श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १३] भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत आदिद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन | ८२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पर्जन्येश्वरनामानं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्।<br>पर्जन्येश्वरपूर्वेण नाम्ना तु नहुषेश्वरम्॥ २०<br><br>नहुषेश्वरपूर्वेण देवदेवी च तिष्ठति।<br>विशालाक्षीति विख्याता भक्तानां तु फलप्रदा॥ २१ | पर्जन्येश्वर नामक लिङ्ग भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है। पर्जन्येश्वरके पूर्वमें नहुषेश्वर नामक लिङ्ग है। नहुषेश्वरके पूर्वमें देव-देवी स्थित हैं, विशालाक्षी नामसे विख्यात वे [सभी] भक्तोंको फल प्रदान करनेवाली हैं॥ २०-२१॥ |
| तस्यैव दक्षिणे भागे जरासन्धेश्वरं स्थितम्।<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं दृष्ट्वा देवि फलप्रदम्॥ २२ | उसीके दक्षिणभागमें जरासन्धेश्वर नामक चतुर्मुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! उस लिङ्गका दर्शन करनेसे वह [समस्त] फल प्रदान करता है॥ २२॥ |
| तस्यैव दक्षिणे देवि भोगदा सर्वदेहिनाम्।<br>भोगा ललितका देवि सर्वसिद्धिप्रदायिका॥ २३ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें सभी प्राणियोंको सुख प्रदान करनेवाली भोगा ललितका स्थित हैं, हे देवि! वे सभी सिद्धियाँ देनेवाली हैं॥ २३॥ |
| जरासन्धेश्वरस्याग्रे लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>हिरण्याक्षेश्वरं नाम हिरण्यफलदायकम्॥ २४ | जरासन्धेश्वरके आगे सुवर्णका फल प्रदान करनेवाला हिरण्याक्षेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ २४॥ |
| तस्यैव दक्षिणे लिङ्गं ययातीश्वरनामतः।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं सर्वकामफलप्रदम्॥ २५ | उसीके दक्षिणमें ययातीश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग विद्यमान है, वह लिङ्ग सभी कामनाओंका फल देनेवाला है॥ २५॥ |
| तस्यैव पश्चिमे भागे ब्रह्मोशस्य समीपतः।<br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं दृष्ट्वा वेदफलं लभेत्॥ २६ | उसीके पश्चिमभागमें ब्रह्मोशके समीप पश्चिमकी ओर मुखवाला एक लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य वेदोंका फल प्राप्त करता है॥ २६॥ |
| अगस्त्यस्य समीपे तु मुखलिङ्गं तु तिष्ठति।<br>विश्वावसुस्तु गन्धर्वो लिङ्गं स्थापितवान् पुरा॥ २७ | अगस्त्यके समीपमें एक मुखलिङ्ग स्थित है, पूर्वकालमें गन्धर्व विश्वावसुने उस लिङ्गको स्थापित किया था॥ २७॥ |
| अगस्त्येश्वरपूर्वेण मुण्डेशो नाम नामतः।<br>पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं वीरसिद्धिप्रदं नृणाम्॥ २८ | अगस्त्येश्वरके पूर्वमें मुण्डेश नामसे प्रसिद्ध पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग विद्यमान है, वह लिङ्ग मनुष्योंको वीरसिद्धि प्रदान करनेवाला है॥ २८॥ |
| तस्यैव दक्षिणे देवि विधिस्तिष्ठति पार्वति।<br>विधिना स्थापितं लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ २९ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें विधि [लिङ्ग] स्थित है, हे पार्वति! विधि (ब्रह्मा)-के द्वारा स्थापित वह लिङ्ग पश्चिमाभिमुख स्थित है॥ २९॥ |
| विधीश्वराद्दक्षिणेन तीर्थं सर्वत्र विश्रुतम्।<br>दशाश्वमेधिकं नाम लिङ्गं तत्र स्वयं स्थितम्॥ ३०<br><br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि अश्वमेधफलं लभेत्। | विधीश्वरके दक्षिणमें सर्वत्र प्रसिद्ध एक तीर्थ है, वहाँपर दशाश्वमेधिक नामक लिङ्ग स्वयं स्थित है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य अश्वमेधका फल प्राप्त करता है॥ ३० १/२॥ |
| दशाश्वमेधाच्चोत्तरतो मातरस्तत्र संस्थिताः॥ ३१<br><br>तासां मुखे तु तत्कुण्डं तिष्ठते वरवर्णिनि।<br>तत्र स्नानं नरः कुर्यान्नारी वा पुरुषोऽपि वा॥ ३२ | दशाश्वमेधके उत्तरमें वहाँपर मातृकाएँ स्थित हैं, हे वरवर्णिनि! उनके मुखमें एक कुण्ड स्थित है। वहाँ जो |