भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १०] गभस्तीश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका माहात्म्य एवं कलशेश्वरलिङ्गकी उत्पत्ति-कथा ८०७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तेन दृष्टेन देवेशि न पुनर्जन्मभाग्भवेत्।<br>तस्यैव तु समीपे तु पश्चिमे वरवर्णिनि॥ ३१है। हे देवेशि! उस [लिङ्ग]-के दर्शनसे मनुष्य पुनर्जन्म नहीं प्राप्त करता है॥ २९-३०½॥<br><br>हे वरवर्णिनि! उसीके समीप पश्चिममें दूसरा लिङ्ग विद्यमान है, हे सुश्रोणि! वह [महर्षि] व्याघ्रपादके द्वारा स्थापित किया गया है, हे देवि! उसके दर्शनसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ३१-३२॥
अन्यल्लिङ्गं तु सुश्रोणि व्याघ्रपादप्रतिष्ठितम्।<br>तस्य सन्दर्शनाद्देवि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ३२
गभस्तीशाग्रतो देवि विश्वकर्मप्रतिष्ठितम्।<br>अन्यानि तत्र लिङ्गानि स्थापितानि महात्मभिः॥ ३३हे देवि! गभस्तीशके आगे विश्वकर्माके द्वारा स्थापित लिङ्ग विद्यमान है। वहाँपर महात्माओंके द्वारा अन्य लिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं॥ ३३॥
गभस्तीशस्य लिङ्गस्य नैर्ऋते वरवर्णिनि।<br>शशाङ्केश्वरनामानं लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ३४हे वरवर्णिनि! गभस्तीशके लिङ्गके नैर्ऋतभागमें शशाङ्केश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। गन्धर्व-नगर जाकर राजा चित्ररथने लिङ्ग स्थापित किया था, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य अभीष्ट फल प्राप्त करता है॥ ३४-३५॥
गन्धर्वनगरं गत्वा राज्ञा चित्ररथेन हि।<br>तेन दृष्टेन देवेशि ईप्सितं फलमाप्नुयात्॥ ३५
चित्रेश्वरात् पश्चिमतो लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>जैमिनिस्थापितं पूर्वं महापातकनाशनम्॥ ३६चित्रेश्वरके पश्चिममें महापातकोंका नाश करनेवाला एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, उसे पूर्वकालमें [महर्षि] जैमिनिने स्थापित किया था। जैमिनीशके आगे [ऋषि] सुमन्तुके द्वारा स्थापित लिङ्ग विद्यमान है। वहाँ अन्य ऋषियोंने भी बहुत-से लिङ्ग स्थापित किये हैं॥ ३६-३७॥
अग्रे तु जैमिनीशस्य कृतं लिङ्गं सुमन्तुना।<br>अन्यैश्च ऋषिभिस्तत्र लिङ्गानि सुबहूनि च॥ ३७
तेषां तु दक्षिणे भागे लिङ्गं पश्चान्मुखस्थितम्।<br>बुधेश्वरं तथा कोणे सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ ३८उनके दक्षिणभाग कोणमें सभी प्रकारका सुख प्रदान करनेवाला बुधेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। बुधेश्वरके वायव्यकोणमें समीपमें ही राक्षस
बुधेश्वरात्तु कोणेन वायव्ये नातिदूरतः।<br>रावणेश्वरनामानं स्थापितं राक्षसेन तु॥ ३९रावणके द्वारा रावणेश्वर नामक लिङ्ग स्थापित किया