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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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परिच्छेद १८

मणि मल्लिक के ब्राह्मोत्सव में श्रीरामकृष्ण

श्रीरामकृष्ण ने कलकत्ते में श्री मणिलाल मल्लिक के सिन्दुरियापट्टीवाले मकान पर भक्तों के साथ शुभागमन किया है। वहाँ पर ब्राह्मसमाज का प्रतिवर्ष उत्सव होता है। दिन के चार बजे का समय होगा। यहाँ पर आज ब्राह्मसमाज का वार्षिकोत्सव है। २६ नवम्बर १८८२ ई.। श्री विजयकृष्ण गोस्वामी तथा अनेक ब्राह्मभक्त और श्री प्रेमचन्द्र बड़ाल तथा गृहस्वामी के अन्य मित्रगण आए हैं। मास्टर आदि साथ हैं।

श्री मणिलाल ने भक्तों की सेवा के लिए अनेक प्रकार का आयोजन किया है। प्रह्लाद-चरित्र की कथा होगी, उसके बाद ब्राह्मसमाज की उपासना होगी, अन्त में भक्तगण प्रसाद पायेंगे।

श्री विजय अभी तक ब्राह्मसमाज में ही हैं। वे आज की उपासना करेंगे। उन्होंने अभी तक गैरिक वस्त्र धारण नहीं किया है।

कथक महाशय प्रह्लाद-चरित्र की कथा कह रहे हैं। पिता हिरण्यकशिपु हरि की निन्दा करते हुए पुत्र प्रह्लाद को बार बार क्लेशित कर रहे हैं। प्रह्लाद हाथ जोड़कर हरि से प्रार्थना कर रहे हैं और कह रहे हैं, “हे हरि, पिता को सद्बुद्धि दो।” श्रीरामकृष्ण इस बात को सुनकर रो रहे हैं। श्री विजय आदि भक्तगण श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण को भावावस्था हो गयी है।

श्री विजय गोस्वामी प्रभृति ब्राह्मभक्तों को उपदेश। ईश्वर दर्शन और आदेश प्राप्ति, तब लोकशिक्षा।।

कुछ देर बाद विजय आदि भक्तों से कह रहे हैं, “भक्ति ही सार है। उनके नामगुण का कीर्तन सदा करते करते भक्ति प्राप्त होती है। अहा, शिवनाथ की कैसी भक्ति है! मानो, रस में पड़ा हुआ रसगुल्ला।

“ऐसा समझना ठीक नहीं कि मेरा धर्म ही ठीक है तथा दूसरे सभी का धर्म असत्य है। सभी पथों से उन्हें प्राप्त किया जा सकता है। हृदय में व्याकुलता रहनी चाहिए। अनन्त पथ, अनन्त मत।

“देखो, ईश्वर को देखा जा सकता है। वेद में कहा है, ‘अवाङ्मानसगोचरम्।’


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