श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
| ८२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २७ अक्टूबर, १८८२ |
|---|
भगवान् अन्तर्यामी हैं, मनुष्य के हृदय में विराजमान हैं, उन्हीं की पूजा करनी चाहिए।
श्रीरामकृष्ण कुछ प्रकृतिस्थ हुए। वे कह रहे हैं - “परन्तु एक बात है। भक्तों का हृदय उनका निवासस्थान है। भक्तों के हृदय में वे विशेष रूप से रहते हैं। जैसे कोई जमींदार अपनी जमींदारी में सभी जगह रह सकता है, परन्तु वे अमुक बैठक में प्रायः रहते हैं, यही लोग कहा करते हैं। भक्तों का हृदय भगवान् का बैठकघर है। (सब लोग आनन्दित हुए।)
“जिन्हें ज्ञानी ब्रह्म कहते हैं, योगी उन्हीं को आत्मा कहते हैं और भक्त उन्हें भगवान् कहते हैं।
“एक ही ब्राह्मण है। जब पूजा करता है, तब उसका नाम पुजारी है, जब भोजन पकाता है, तब उसे रसोइया कहते हैं। जो ज्ञानी है, ज्ञानयोग जिसका अवलम्बन है, वह ‘नेति नेति’ विचार कहता है, - ब्रह्म न यह है, न वह; न जीव है, न जगत्। विचार करते करते जब मन स्थिर होता है, मन का नाश होता है, समाधि होती है, तब ब्रह्मज्ञान होता है। ब्रह्मज्ञानी की सत्यधारणा है कि ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या नामरूप स्वप्नतुल्य है; ब्रह्म क्या है यह मुँह से नहीं कहा जा सकता; वे व्यक्ति (Personal God) हैं यह भी नहीं कहा जा सकता।
“ज्ञानी इसी प्रकार कहते हैं - जैसे वेदान्तवादी। परन्तु भक्तगण सभी अवस्थाओं को लेते हैं। वे जाग्रत् अवस्था को भी सत्य कहते हैं; जगत् को स्वप्नवत् नहीं कहते। भक्त कहते हैं, यह संसार भगवान् का ऐश्वर्य है; आकाश, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, पर्वत, समुद्र, जीव-जन्तु आदि सभी भगवान् की सृष्टि है, उन्हीं का ऐश्वर्य है। वे हृदय के भीतर हैं और बाहर भी। उत्तम भक्त कहता है, वे स्वयं ही ये चौबीस तत्त्व - जीवजगत् - बने हैं। भक्त की इच्छा चीनी खाने की है, चीनी होने की नहीं। (सब हँसते हैं।)
“भक्त का भाव कैसा है, जानते हो? 'हे भगवन्, तुम प्रभु हो, मैं तुम्हारा दास हूँ, 'तुम माता हो, मैं तुम्हारी सन्तान हूँ; और यह भी कि 'तुम मेरे पिता या माता हो', 'तुम पूर्ण हो, मैं तुम्हारा अंश हूँ'। भक्त यह कहने की इच्छा नहीं करता कि मैं ब्रह्म हूँ।
“योगी भी परमात्मा के दर्शन करने की चेष्टा करता है। उद्देश्य जीवात्मा और परमात्मा का योग है। योगी विषयों से मन को खींच लेता है और परमात्मा में मन लगाने की चेष्टा करता है। इसीलिए पहले-पहल निर्जन में स्थिर आसन साधकर अनन्य मन से ध्यान-चिन्तन करता है।
“परन्तु वस्तु एक ही है। केवल नाम का भेद है। जो ब्रह्म है, वही आत्मा है, वही भगवान् है। ब्रह्मज्ञानियों के लिए ब्रह्म, योगियों के लिए परमात्मा और भक्तों के लिए भगवान्।”
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar