श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ८ ] | कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन | ७९५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शम्भु, जयन्त तथा मदोत्कट स्थित हैं॥४५॥ | |
| सिंहव्याघ्रमुखाः केचिद्विकटाः कुब्जवामनाः।<br>यत्र नन्दी महाकालः चित्रघण्टो महेश्वरः॥४६<br>दृगिचण्डेश्वरश्चैव घण्टाकर्णो महाबलः।<br>एते चान्ये च बहवो गणा रुद्रेश्वरस्य वै॥४७<br>रक्षन्ति सततं सर्वे अविमुक्तं हि मे गृहम्। | यहाँ कुछ सिंह-व्याघ्रके समान मुखवाले, विकट, टेढ़े तथा बौने [गण] भी विद्यमान हैं। यहाँ नन्दी, महाकाल, चित्रघण्ट, महेश्वर, दृगिचण्डेश्वर, घण्टाकर्ण, महाबल—ये सब तथा रुद्रेश्वरके अन्य बहुत-से गण मेरे अविमुक्त गृहकी निरन्तर रक्षा करते हैं॥४६-४७½॥ |
| अयनं तूत्तरं ज्ञेयं दृगिचण्डेश्वरं मम॥४८<br>दक्षिणं शङ्कुकर्णं तु ओङ्कारं विषुवं मम।<br>दशकोट्यस्तु तीर्थानां संविशन्त्यथ पर्वणि॥४९ | दृगिचण्डेश्वरको मेरा उत्तर अयन, शंकुकर्णको दक्षिण अयन और ओंकारको मेरा विषुव जानना चाहिये। दस करोड़ तीर्थ पर्वके अवसरपर यहाँ प्रवेश करते हैं॥४८-४९॥ |
| रहस्यं विप्रमन्त्राणां गोपनीयं प्रयत्नतः।<br>यच्च पाशुपतं प्रोक्तं पदं सम्यङ्निषेवितम्॥५०<br>पूजनात्तदवाप्नोति षण्मासाभ्यन्तरेण तु।<br>ममैव प्रीतिरतुला तस्मिन्नायतने सदा॥५१ | विप्र-मन्त्रोंके रहस्यको प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये। भलीभाँति निषेवित जो पाशुपतपद कहा गया है, वह इसके पूजनसे छः महीनोंके भीतर ही प्राप्त हो जाता है। उस आयतनमें मेरी अतुलनीय प्रीति सर्वदा रहती है॥५०-५१॥ |
| अन्ये च बहवस्तत्र सिद्धलिङ्गाश्च सुव्रते।<br>सर्वेषामेव स्थानानां तत्स्थानं तु ममाधिकम्।<br>ज्ञात्वा कलियुगं घोरमप्रकाश्यं कृतं मया॥५२ | हे सुव्रते! वहाँपर अन्य बहुत-से सिद्ध लिङ्ग स्थित हैं। वह स्थान मेरे सभी स्थानोंसे बढ़कर है। कलियुगको भयानक जानकर मैंने इसे प्रकाशित नहीं किया॥५२॥ |
| न सा गतिः प्राप्यते यज्ञदानै-<br>स्तीर्थाभिषेकैर्न तपोभिरुग्रैः।<br>अन्यैश्च धर्मैर्विविधैः शुभैर्वा<br>या कृत्तिवासे तु जितेन्द्रियैश्च॥५३ | जो गति जितेन्द्रिय लोग कृत्तिवासमें प्राप्त करते हैं, वह गति यज्ञों, दानों, तीर्थों, अभिषेकों, घोर तपों तथा अन्य विविध शुभ धर्मोंके द्वारा भी लोग नहीं प्राप्त कर सकते हैं॥५३॥ |
| दर्शनाद्देवदेवस्य ब्रह्महापि प्रमुच्यते।<br>स्पर्शने पूजने चैव सर्वयज्ञफलं लभेत्॥५४ | देवदेवके दर्शनसे ब्राह्मणका वध करनेवाला भी [पापसे] मुक्त हो जाता है, [देवदेवका] स्पर्श तथा पूजन करनेसे व्यक्ति सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥५४॥ |
| श्रद्धया परया देवं येऽर्चयन्ति सनातनम्।<br>फाल्गुनस्य चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे समाहिताः॥५५<br>पुष्पैः फलैस्तथान्यैश्च भक्ष्यैरुच्चावचैस्तथा।<br>क्षीरेण मधुना चैव तोयेन सह सर्पिषा॥५६<br>तर्पयन्ति परं लिङ्गमर्चयन्ति देवं शुभम्।<br>हुडुङ्कारनमस्कारैः नृत्यगीतैस्तथैव च॥५७<br>मुखवाद्यैरनेकैश्च स्तोत्रमन्त्रैस्तथैव च।<br>उपोष्य रजनीमेकां भक्त्या परमया हरम्॥५८<br>ते यान्ति परमं स्थानं सदाशिवमनामयम्। | जो लोग फाल्गुनमासके कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथिको एकाग्रचित्त होकर परम श्रद्धाके साथ सनातन देवका अर्चन करते हैं; पुष्पों, फलों, अनेकविध भक्ष्य पदार्थों, दुग्ध, मधु, जल तथा घृतसे शुभ लिङ्गदेवको तृप्त करते हैं और एक रात उपवास करके महान् भक्तिसे हुडुङ्कार, नमस्कार, नृत्य, गीत, मुखवाद्य तथा विविध स्तोत्र-मन्त्रोंसे शिवको तृप्त करते हैं, वे सदाशिवके अनामय परम स्थानको प्राप्त करते हैं॥५५-५८½॥ |
| भूता हि चैत्रमासस्य अर्चयेत्परमेश्वरम्॥५९<br>स वित्तेशपुरं प्राप्य क्रीडयेत् यक्षराडिव।<br>वैशाखस्य चतुर्दश्यां योऽर्चयेत्प्रयतः शिवम्॥६० | जो मनुष्य चैत्रमासकी चतुर्दशीको परमेश्वरका अर्चन करता है, वह कुबेरलोक प्राप्त करके यक्षराजकी |