भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

२७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ८५

रहती हैं। वे संसार प्रसव करती हैं; फिर संसार के भीतर रहती हैं। वेदों में 'ऊर्णनाभ' की बात है; मकड़ी और उसका जाला। मकड़ी अपने भीतर से जाला निकालती है और उसी के ऊपर रहती भी है। ईश्वर संसार के आधार और आधेय दोनों हैं।

कालीब्रह्म – काली निर्गुणा और सगुणा

"काली का रंग काला थोड़े ही है! दूर है, इसी से काला जान पड़ता है; समझ लेने पर काला नहीं रहता।

"आकाश दूर से नीला दिखायी पड़ता है। पास जाकर देखो तो कोई रंग नहीं। समुद्र का पानी दूर से नीला जान पड़ता है, पास जाकर चुल्लू में लेकर देखो, कोई रंग नहीं।"

यह कहकर श्रीरामकृष्ण प्रेम से मतवाले होकर गाने लगे। भाव यह है – "मेरी माँ क्या काली है? दिगम्बरी का काला रूप हृदयपद्म को प्रकाशपूर्ण करता है।"

(५)

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्।। (गीता, ७।१३)

यह संसार क्यों है?

श्रीरामकृष्ण (केशव आदि से) – बन्धन और मुक्ति दोनों ही की कर्त्री वे हैं। उनकी माया से संसारी जीव काम-कांचन में बँधा है और फिर उनकी दया होते ही वह छूट जाता है। वे 'भवबन्धन की फाँस काटनेवाली तारिणी' हैं।

यह कहकर गन्धर्वकण्ठ से भक्त रामप्रसाद का गीत गाने लगे जिसका आशय यह है :-

"श्यामा माँ, संसार-रूपी बाजार के बीच तू पतंग उड़ा रही है। यह आशा-वायु के सहारे उड़ती है। इसमें माया की डोर लगी हुई है। विषयों के माँझे से यह कर्री हो गयी है। लाखों में से दो ही एक (पतंगें) कटती हैं और तब तू हँसकर तालियाँ पीटती है। ...'

"वे लीलामयी हैं। यह संसार उनकी लीला है। वे इच्छामयी, आनन्दमयी हैं, लाख आदमियों में कहीं एक को मुक्त करती हैं।"

ब्राह्मभक्त – महाराज, वे चाहें तो सभी को मुक्त कर सकती हैं, तो फिर क्यों हम लोगों को संसार में बाँध रखा है?

श्रीरामकृष्ण – उनकी इच्छा! उनकी इच्छा कि वे यह सब लेकर खेल करें। छुई-छुऔअल खेलनेवाले सभी लड़के अगर ढाई को दौड़कर छू लें तो खेल ही बन्द हो जाय! और यदि सभी छू लें तो ढाई नाराज भी होती है। खेल चलता है तो ढाई खुश रहती है।