श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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परिच्छेद १५
सर्कस में श्रीरामकृष्ण –
गृहस्थ तथा अन्यान्य कर्मयोगियों की कठिन समस्या
श्रीरामकृष्ण गाड़ी से श्यामपुकुर विद्यासागर स्कूल के फाटक पर आ पहुँचे। दिन के तीन बजे का समय होगा। साथ में उन्होंने मास्टर को भी ले लिया। राखाल तथा अन्य दो एक भक्त गाड़ी में हैं। आज बुधवार, १५ नवम्बर १८८२ ई., कार्तिक शुक्ला पंचमी है। गाड़ी चितपुर रास्ते से, किले के मैदान की ओर जा रही है।
श्रीरामकृष्ण आनन्दमय हैं। मतवाले की तरह गाड़ी से कभी इस ओर तथा कभी उस ओर मुख करके बालक की तरह देख रहे हैं और पथिकों के सम्बन्ध में भक्तों से बातचीत कर रहे हैं। मास्टर से कह रहे हैं, "देखो सब लोगों को देखता हूँ, कैसे निम्न दृष्टि के हैं। पेट के लिए सब जा रहे हैं। ईश्वर की ओर दृष्टि नहीं है।"
श्रीरामकृष्ण आज किले के मैदान में विल्सन सर्कस देखने जा रहे हैं। मैदान में पहुँचकर टिकट खरीदी गयी। आठ आने की अर्थात् अन्तिम श्रेणी की टिकट। भक्तगण श्रीरामकृष्ण को लेकर ऊँचे स्थान पर जाकर एक बेंच पर बैठे। श्रीरामकृष्ण आनन्द से कह रहे हैं, "वाह! यहाँ से बहुत अच्छा दिखता है।"
सर्कस में तरह तरह के खेल काफी देर तक दिखाए गए। गोलाकार रास्ते पर घोड़ा दौड़ रहा है, घोड़े की पीठ पर एक पैर पर मेम खड़ी है। फिर बीच बीच में सामने बड़े बड़े लोहे के चक्र रखे हैं। चक्र के पास आकर घोड़ा जब उसके नीचे से दौड़ता है, तो मेम घोड़े की पीठ से कूदकर चक्र के बीच में से होकर फिर घोड़े की पीठ पर एक पैर पर खड़ी हो जाती है। घोड़ा बार बार तेजी के साथ उस गोलाकार पथ पर दौड़ने लगा, मेम भी फिर उसी प्रकार पीठ पर खड़ी है!
सर्कस समाप्त हुआ। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ उतरकर मैदान में गाड़ी के पास आए। ठण्ड पड़ रही थी। हरे रंग की शाल ओढ़कर मैदान में खड़े खड़े बातचीत कर रहे हैं। पास ही भक्तगण खड़े हैं। एक भक्त के साथ में आपके लिए मसाले (लौंग, इलायची आदि) का एक छोटासा बटुआ है। उसमें कुछ मसाला और विशेष रूप से कबाबचीनी है।
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar