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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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११०श्रीरामकृष्णवचनामृत१५ नवम्बर १८८२

पहले साधना, बाद में संसार। अभ्यासयोग।

श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, “देखो, मेम कैसे एक पैर के सहारे घोड़े पर खड़ी है और घोड़ा तेजी से दौड़ रहा है। कितना कठिन काम है! अनेक दिनों तक अभ्यास किया है, तब तो ऐसा सीखा। जरा असावधान होते ही हाथ-पैर टूट जाएँगे और मृत्यु भी हो सकती है। संसार करना इसी प्रकार कठिन है। बहुत साधन-भजन करने के बाद ईश्वर की कृपा से कोई कोई इसमें सफल हुए हैं। अधिकांश लोग असफल हो जाते हैं। संसार करने जाकर और भी बद्ध हो जाते हैं, और भी डूब जाते हैं - मृत्यु-यन्त्रणा होती है! जनक आदि की तरह किसी किसी ने उग्र तपस्या के बल पर संसार किया था। इसलिए साधन-भजन की विशेष आवश्यकता है। नहीं तो संसार में ठीक नहीं रहा जा सकता।”

बलराम के मकान पर श्रीरामकृष्ण

श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठे। गाड़ी बागबाजार के बसुपाड़ा में बलराम के मकान के दरवाजे पर आ खड़ी हुई। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दुमंजले पर बैठकघर में जा बैठे। सायंकाल है - दिया जलाया गया है। श्रीरामकृष्ण सर्कस की बातें कर रहे हैं। अनेक भक्त एकत्रित हुए हैं। उनके साथ ईश्वर-सम्बन्धी चर्चा हो रही है। मुख में दूसरी कोई भी बात नहीं है, केवल ईश्वर की बात।

जातिभेद तथा अस्पृश्यों की समस्या

जातिभेद के सम्बन्ध में चर्चा चली।

श्रीरामकृष्ण बोले, “एक उपाय से जातिभेद उठ सकता है। वह उपाय है - भक्ति। भक्तों के जाति नहीं है। भक्ति होने से ही देह, मन, आत्मा सब शुद्ध हो जाते हैं। गौर, निताई हरिनाम देने लगे और चाण्डाल तक सभी को गोद में लेने लगे। भक्ति न रहने पर ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है। भक्ति रहने पर चाण्डाल चाण्डाल नहीं है। अस्पृश्य जाति भक्ति के होने पर शुद्ध पवित्र हो जाती है।”

संसारबद्ध जीव

श्रीरामकृष्ण संसारबद्ध जीवों की बात कर रहे हैं। वे मानो रेशम के कीड़े हैं। चाहें तो कोश को काटकर निकल आ सकते हैं, परन्तु काफी कोशिश से कोश बनाते हैं, छोड़कर आ नहीं सकते। इसी से मरते हैं। फिर मानो जाल में फँसी हुई मछली। जिस रास्ते से गयी है, उसी रास्ते से निकल सकती है, परन्तु जल की मीठी आवाज और दूसरी मछलियों के साथ खेलकूद, - इसी में भूलकर रह जाती है। बाहर निकलने की चेष्टा नहीं करती। बच्चों की अस्फुट बातें मानो जलकल्लोल का मीठा शब्द है। मछली अर्थात् जीव और परिवारवर्ग। परन्तु एक दौड़ से जो भाग जाते हैं उन्हें कहते हैं मुक्त पुरुष।

श्रीरामकृष्ण गाना गा रहे हैं -

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar