श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १३ ] भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत आदिद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन । ८९९
| तस्यैव चाग्रतो भद्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>कचेन स्थापितं भद्रे देवाचार्यस्य सूनुना॥ ३० | हे भद्रे! उसीके आगे पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे भद्रे! देवताओंके आचार्य बृहस्पति के पुत्र कचके द्वारा वह स्थापित किया गया है॥ ३०॥ |
| तस्यैव च समीपे तु कूपस्तिष्ठति सुव्रते।<br>तस्योपस्पर्शनाद्देवि सर्वमेधफलं लभेत्॥ ३१ | हे सुव्रते! उसीके समीपमें एक कूप स्थित है, हे देवि! उसमें स्नान करनेसे मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ ३१॥ |
| तस्यैव पश्चिमे भागे देवो देवी च तिष्ठतः।<br>भक्तिदौ तौ तु सर्वेषां येऽपि दुष्कृतिनो नराः॥ ३२ | उसीके पश्चिमभागमें देव (शिव) तथा देवी (पार्वती) स्थित हैं। जो बुरा कर्म करनेवाले मनुष्य हैं, उन सबको भी वे भक्ति देनेवाले हैं॥ ३२॥ |
| शुक्रेश्वरस्य पूर्वेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>अनर्केश्वरनामानं मोक्षदं सर्वदेहिनाम्॥ ३३ | शुक्रेश्वरके पूर्वमें सभी प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला अनर्केश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। |
| तस्यैव पूर्वतो भागे गणैस्तु परिवारितम्।<br>गणेश्वरमिति ख्यातं सर्वहर्षप्रदायकम्॥ ३४ | उसीके पूर्वभागमें गणोंसे घिरा हुआ गणेश्वर नामसे प्रसिद्ध लिङ्ग विद्यमान है, वह सभीको हर्ष प्रदान करनेवाला है॥ ३३-३४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुह्यायतनावर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुह्यायतनावर्णनं' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२॥
तेरहवाँ अध्याय
भगवान् श्रीराम, दत्तात्रेय, हरिकेश, प्रियव्रत तथा ब्रह्माजीद्वारा स्थापित लिङ्गोंका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| अन्यदायतनं वक्ष्ये वाराणस्यां सुरेश्वरि।<br>रामेण स्थापितं लिङ्गं लङ्कायाश्चागतेन हि॥ १ | अब मैं वाराणसीमें स्थित अन्य लिङ्गोंका वर्णन करूँगा। लंकासे लौटकर श्रीरामचन्द्रजीने एक लिङ्ग स्थापित किया है॥ १॥ |
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>त्रिपुरान्तकरं नाम सर्वपापप्रणाशनम्॥ २ | उसके दक्षिणभागमें सभी पापोंका नाश करनेवाला त्रिपुरान्तकर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ २॥ |
| तस्यैव दक्षिणे लिङ्गं दत्तात्रेयप्रतिष्ठितम्।<br>ज्ञानं चोत्पद्यते देवि तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ ३ | उसीके दक्षिणमें [महर्षि] दत्तात्रेयद्वारा स्थापित लिङ्ग है, हे देवि! उस लिङ्गके दर्शनसे ज्ञान उत्पन्न होता है॥ ३॥ |
| तस्य पश्चिमदिग्भागे हरिकेशेश्वरं शुभम्।<br>तत्रैवाराधितो देवि हरिकेशेन सुव्रते॥ ४ | उसके पश्चिम दिशाभागमें हरिकेशेश्वर नामक शुभ लिङ्ग है। हे देवि! हे सुव्रते! हरिकेशने वहाँपर मेरी आराधना की थी। |
| हरिकेशेश्वरं देवं सर्वकिल्विषनाशनम्।<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे गोकर्णं नाम विश्रुतम्॥ ५ | हरिकेशेश्वरलिङ्ग सभी पापोंका नाश करनेवाला है। उसके पश्चिम-दिशाभागमें गोकर्ण नामक प्रसिद्ध तीर्थ विद्यमान है॥ ४-५॥ |
| तत्र स्नातो वरारोहे राजते देवि चन्द्रवत्।<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं काशिपुर्यां च सुव्रते॥ ६ | हे वरारोहे! हे देवि! वहाँ स्नान किया हुआ मनुष्य चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होता है। हे सुव्रते! काशीपुरीमें |