श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| वैशाखं लोकमासाद्य तस्यैवानुचरो भवेत्।<br>ज्येष्ठे मासि चतुर्दश्यां योऽर्चयेच्छ्रद्धया हरम्॥ ६१ | भाँति क्रीड़ा करता है॥ ५९ १/२ ॥<br>जो वैशाखमासकी चतुर्दशीके दिन संयत होकर शिवकी पूजा करता है, वह स्कन्दलोक प्राप्त करके उन्हींका अनुचर हो जाता है। जो ज्येष्ठमासमें चतुर्दशी तिथिको श्रद्धापूर्वक शिवका पूजन करता है, वह चन्द्र-तारोंकी स्थिति-पर्यन्त अग्निलोकमें वास करता है॥ ६०-६१ १/२ ॥ | | सोऽग्निलोकमवाप्नोति यावदाचन्द्रतारकम्।<br>चतुर्दश्यां शुचौ मासि योऽर्चयेत्तु सुरेश्वरम्॥ ६२<br><br>सूर्यस्य लोके सुसुखी क्रीडते यावदीप्सितम्।<br>श्रावणस्य चतुर्दश्यां कामलिङ्गं समर्चितम्॥ ६३ | जो आषाढ़ महीनेमें चतुर्दशी तिथिको सुरेश्वरका अर्चन करता है, वह सूर्यलोकमें इच्छित समयतक सुखी रहते हुए क्रीडा करता है। जो श्रावणमासकी चतुर्दशी तिथिको कामलिङ्गका अर्चन करता है, वह वरुणलोकको जाता है और वहाँ अप्सराओंके साथ क्रीडा करता है॥ ६२-६३ १/२ ॥ | | स याति वारुणं लोकं क्रीडते चाप्सरैः सह।<br>मासि भाद्रपदे युक्तमर्चयित्वा तु शङ्करम्॥ ६४<br><br>पुष्पैः फलैश्च विविधै रुद्रस्यैति सलोकताम्।<br>पितृपक्षे चतुर्दश्यां पूजयित्वा महेश्वरम्॥ ६५ | भाद्रपदमासमें भक्तिपूर्वक विविध पुष्पों तथा फलोंके द्वारा शंकरकी पूजा करके मनुष्य रुद्रका सालोक्य प्राप्त करता है। [आश्विनमासमें] पितृपक्षमें चतुर्दशी तिथिको महेश्वरका पूजन करके मनुष्य पितरोंका लोक प्राप्त करता है और पूजित होकर उनके साथ क्रीडा करता है॥ ६४-६५ १/२ ॥ | | प्राप्यते पितृलोकं तु क्रीडते पूजितस्तु तैः।<br>प्रबोधमासे देवेशमर्चयित्वा महेश्वरम्॥ ६६<br><br>स चन्द्रलोकमाप्नोति क्रीडते यावदीप्सितम्।<br>बहुले मार्गशीर्षस्य अर्चयित्वा पिनाकिनम्॥ ६७ | प्रबोध (कार्तिक)-मासमें देवेश महेश्वरकी पूजा करके वह चन्द्रलोक प्राप्त करता है और इच्छित समयतक वहाँ विहार करता है। मार्गशीर्षमासकी चतुर्दशी तिथिको पिनाकधारी शिवका अर्चन करके मनुष्य विष्णुलोक प्राप्त करता है और अक्षयकालतक वहाँ क्रीडा करता है॥ ६६-६७ १/२ ॥ | | विष्णुलोकमवाप्नोति क्रीडते कालमक्षयम्।<br>अर्चयित्वा तथा पुष्ये स्थाणुं तुष्टेन चेतसा॥ ६८<br><br>प्राप्नोति नैर्ऋतं स्थानं तेन वै सह मोदते।<br>माघे समर्च्चयित्वा वै पुष्पमूलफलैः शुभैः॥ ६९ | पौष महीनेमें प्रसन्न मनसे स्थाणु (शिव)-की पूजा करके मनुष्य निर्ऋतितलोक प्राप्त करता है और उनके साथ आनन्द करता है। माघमासमें शुभ पुष्प-मूल-फलोंके द्वारा शिवकी पूजा करके मनुष्य संसारसागरका त्यागकर शिवलोक प्राप्त करता है॥ ६८-६९ १/२ ॥ | | प्राप्नोति शिवलोकं तु त्यक्त्वा संसारसागरम्।<br>कृत्तिवासेश्वरं देवमर्चयेत्तु प्रयत्नतः॥ ७०<br><br>अविमुक्ते च वस्तव्यं यदिच्छेन्मामकं पदम्॥ ७१ | यदि कोई मेरा लोक चाहता हो, तो उसे प्रयत्नपूर्वक कृत्तिवासेश्वरदेवकी पूजा करनी चाहिये और अविमुक्त [क्षेत्र]-में वास करना चाहिये॥ ७०-७१ ॥ | | गायन्ति सिद्धाः किल गीतकानि<br>धन्याविमुक्ते तु नरा वसन्ति।<br>स्वर्गापवर्गस्य पदस्य लिङ्गं<br>ये कृत्तिवासं शरणं प्रपन्नाः॥ ७२ | सिद्धलोग यह गीत गाते हैं कि जो मनुष्य अविमुक्तमें वास करते हैं और स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले कृत्तिवासेश्वरलिङ्गकी शरण ग्रहण करते हैं, वे धन्य हैं॥ ७२ ॥ | | ईश्वर उवाच<br>अन्यदायतनं पुण्यं काशिपुर्यां वरानने।<br>धन्वन्तरिः पुरा जातः काशिराजगृहे शुभे॥ ७३ | ईश्वर बोले—हे वरानने! काशीपुरीमें अन्य |