भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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परिच्छेद १९

विजयकृष्ण गोस्वामी आदि के प्रति उपदेश

(१)

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ (गीता, २।२०)

मुक्त पुरुष का शरीर त्याग क्या आत्महत्या है?

दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में श्रीयुत विजयकृष्ण गोस्वामी भगवान् श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आए हैं। उनके साथ तीन-चार ब्राह्मभक्त भी हैं। बृहस्पतिवार, १४ दिसम्बर १८८२ ई.। श्रीरामकृष्णदेव के परम भक्त बलराम बाबू के साथ ये लोग कलकत्ते से नाव पर चढ़कर आये हैं। श्रीरामकृष्ण दोपहर को जरा विश्राम कर रहे हैं। उनके पास रविवार को भीड़ ज्यादा होती है। इसीलिए जो भक्त उनसे एकान्त में बातचीत करना चाहते हैं, वे प्रायः दूसरे ही समय में आते हैं।

श्रीरामकृष्ण अपने तखत पर बैठे हुए हैं। विजय, बलराम, मास्टर और दूसरे भक्त उनकी ओर मुँह करके पश्चिमास्य बैठे हैं। कोई चटाई पर तो कोई फर्श ही पर बैठा है। कमरे के पश्चिम ओर के दरवाजे से गंगाजी दिखायी दे रही हैं। शीत ऋतु के कारण भागीरथी शान्त तथा स्वच्छ जल से पूर्ण है। दरवाजे के उस ओर पश्चिम का अर्धगोलाकार बरामदा है। बरामदे के नीचे फूलों का बगीचा और फिर गंगा का पुश्ता है। पुश्ते के पश्चिम अंग से सटकर पुण्यसलीला कलुषहारिणी गंगा मानो ईश्वरमन्दिर के पादमूल को आनन्द के साथ धोते हुए बहती जा रही है।

ठण्डकाल है, इसलिए सभी गरम कपड़े चढ़ाए हुए हैं। विजय को शूल की बहुत पीड़ा होती है, इसलिए वे अपने साथ दवा की शीशी ले आए हैं - दवा लेने का समय होने पर दवा लेंगे। इस समय विजय साधारण ब्राह्मसमाज में आचार्य की नौकरी करते हैं। उन्हें समाज की वेदी पर बैठकर उपदेश देना पड़ता है। परन्तु आजकल समाज के साथ अनेक विषयों पर उनका मतभेद हो रहा है। क्या किया जाय - नौकरी करते हैं, इसलिए अपनी इच्छा के अनुसार न तो कुछ कह सकते हैं, और न कर ही सकते हैं। विजय का जन्म एक अत्यन्त पवित्र और उच्च कुल में हुआ है। भगवान् श्रीचैतन्यदेव के एक प्रधान