श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १४ | १०७ |
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के समुद्र में डूबा जा। तलातल पाताल खोजने पर तुझे प्रेमरत्न-धन मिलेगा। खोज, जी लगाकर खोज। खोजने ही से तू हृदय में वृन्दावन देखेगा। तब वहाँ सदा ज्ञान की बत्ती जलेगी। भला ऐसा कौन है जो जमीन पर डोंगा चलायेगा? कबीर कहते हैं, तू सदा श्रीगुरू का चरणचिन्तन कर।’
“दर्शन के बाद कभी कभी भक्त की साध होती है कि उनकी लीला देखें। श्रीरामचन्द्रजी जब राक्षसों को मारकर लंकापुरी में घुसे तब बुड्ढी निकषा भागी। तब लक्ष्मण बोले, 'हे राम, भला यह क्या है? यह निकषा इतनी बुड्ढी है, पुत्रशोक भी इसको कम नहीं हुआ, फिर भी इसे प्राणों का इतना भय है कि भाग रही है!' श्रीरामचन्द्रजी ने निकषा को अभय देते हुए सामने लाकर कारण पूछा। वह बोली, 'राम इतने दिनों तक बची हूँ, इसीलिए तुम्हारी इतनी लीला देखी। यही कारण है कि और भी बचना चाहती हूँ। न जाने और कितनी लीलाएँ देखूँ।' (सब हँसते हैं।)
(शिवनाथ से) – “तुम्हें देखने को जी चाहता है। शुद्धात्माओं को बिना देखे किसको लेकर रहूँगा? शुद्धात्मा मेरे पिछले जन्म के मित्र जान पड़ते हैं।”
एक ब्राह्मभक्त ने पूछा, – “महाराज, आप जन्मान्तर मानते हैं?”
जन्मान्तर – “बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन”
श्रीरामकृष्ण – हाँ, मैंने सुना है कि जन्मान्तर होता है। ईश्वर का काम हम लोग अल्पबुद्धि से कैसे समझ सकते हैं? अनेकों ने कहा है, इसलिए अविश्वास नहीं कर सकते। भीष्मदेव देह छोड़ना चाहते हैं, शरों की शय्या पर लेटे हुए हैं; सब पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ खड़े हैं। सब ने देखा, भीष्मदेव की आँखों से आँसू बह रहे हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण से बोले, 'भाई, यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि पितामह– जो स्वयं भीष्मदेव ही हैं; सत्यवादी, जितेन्द्रिय, ज्ञानी, आठों वसुओ में से एक हैं – वे भी देह छोड़ते समय माया में पड़े रो रहे हैं।' यह भीष्मदेव से जब श्रीकृष्ण ने कहा तब वे बोले, 'कृष्ण', तुम खूब जानते हो कि मैं इसलिए नहीं रो रहा हूँ। जब सोचता हूँ कि स्वयं भगवान् पाण्डवों के सारथि हैं, फिर भी उनके दुःख और विपत्तियों का अन्त नहीं होता तब यही याद करके आँसू बहाता हूँ कि परमात्मा के कार्यों का कुछ भी भेद न पाया।'
भक्तों के साथ कीर्तनानन्द
समाजगृह में सन्ध्याकाल की उपासना शुरू हुई। रात के साढ़े आठ बजे का समय है। चाँदनी रात है। बगीचे के वृक्ष, लताएँ, कुंज आदि शरत्कालीन चन्द्रमा की निर्मल किरणों में आप्लावित हो उठे। समाजगृह में संकीर्तन हो रहा है। श्रीरामकृष्ण भगवत्प्रेम से मतवाले होकर नाच रहे हैं। ब्राह्म भक्तगण मृदंग-करताल लेकर, उन्हें घेरकर नाच रहे हैं। भाव में भरे हुए सभी मानो ईश्वर-दर्शन कर रहे हैं। हरिनाम-ध्वनि उत्तरोत्तर बढ़ने लगी।