदा॥ ५१<br>भावनाद्देवदेवस्य दक्षिणां मूर्त्तिमास्थितः।<br>अकस्मात्तत्र मूत्रं तु पुरीषं वा न संक्षिपेत्॥ ५२ | भस्मधारण किये रहे, अन्तर्याग करनेवाला तथा लिङ्गनिर्माल्यधारी यतिको अपने निवासस्थानमें रहना चाहिये। शिवकी भावना करके उन देवाधिदेवकी दक्षिणामूर्त्तिमें आस्था रखकर जप, गीत, हुडुङ्कार, स्तुति आदि कृत्योंमें सदा संलग्न रहना चाहिये। सहसा मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये॥ ५०–५२॥ |
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| स्त्रीशूद्रौ नाभिभाषेत शूद्रान्नं वर्जयेत् सदा।<br>शूद्रान्नरसपुष्टस्य निष्कृतिस्तस्य कीदृशी॥ ५३ | स्त्री तथा शूद्रसे भाषण नहीं करना चाहिये और शूद्रके अन्नका सदा त्याग करना चाहिये। शूद्रके अन्न तथा रससे पुष्ट व्यक्तिकी निष्कृति कैसे हो सकती है?॥ ५३॥ |
| अमृतं ब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियान्नं पयः स्मृतम्।<br>वैश्यान्नमन्नमित्याहुः शूद्रान्नं रुधिरं स्मृतम्॥ ५४ | ब्राह्मणका अन्न अमृत तथा क्षत्रियका अन्न दुग्ध कहा गया है। वैश्यके अन्नको अन्न कहा गया है और शूद्रके अन्नको रुधिर कहा गया है॥ ५४॥ |
| तस्माद्वर्जैत तद्देवि यदीच्छेन्मामकं पदम्।<br>श्मशानवासी धर्मात्मा यथालब्धेन वर्तते॥ ५५ | अतः हे देवि! यदि कोई मेरे लोककी इच्छा करता हो, तो उसे शूद्रके अन्नका त्याग कर देना चाहिये और श्मशानवासी तथा धर्मात्मा होकर यथोपलब्ध अन्नसे निर्वाह करना चाहिये॥ ५५॥ |
| लभेत रुद्रसायुज्यं सदा रुद्रमनुस्मरन्।<br>षण्मासाल्लभते ज्ञानमस्मिन् क्षेत्रे विशेषतः॥ ५६ | सर्वदा रुद्रका स्मरण करनेवाला रुद्रका सायुज्य प्राप्त करता है और विशेष रूपसे इस क्षेत्रमें छः महीनेमें ही ज्ञान प्राप्त करता है॥ ५६॥ |
| नित्यं पूजयते देवं ध्रुवं मोक्षं न संशयः।<br>रागद्वेषविनिर्मुक्ताः सिद्धायतनपूजकाः॥ ५७ | जो शिवजीकी नित्य पूजा करता है, वह निश्चित रूपसे मोक्ष प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है। सिद्धलिङ्गोंकी पूजा करनेवाले राग-द्वेषसे मुक्त होते हैं॥ ५७॥ |
| तेषां मोक्षो मयाख्यातस्तत्र यैर्मानुषैः कृताः।<br>द्वाविंशे परिवर्ते तु वाराणस्यां महाब्रते॥ ५८<br>नाम्ना तु नकुलीशेति तस्मिन् स्थाने स्थितो ह्यहम्।<br>द्रक्ष्यन्ति मां कलौ तस्मिन्नवतीर्णं दिवौकसः॥ ५९ | जो मनुष्य वहाँ सिद्ध आयतनोंकी पूजामें संलग्न रहते हैं, मेरे द्वारा उनका मोक्ष बताया गया है। हे महाव्रते! मैं बाईसवें चतुर्युगीमें वाराणसीमें नकुलीश नामसे उस स्थानमें स्थित रहूँगा। देवतालोग कलियुगमें उस लिङ्गमें आविर्भूत मेरा दर्शन करेंगे॥ ५८-५९॥ |
| अत्र स्थानेऽपि देवेशि मम पुत्रा दिवौकसः।<br>वक्रानिर्मधुपिङ्गश्च श्वेतकेतुस्तथापरः॥ ६०<br>अस्मिन् माहेश्वरं योगं प्राप्य योगगतिं पराम्।<br>नकुलीशाख्यदेवस्य लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ६१<br>चतुर्भिः पुरुषैर्युक्तं तल्लिङ्गं तच्च संस्थितम्।<br>तद् दृष्ट्वा मानवो देवि रुद्रस्यैव सलोकताम्॥ ६२<br>नकुलीशेश्वरं देवं कपिलेश्वरमेव च।<br>पञ्चायतनमेतत्तु यत्तु पूर्वमुदाहृतम्॥ ६३ | हे देवेशि! इस स्थानपर भी स्वर्गमें निवास करनेवाले वक्रानि, मधुपिंग, श्वेतकेतु नामवाले मेरे पुत्र इस लिङ्गमें माहेश्वरयोग प्राप्त करके श्रेष्ठ योगगतिको प्राप्त हुए। नकुलीश नामक देवका लिङ्ग पूर्वाभिमुख स्थित है। वह लिङ्ग चार पुरुषोंसे युक्त होकर स्थित है। हे देवि! उसका तथा नकुलीशेश्वर और कपिलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य रुद्रका सालोक्य प्राप्त करता है। यही पंचायतन है, जिसे |