भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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८०८श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गया है॥ ३८-३९॥
रावणेश्वरपूर्वे तु लिङ्गं देवि चतुर्मुखम्।<br>तेन दृष्टेन देवेशि यातुधानैर्न हन्यते॥ ४०हे देवि! रावणेश्वरके पूर्वमें एक चतुर्मुख लिङ्ग है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य राक्षसोंके द्वारा नहीं मारा जा सकता है॥ ४०॥
रावणेशाद्दक्षिणतो लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>वराहेश्वरनामानं सर्वपातकनाशनम्॥ ४१<br><br>वराहाशाद्दक्षिणतो लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>तस्यैवाराधनाद्देवि षण्मासाद्योगमाप्नुयात्॥ ४२रावणेश्वरके दक्षिणमें सभी पापोंका नाश करनेवाला वराहेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। वराहेश्वरके दक्षिणमें पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे देवि! मनुष्य उसकी आराधनासे छः महीनेमें योग प्राप्त कर लेता है॥ ४१-४२॥
तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गं वै दक्षिणामुखम्।<br>गालवेश्वरनामानं गुरुभक्तिप्रदायकम्॥ ४३उसके दक्षिण दिशाभागमें गुरुभक्ति प्रदान करनेवाला गालवेश्वर नामक दक्षिणाभिमुख लिङ्ग विद्यमान है॥ ४३॥
गालवेश्वरदेवस्य लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>अयोगसिद्धिनामानं सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ ४४<br><br>तस्यैव दक्षिणे देवि नाम्ना वातेश्वरं शुभम्।<br>तस्यैव चाग्रतो देवि मुखलिङ्गं च तिष्ठति॥ ४५<br><br>सोमेश्वरेति विख्यातं लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>तं दृष्ट्वा देवदेवेशं सर्वव्याधिक्षयो भवेत्।<br>तस्यैव नैर्ऋते भागे लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ४६गालवेश्वरदेवके समीपमें सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला अयोगसिद्धि नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे देवि! उसीके दक्षिणमें वातेश्वर नामक शुभ लिङ्ग विद्यमान है। हे देवि! उसीके आगे मुखलिङ्ग स्थित है, वह लिङ्ग सोमेश्वर नामसे विख्यात है तथा पश्चिमाभिमुख स्थित है। उन देवदेवेशका दर्शन करनेसे सभी व्याधियोंका नाश हो जाता है॥ ४४-४५ १/२॥
अङ्गारेश्वरनामानं सर्वसिद्धैर्नमस्कृतम्।<br>पूर्वेण तस्य देवस्य लिङ्गमन्यच्च तिष्ठति॥ ४७उसीके नैर्ऋतभागमें सभी सिद्धोंसे नमस्कृत अंगारेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। उसके पूर्वमें शिवजीका कुक्कुटेश्वर नामक अन्य लिङ्ग स्थित है, वह गति तथा सुख प्रदान करनेवाला है॥ ४६-४७ १/२॥
कुक्कुटेश्वरनामानं गतिसौख्यप्रदायकम्।<br>तस्यैव चोत्तरे देवि पाण्डवैः सुमहात्मभिः॥ ४८<br><br>पञ्च लिङ्गानि पुण्यानि पश्चिमाभिमुखानि तु।<br>तेषामेते तु देवेशि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ४९<br><br>संवर्तेश्वरनामानं स्थापितं यन्महर्षिणा।<br>ममैवात्यन्तसान्निध्यं तस्मिँल्लिङ्गे सुरेश्वरि॥ ५०<br><br>तल्लिङ्गमर्चयेद्यो वै तस्य सिद्धिः करे स्थिता।हे देवि! उसीके उत्तरमें महात्मा पाण्डवोंके द्वारा पश्चिमाभिमुख पाँच पुण्यप्रद लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। हे देवेशि! उनके सामने संवर्तेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, जिसे महर्षि [संवर्त]-ने स्थापित किया है। हे सुरेश्वरि! उस लिङ्गमें मेरा अत्यन्त सान्निध्य रहता है। जो उस लिङ्गका अर्चन करता है, सिद्धि उसके हाथमें स्थित रहती है॥ ४८-५० १/२॥
संवर्तेशात् पश्चमतो लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ५१<br><br>श्वेतेश्वरं तु विख्यातं श्वेतेन स्थापितं पुरा।<br>तेन दृष्टेन लिङ्गेन गाणपत्यं लभेद ध्रुवम्॥ ५२संवर्तेश्वरके पश्चिममें एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। वह श्वेतेश्वर नामसे विख्यात है, उसे पूर्वकालमें श्वेत [मुनि]-ने स्थापित किया था। उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य निश्चित रूपसे गाणपत्य प्राप्त करता है॥ ५१-५२॥
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