श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ अक्टूबर, १८८२
लीला को छोड़कर नित्य को।
"आद्याशक्ति लीलामयी हैं। वे सृष्टि, स्थिति और प्रलय करती हैं। उन्हीं का नाम काली है। काली ही ब्रह्म हैं, ब्रह्म ही काली हैं। एक ही वस्तु है। वे निष्क्रिय हैं, सृष्टि-स्थिति-प्रलय का कोई काम नहीं करते, यह बात जब सोचता हूँ तब उन्हें ब्रह्म कहता हूँ और जब वे ये सब काम करते हैं, तब उन्हें काली कहता हूँ - शक्ति कहता हूँ। एक ही व्यक्ति है, भेद सिर्फ नाम और रूप में है।
"जिस प्रकार 'जल', 'वाटर' और 'पानी'। एक तालाब में तीन-चार घाट हैं। एक घाट में हिन्दू पानी पीते हैं, वे 'जल' कहते हैं;* और एक घाट में मुसलमान पानी पीते हैं, वे 'पानी' कहते हैं; और एक घाट में अंग्रेज पानी पीते हैं, वे 'वाटर' कहते हैं। तीनों एक हैं, भेद केवल नामों में है। उन्हें कोई 'अल्लाह' कहता है, कोई 'गाड', कोई 'ब्रह्म' कहता है, कोई 'काली'; कोई राम, हरि, ईसा, दुर्गा आदि।"
केशव (सहास्य) - यह कहिए कि काली कितने भावों से लीला कर रही हैं।
महाकाली तथा सृष्टिप्रकरण
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - वे नाना भावों से लीला कर रही हैं। वे ही महाकाली, नित्यकाली, श्मशानकाली, रक्षाकाली और श्यामाकाली है। महाकाली और नित्यकाली की बात तन्त्रों में हैं। जब सृष्टि हुई नहीं थी, सूर्य-चन्द्र, ग्रह-पृथ्वी आदि नहीं थे, - घोर अन्धकार था, तब केवल निराकार महाकाली महाकाल के साथ अभेद रूप से विराज रही थीं।
"श्यामाकाली का बहुत कुछ कोमल भाव है, - वराभयदायिनी हैं। गृहस्थों के घर उन्हीं की पूजा होती है। जब अकाल, महामारी, भूकम्प, अनावृष्टि, अतिवृष्टि होती है, तब रक्षाकाली की पूजा की जाती है। श्मशानकाली की संहारमूर्ति है, शव-शिवा-डाकिनी-योगिनियों के बीच, श्मशान में रहती हैं। रुधिरधारा, गले में मुण्डमाला, कटि में नरहस्तों का कमरबन्द। जब संसार का नाश होता है, महाप्रलय होता है तब माँ सृष्टि के बीज इकट्ठे कर लेती हैं। घर की गृहिणी के पास जिस प्रकार एक हण्डी रहती है और उसमें तरह तरह की चीजें रखी रहती हैं।" (केशव तथा और लोग हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हाँ जी, गृहिणियों के पास इस तरह की हण्डी रहती है। उसमें वे समुद्रफेन, नील का डला, खीरे, कोहड़े आदि के बीज छोटी छोटी गठरियों में बाँधकर रख देती हैं और जरूरत पड़ने पर निकालती है। माँ ब्रह्ममयी सृष्टिनाश के बाद इसी प्रकार सब बीज इकट्ठे कर लेती हैं। सृष्टि के बाद आद्याशक्ति संसार के भीतर ही
* The relative phenomenal world.