श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 783, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 783
अध्याय ६ ] श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन ७८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्राप्त करता है। उसके दक्षिण दिशाभागमें रुद्रवास कहा गया है॥ १६-१८॥ | |
| रुद्रस्योत्तरपार्श्वे तु पञ्चायतनदक्षिणे।<br>तत्र कुण्डं महत् प्रोक्तं महापातकनाशनम्॥ १९<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा अभीष्टं फलमाप्नुयात्।<br>चतुर्दश्यां यदा योग आर्द्रानक्षत्रसंयुतः॥ २०<br>तदा पुण्यतमः कालस्तस्मिन् स्नाने महाफलम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा रुद्रं च भामिनि॥ २१<br>यत्र तत्र मृतो देवि रुद्रलोकं तु गच्छति। | वहॉँपर रुद्रके उत्तरभागमें तथा पंचायतनके दक्षिणमें महापापोंका नाश करनेवाला एक विशाल कुण्ड बताया गया है, उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य अभीष्ट फल प्राप्त करता है। जब चतुर्दशी तिथिमें आर्द्रा नक्षत्रसे संयुक्त योग हो, तब पुण्यतम काल होता है, उस समय उस [कुण्ड]-में स्नान करनेसे महान् फल होता है। हे भामिनि! हे देवि! उस तीर्थमें स्नान करके तथा रुद्रका दर्शन करके जहाँ कहीं भी मनुष्य मरता है, [तत्काल] रुद्रलोकको जाता है॥ १९-२१ १/२॥ |
| पूर्वामुखस्थितश्चाहं तस्मिँल्लिङ्गे महेश्वरि॥ २२<br>रुद्राणां कोटिजप्येन यत्फलं प्रतिपद्यते।<br>तत्फलं लभते भद्रे तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ २३ | हे महेश्वरि! मैं उस लिङ्गमें पूर्वकी ओर मुख किये हुए स्थित हूँ। हे भद्रे! करोड़ों रुद्रोंका जप करनेसे जो फल होता है, वह फल उस लिङ्गके दर्शनसे प्राप्त हो जाता है॥ २२-२३॥ |
| रुद्रस्य च समीपे तु ऋषिभिः स्थापितानि च।<br>लिङ्गानि मम सुश्रोणि सर्वकामफलानि च॥ २४<br>रुद्रस्य नैर्ऋते भागे महालयमिति स्मृतम्।<br>दर्शनाच्च पदं तस्य महाभाग्यस्य सुन्दरि॥ २५ | हे सुश्रोणि! रुद्रके समीपमें समस्त वांछित फल प्रदान करनेवाले [अनेक] लिङ्ग ऋषियोंके द्वारा स्थापित किये गये हैं। रुद्रके नैर्ऋत्य दिशामें महालय बताया गया है, हे सुन्दरि! उसके दर्शनसे महाभाग्यका पद प्राप्त होता है॥ २४-२५॥ |
| तत्र स्थाने शुभे रम्ये स्वयं तिष्ठति पार्वती।<br>तस्यैव चाग्रतो देवि कूपस्तिष्ठति निर्मलम्॥ २६<br>पितरस्तत्र तिष्ठन्ति ये दिव्या ये च मानुषाः।<br>तस्मिन् कूप उपस्पृश्य जलं सङ्गृह्य भामिनि॥ २७ | उस शुभ तथा रम्य स्थानपर स्वयं पार्वती विराजमान हैं। हे देवि! उसीके आगे निर्मल कूप स्थित है। जो दिव्य तथा मानुष पितर हैं, वे वहाँ रहते हैं। हे भामिनि! हे देवि! मेरे लोककी इच्छा रखनेवालेको चाहिये कि उस कूपमें स्नान करके जल लेकर वहाँ पिण्डदान करे॥ २६-२७ १/२॥ |
| पिण्डस्तत्र प्रदातव्यो मम देवि पदस्पृहः।<br>श्राद्धं तत्र प्रकुर्वीत अन्नाद्येनोदकेन च॥ २८<br>पिण्डः कूपे तु तत्रैव प्रेक्षप्तव्यः शुभानने।<br>एवं कृत्वा तु यस्तस्मिंस्तीर्थे रुद्रमहाालये॥ २९<br>एकविंशकुलोपेतो रुद्रलोकं स गच्छति।<br>तत्र वैतरणी नाम दीर्घिका पश्चिमामुखी॥ ३०<br>तस्यां स्नात्वा वरारोहे नरकं न च पश्यति। | हे शुभानने! अन्न आदिसे तथा उस जलसे श्राद्ध करना चाहिये और वहींपर कूपमें पिण्डको छोड़ देना चाहिये। जो उस रुद्रमहालय तीर्थमें इस प्रकारसे [श्राद्ध] करता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंसहित रुद्रलोकको जाता है। वहाँपर पश्चिमकी ओर मुखवाली वैतरणी नामक दीर्घिका (बावली) है, हे वरारोहे! उसमें स्नान करके मनुष्यको नरक नहीं देखना पड़ता है॥ २८-३० १/२॥ |
| खण्डस्फुटितसंस्कारं यस्तत्र कुरुते शुभे॥ ३१<br>रुद्रलोकोऽक्षयस्तस्य सर्वकालं यशस्विनि।<br>महाालयस्योत्तरेण लिङ्गानि सुमहन्ति च॥ ३२ | हे शुभे! हे यशस्विनि! जो वहाँपर खण्डस्फुटित-संस्कार करता है, उसे सदाके लिये अक्षय रुद्रलोक प्राप्त होता है। महालयके उत्तरमें अति महान् लिङ्ग विद्यमान |