श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 811, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 811
अध्याय १० ] गभस्तीश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य एवं कलशेश्वरलिङ्गकी उत्पत्ति-कथा ८०९
| पश्चिमे तस्य दिग्भागे कलशेश्वरसंज्ञितम्।<br>कलशादुत्थितं लिङ्गं कालस्य भयदायकम्॥ ५३ | उसके पश्चिम दिशाभागमें कलशसे उत्पन्न कलशेश्वर नामक लिङ्ग है, वह कालको भी भय प्रदान करनेवाला है॥ ५३॥ |
|---|---|
| <div align="center">सूर्य उवाच</div>कथं कालस्य भयदं कलशादुत्थितः कथम्।<br>एतद्देव समाचक्ष्व यदनुग्रहवान् मयि॥ ५४ | **सूर्य बोले—**वह [कलशेश्वरलिङ्ग] कालके लिये कैसे भयदायक है और कलशसे किस प्रकार प्रकट हुआ, हे देव! यदि आप मेरे प्रति कृपालु हैं, तो इसे बतायें॥ ५४॥ |
| <div align="center">विष्णुरुवाच</div>तस्यैव देवदेवस्य प्रभावं शृणु भास्कर।<br>श्वेतो नाम महातेजा ऋषिः परमधार्मिकः॥ ५५<br><br>पूजयामास सततं लिङ्गं त्रिपुरघातिनः।<br>तस्य पूजाप्रसक्तस्य कदाचित्कालपर्यये॥ ५६<br><br>आजगाम तमुद्देशं कालः परमदारुणः।<br>रक्तान्तनयनो घोरः सर्पयष्टिकरो महान्॥ ५७<br><br>दंष्ट्राकरालो विकृतो भिन्नाञ्जनसमप्रभः।<br>रक्तवासा महाकायः सर्वाभरणभूषितः॥ ५८ | **विष्णु बोले—**हे भास्कर! उस देवदेवके प्रभावको सुनो। श्वेत नामक महातेजस्वी तथा परम धार्मिक ऋषिने त्रिपुरका विनाश करनेवाले शिवजीके लिङ्गकी निरन्तर पूजा की। किसी समय पूजामें संलग्न उन मुनिके पास महाभयानक काल आया। वह पूर्ण रक्तनेत्रोंवाला, महाभयंकर, हाथमें सर्प-यष्टि धारण किये हुए, विकराल दाढ़ोंवाला, विकृत, अंजनके समान प्रभाव़ाला, रक्त वस्त्र धारण किये हुए, विशाल देहवाला तथा सभी आभरणोंसे विभूषित था॥ ५५-५८॥ |
| पाशहस्तस्तदाभ्येत्य श्वेते पाशमवासृजत्।<br>कण्ठार्पितेन पाशेन श्वेतः कालमथाब्रवीत्॥ ५९<br><br>क्षणमात्रं प्रतीक्षस्व मम त्रिभुवनान्तक।<br>निवर्तयाम्यहं यावत् पूजनं मन्मथद्विषः॥ ६० | हाथमें पाश धारण किये हुए उस कालने आ करके श्वेतके ऊपर पाश फेंका। तब कण्ठमें लिपटे हुए उस पाशसे बद्ध श्वेतने कालसे कहा—हे त्रिभुवनविनाशक! तुम क्षणभर मेरी प्रतीक्षा करो, जबतक मैं कामदेवके शत्रु शिवकी पूजा सम्पन्न न कर लूँ॥ ५९-६०॥ |
| तमब्रवीत्तदा कालः प्रहसन् वै सुरेश्वर।<br>न श्रुतं तत्त्वया मन्ये वृद्धानां ज्ञातजन्मनाम्॥ ६१<br><br>श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्लिकम्।<br>न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वा कृतम्॥ ६२ | हे सुरेश्वर! तब कालने हँसते हुए उनसे कहा—मैं समझता हूँ कि तुमने ज्ञातजन्मा वृद्धोंका यह कथन नहीं सुना है कि कलका कार्य आज ही और अपराह्नका कार्य पूर्वाह्नमें कर लेना चाहिये। मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती है, चाहे उसका कार्य पूर्ण हो गया हो अथवा न हुआ हो॥ ६१-६२॥ |
| गर्भे वाप्यथवा बाल्ये वार्द्धके यौवने तथा।<br>आयुष्ये कर्मणि क्षीणे लोकोऽयं लीयते मया॥ ६३ | प्राणी गर्भमें हो अथवा बाल्यावस्थामें, यौवनावस्था अथवा वृद्धावस्थामें हो—उसके आयु तथा कर्मके क्षीण होनेपर मैं उसका लय कर देता हूँ॥ ६३॥ |
| नौषधानि न मन्त्राश्च न होमा न पुनर्जपः।<br>त्रायन्ते मृत्युनोपेतं जरया वापि मानवाः॥ ६४ | मृत्यु तथा जरासे ग्रसित मनुष्योंकी रक्षा न तो औषधि, न मन्त्र, न होम, न जप अथवा न तो मनुष्य ही कर सकते हैं॥ ६४॥ |