श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| रहस्यं परमं वेदं मम व्रतनिषेवणम्।<br>तेषां न कथनीयोऽहं ये मद्भक्तिविवर्जिताः ॥ ६४ | पहले ही कह दिया गया है॥ ६०-६३॥<br>मेरा यह व्रत-सेवन परम रहस्यमय है, जो मेरी भक्तिसे रहित हैं, उनसे मेरे विषयमें नहीं बताना चाहिये॥ ६४॥ | | शक्रः पाशुपते चोक्तं पदे सम्यङ्निषेवितम्।<br>तत् पदं विन्दते देवि दृष्टैरेव न संशयः ॥ ६५ | पाशुपतपदमें सम्यक् व्रतनिषेवण कहा गया है। हे देवि! इन्द्रने इन लिङ्गोंके दर्शनसे उस पदको प्राप्त किया था, इसमें सन्देह नहीं है। इन लिङ्गोंके दर्शनसे मनुष्य सदा शिवमें प्रीति रखनेवाला हो जाता है॥ ६५ १/२॥ | | प्रीतिमान् सततं देवि एभिर्दृष्टैश्च जायते।<br>अविमुक्तं महाक्षेत्रं सिद्धसङ्घनिषेवितम् ॥ ६६<br><br>अत्र पूजयते देवि ध्रुवं मोक्षो न संशयः।<br>सिद्धिकामास्तथा सिद्धिं यास्यन्ति द्विजसत्तमाः ॥ ६७ | अविमुक्त महाक्षेत्र है तथा सिद्धगणोंके द्वारा सेवित है, हे देवि! जो यहाँ [शिवका] पूजन करता है, उसका निश्चित रूपसे मोक्ष हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। सिद्धिकी इच्छावाले द्विजश्रेष्ठ यहाँ सिद्धि प्राप्त करेंगे॥ ६६-६७॥ | | इह दत्तं सदाक्षय्यं भविष्यति महात्मनाम्।<br>द्विजानां धर्मनित्यानां मम व्रतनिषेविणाम् ॥ ६८<br><br>एकाहमुपवासं यः करिष्यति यशस्विनि।<br>फलं वर्षशतस्येह लभते मत्परायणः ॥ ६९ | मेरा व्रत करनेवाले धर्मनिष्ठ महात्माओं तथा द्विजोंको यहाँ दिया हुआ दान सदा अक्षय होगा। हे यशस्विनि! जो व्यक्ति मेरे प्रति परायण होकर यहाँ एक दिन उपवास करता है, वह सौ वर्षके उपवासका फल प्राप्त करता है॥ ६८-६९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्यायतनवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११॥
बारहवाँ अध्याय
अविमुक्त तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य-वर्णन
| ईश्वर उवाच | |
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| अन्यदायतनं वक्ष्ये वाराणस्यां सुरेश्वरि।<br>यत्र वै देवदेवस्य रुचिरं स्थानमीप्सितम् ॥ १ | **ईश्वर बोले—**हे सुरेश्वरि! अब मैं वाराणसीमें स्थित अन्य आयतनका वर्णन करूँगा, जो देवदेवका रुचिर अभीष्ट स्थान है॥ १॥ |
| नीयमानं पुरा देवि तल्लिङ्गं शशिमौलिनः।<br>राक्षसैरन्तरिक्षस्थैर्व्रजमानं सुसत्वरम् ॥ २ | हे देवि! पूर्वकालमें अन्तरिक्षमें स्थित राक्षसोंके द्वारा चन्द्रशेखर शिवका वह लिङ्ग शीघ्रतापूर्वक लाया गया॥ २॥ |
| अस्मिन् देशे यदायातास्तदा देवेन चिन्तितम्।<br>अविमुक्ते न मोक्षस्तु कथं मे सम्भविष्यति ॥ ३ | जब वे राक्षस इस स्थानमें आये, तब शिवजीने सोचा कि अब मेरे अविमुक्तमें मोक्ष सम्भव नहीं है, तो फिर यह कैसे होगा? जब वे देवेश प्रभु इस बातको |
| इममर्थं तु देवेशो यावच्चिन्तयते प्रभुः।<br>तावत् कुक्कुटशब्दस्तु तस्मिन् देशे समुत्थितः ॥ ४ | सोच रहे थे, उसी समय उस स्थानमें कुक्कुटका शब्द |