श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ नवम्बर १८८२
इसका अर्थ यह है कि वे विषयासक्त मन के अगोचर हैं। वैष्णवचरण कहा करता था, 'वे शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि द्वारा प्राप्त करने योग्य हैं।'* इसीलिए साधुसंग, प्रार्थना, गुरु का उपदेश – यह सब आवश्यक है। तभी चित्तशुद्धि होती है, तब उनका दर्शन होता है। मैले जल में निर्मली डालने से वह साफ होता है, तब मुँह देखा जाता है। मैले आईने में भी मुँह नहीं देखा जा सकता।
“चित्तशुद्धि के बाद भक्ति प्राप्त करने पर, उनकी कृपा से उनका दर्शन होता है। दर्शन के बाद 'आदेश' पाने पर तब लोकशिक्षा दी जा सकती है। पहले से ही लेक्चर देना ठीक नहीं है। एक गाने में कहा है – 'मन अकेले बैठे क्या सोच रहे हो? क्या कभी प्रेम के बिना ईश्वर मिल सकता है?'
“फिर कहा है, 'तेरे मन्दिर में माधव नहीं हैं। शंख बजाकर तूने हल्ला मचा दिया। उसमें तो ग्यारह चमगीदड़ रातदिन मँडराते रहते हैं।'
“पहले हृदय-मन्दिर को साफ करना होता है। ठाकुरजी की प्रतिमा को लाना होता है। पूजा की तैयारी करनी होती है। कोई तैयारी नहीं, भों भों करके शंख बजाने से क्या होगा?”
अब श्री विजय गोस्वामी वेदी पर बैठे ब्राह्मसमाज की पद्धति के अनुसार उपासना कर रहे हैं। उपासना के बाद वे श्रीरामकृष्ण के पास आकर बैठे।
श्रीरामकृष्ण (विजय के प्रति) – अच्छा, तुम लोगों ने उतना पाप, पाप क्यों कहा? सौ बार 'मैं पापी हूँ, मैं पापी हूँ', ऐसा कहने से वैसा ही हो जाता है। ऐसा विश्वास करना चाहिए कि उनका नाम लिया – है, मेरा फिर पाप कैसा? वे हमारे माँ-बाप हैं; उनसे कहो कि पाप किया है, अब कभी नहीं करूँगा। और उनका नाम लो। सब मिलकर उनके नाम से देहमन को पवित्र करो – जिह्वा को पवित्र करो।
* मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासंगि मोक्षे निर्विषयं स्मृतम्॥- मैत्रायणी उपनिषद