श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ अक्टूबर, १८८२
कुछ साफ कर जायेंगे। (सब हँसते हैं।)
“परन्तु शक्ति की विशेषता होती है। छोटा आधार (साधारण मनुष्य) लोकशिक्षा देते डरता है। सड़ी लकड़ी खुद तो किसी तरह बह जाती है, परन्तु एक चिड़िया के बैठने से भी वह डूब जाती है। नारदादि 'बहादुरी' लकड़ी हैं। ऐसी लकड़ी खुद भी बहती है और कितने ही मनुष्यों, मवेशियों, यहाँ तक कि हाथी को भी अपने ऊपर लेकर बह जाती है।”
(७)
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा, भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देव रूपं, प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ (गीता, ११।४५)
ब्राह्मसमाज की प्रार्थनापद्धति। ईश्वर का ऐश्वर्य-वर्णन।
पूर्वकथा – दक्षिणेश्वर के राधाकान्त मन्दिर में जेवर की चोरी
श्रीरामकृष्ण (शिवनाथ आदि से) – क्यों जी, तुम लोग इतना ईश्वर के ऐश्वर्य का वर्णन क्यों करते हो? मैंने केशव सेन से यही कहा था। एक दिन केशव वहाँ (कालीमन्दिर) गया था। मैंने कहा, तुम लोग किस तरह लेक्चर देते हो, मैं सुनूँगा। गंगाघाट की चाँदनी में सभा हुई, और केशव बोलने लगा। खूब बोला। मुझे भाव हो गया था। बाद में केशव से मैंने कहा, तुम यह सब इतना क्यों बोलते हो – हे ईश्वर, तुमने कैसे सुन्दर सुन्दर फूलों की रचना की, तुमने आकाश की सृष्टि की, तुमने नक्षत्र बनाए, तुमने समुद्र का सृजन किया, – यह सब! जो स्वयं ऐश्वर्य चाहते हैं उन्हें ईश्वर के ऐश्वर्य का वर्णन करना अच्छा लगता है। जब राधाकान्त का जेवर चोरी गया था, तब बाबू (रानी रासमणि के जामाता) राधाकान्त के मन्दिर में जाकर ठाकुरजी से बोले, 'क्यों महाराज, तुम अपने जेवर की रक्षा न कर सके!' मैंने बाबू से कहा, 'यह तुम्हारी कैसी बुद्धि है! स्वयं लक्ष्मी जिनकी दासी हैं, चरणसेवा करती हैं, उनको ऐश्वर्य की क्या कमी है? यह जेवर तुम्हारे लिए ही अमोल वस्तु है, ईश्वर के लिए तो कंकड़-पत्थर है। राम राम! ऐसी बुद्धिहीनता की बातें न किया करो। कौन बड़ा ऐश्वर्य तुम उन्हें दे सकते हो?' इसीलिए कहता हूँ जिसका मन जिस पर रम जाता है वह उसी को चाहता है; कहाँ वह रहता है, उसकी कितनी कोठियाँ हैं, कितने बगीचे हैं, कितना धन है, परिवार में कौन कौन है, नौकर कितने हैं – इसकी खबर कौन लेता है? जब मैं नरेन्द्र को देखता हूँ, तब सबकुछ भूल जाता हूँ। उसका घर कहाँ है, उसका बाप क्या करता है, उसके कितने भाई हैं, ये सब बातें कभी भूलकर भी नहीं पूछीं, ईश्वर के मधुर रस में डूब जाओ। उनकी सृष्टि अनन्त है, ऐश्वर्य अनन्त है। ज्यादा ढूँढ़-तलाश की क्या जरूरत?
श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से गाने लगे। गीत इस आशय का है – “ 'ऐ मन तू रूप