भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १२ ]अविमुक्त तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य-वर्णन८१७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
होने लगा॥ ३-४॥
शब्दं श्रुत्वा तु तं देवि राक्षसास्त्रस्तचेतसः।<br>लिङ्गमुत्सृज्य भीतास्ते प्रभातसमये गताः॥ ५हे देवि! उस शब्दको सुनकर सन्तप्त मनवाले वे राक्षस डरकर लिङ्गको छोड़कर प्रभात वेलामें चले गये॥ ५॥
गतैस्तु राक्षसैर्देवि लिङ्गं तत्रैव संस्थितम्।<br>स्थाने तु रुचिरे शुभ्रे देवदेवः स्वयं प्रभुः॥ ६<br><br>अविमुक्तस्तत्र मध्ये अविमुक्तं ततः स्मृतम्॥ ७हे देवि! राक्षसोंके चले जानेपर वह लिङ्ग वहींपर स्थित हो गया। उस सुन्दर तथा शुभ्र स्थानमें स्वयं देवदेव प्रभु विराजमान हो गये। उसके मध्यमें वे अविमुक्तरूपमें स्थित हुए, इसलिये उसे अविमुक्त कहा गया है॥ ६-७॥
तदाविमुक्ते तु सुरैर्हरस्य<br>नाम स्मृतं पुण्यतमाक्षराढ्यम्।<br>मोक्षप्रदं स्थावरजङ्गमानां<br>ये प्राणिनः पञ्चतां यत्र याताः॥ ८अविमुक्तमें देवताओंके द्वारा शिवका नाम पुण्यतम अक्षरोंसे युक्त कहा गया है, स्थावर-जंगमोंमें जो प्राणी वहाँ पंचत्वको प्राप्त होते हैं, उनके लिये यह मोक्षप्रद है॥ ८॥
कुक्कुटाश्चापि देवेशि तस्मिन् स्थाने स्थिताः सदा।<br>अद्यापि तत्र दृश्यन्ते पूज्यमानाः शुभार्थिभिः॥ ९हे देवेशि! उस स्थानमें कुक्कुट सदा रहते हैं, [अपने] कल्याणकी कामना करनेवाले लोगोंके द्वारा पूजित होते हुए वे [कुक्कुट] आज भी वहाँ देखे जाते हैं॥ ९॥
अविमुक्तं सदा लिङ्गं योऽत्र द्रक्ष्यति मानवः।<br>न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥ १०जो मनुष्य यहाँ अविमुक्तलिङ्गका सदा दर्शन करेगा, उसका पुनर्जन्म सौ करोड़ कल्पोंमें भी नहीं होगा॥ १०॥
देवस्य दक्षिणे भागे वापी तिष्ठति शोभना।<br>तस्यास्तथोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥ ११उस लिङ्गके दक्षिणभागमें एक सुन्दर [ज्ञान-] वापी है, उसका जल पीनेसे पुनर्जन्म नहीं होता है॥ ११॥
पीतमात्रेण तेनैव उदकेन यशस्विनि।<br>त्रीणि लिङ्गानि वर्धन्ते हृदये पुरुषस्य तु॥ १२हे यशस्विनि! उस जलके पानमात्रसे ही पुरुषके हृदयमें तीन लिङ्ग उत्पन्न होते हैं॥ १२॥
एतद्गुह्यं महादेवि न देयं यस्य कस्यचित्।<br>दण्डपाणिस्तु तत्रस्थो रक्षते तज्जलं सदा॥ १३<br><br>पश्चिमं तीरमासाद्य देवदेवस्य शासनात्।<br>पूर्वेण तारको देवो जलं रक्षति सर्वदा॥ १४<br><br>नन्दीशश्चोत्तरेणैव महाकालस्तु दक्षिणे।<br>रक्षते तज्जलं नित्यं मद्भक्तानां तु मोहनम्॥ १५हे महादेवि! इस रहस्यको जिस-किसीको भी नहीं बताना चाहिये। देवदेवकी आज्ञासे पश्चिम तटपर आकर वहाँ विद्यमान दण्डपाणि उस जलकी सदा रक्षा करते हैं। पूर्वमें तारकदेव सदा जलकी रक्षा करते हैं। उत्तरमें नन्दीश तथा दक्षिणमें महाकाल मेरे भक्तोंके लिये प्रिय उस जलकी नित्य रक्षा करते हैं॥ १३-१५॥
विष्णुरुवाच<br>ममापि सा परा देवि तनुरापोमयी शुभा।<br>अप्राप्या दुर्लभा देवि मानवैरकृतात्मभिः॥ १६**विष्णु बोले—**हे देवि! वह श्रेष्ठ तथा शुभ जलमयी मूर्ति मेरी ही है। हे देवि! वह दुर्लभ मूर्ति