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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ८१

हो रही है। विजय केशव को छोड़कर साधारण ब्राह्मसमाज में चले गए हैं और उनकी कन्या के विवाह आदि के विरुद्ध उन्होंने कितनी वक्तृताएँ दी हैं; इसलिए विजय को देखकर केशव कुछ अप्रतिभ हो गए। वे आसन छोड़कर उठे, कमरे के झरोखे खोल देने के लिए।

ब्राह्मभक्त टकटकी लगाए श्रीरामकृष्ण को देख रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी, परन्तु अभी तक भाव पूरी मात्रा में वर्तमान है। श्रीरामकृष्ण आप ही आप अस्फुट स्वरों में कहते हैं – ‘माँ, मुझे यहाँ क्यों लायी? मैं क्या इन लोगों की घेरे के भीतर से रक्षा कर सकूँगा?’

श्रीरामकृष्ण शायद देख रहे हैं कि संसारी जीव घेरे के भीतर बन्द हैं, बाहर नहीं आ सकते, बाहर का उजेला भी नहीं देख पाते, सब के हाथ-पैर सांसारिक कामों से बँधे हैं। केवल घर के भीतर की वस्तु उन्हें देखने को मिलती है। वे सोचते हैं कि जीवन का उद्देश्य केवल शरीर-सुख और विषय-कर्म – काम और कांचन – है। क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण ने कहा, ‘माँ, मुझे यहाँ क्यों लायी? मैं क्या इन लोगों की घेरे के भीतर से रक्षा कर सकूँगा?’

धीरे धीरे श्रीरामकृष्ण को बाह्यज्ञान हुआ। गाजीपुर के नीलमाधव बाबू और एक ब्राह्मभक्त ने पवहारी बाबा की बात चलायी।

ब्राह्मभक्त – महाराज, इन लोगों ने पवहारी बाबा को देखा है। वे गाजीपुर में रहते हैं, आपकी तरह एक और हैं।

श्रीरामकृष्ण अभी तक बातचीत नहीं कर पा रहे हैं, सुनकर सिर्फ मुसकराए।

ब्राह्मभक्त (श्रीरामकृष्ण से) – महाराज, पवहारी बाबा ने अपने कमरे में आपका फोटोग्राफ रखा है।

श्रीरामकृष्ण जरा हँसकर अपनी देह की ओर उँगली दिखाकर बोले – “यह गिलाफ!”

(३)

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।। (गीता, ५।५)

ज्ञानयोग, भक्तियोग तथा कर्मयोग का समन्वय

‘तकिया और उसका गिलाफ।’ देही और देह। क्या श्रीरामकृष्ण कहते हैं कि देह नश्वर है, नहीं रहेगी? देह के भीतर जो देही है वह अविनाशी है, अतएव देह का फोटोग्राफ लेकर क्या होगा? देह अनित्य वस्तु है, इसके आदर से क्या होगा? बल्कि जो