श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ११ मार्च, १८८३
को क्यों समाधि होती? अवश्य इन्होंने हृदयकमल में राम का रूप देखा होगा।'
थोड़ी देर में कोन्नगर से कुछ भक्त मृदंग और झाँझ लिए संकीर्तन करते हुए बगीचे में आए। मनमोहन, नबाई आदि बहुतसे लोग नामसंकीर्तन करते हुए श्रीरामकृष्ण के पास उसी उत्तरपूर्ववाले बरामदे में पहुँचे। श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त होकर उनसे मिलकर संकीर्तन कर रहे हैं।
नाचते नाचते बीच बीच में समाधि हो जाती है। तब संकीर्तन के बीच में निःस्पन्द होकर खड़े रहते हैं। उसी अवस्था में भक्तों ने उनको फूलों की बड़ी बड़ी मालाओं से सजाया। भक्त देख रहे हैं मानो सामने ही श्रीगौरांग खड़े हैं। गहरी भावसमाधि में मग्न हैं। श्रीगौरांग की तरह श्रीरामकृष्ण की भी तीन दशाएँ हैं; कभी अन्तर्दशा – तब जड़ वस्तु की भाँति आप बेहोश और निःस्पन्द हो जाते हैं; कभी अर्धबाह्य दशा – तब प्रेम से भरपूर होकर नाचते हैं; और फिर बाह्य दशा – तब भक्तों के साथ संकीर्तन करते हैं।
श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो खड़े हैं। गले में मालाएँ हैं। कहीं गिर न पड़ें इसलिए एक भक्त आपको पकड़े हुए हैं। चारों ओर भक्त खड़े होकर मृदंग और झाँझ के साथ कीर्तन कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की दृष्टि स्थिर है। श्रीमुख पर प्रेम की छटा झलक रही है। आप पश्चिम की ओर मुँह किए हैं। बड़ी देर तक सब लोग यह आनन्दमूर्ति देखते रहे।
समाधि छूटी। दिन चढ़ गया है। थोड़ी देर बाद कीर्तन भी बन्द हुआ। भक्तगण श्रीरामकृष्ण को भोजन कराने के लिए व्यग्र हुए।
कुछ देर विश्राम के पश्चात् श्रीरामकृष्ण एक नया पीला वस्त्र पहने अपनी छोटी खाट पर बैठे। आनन्दमय महापुरुष की उस अनुपम ज्योतिर्मय रूपछबि को भक्त देख रहे हैं; पर देखने की प्यास नहीं मिटती। वे सोचते हैं कि इसे देखते ही रहें, इस रूपसागर में डूब जायें।
श्रीरामकृष्ण भोजन करने बैठे। भक्तों ने भी प्रसाद पाया।
(५)
श्रीरामकृष्ण और सर्वधर्मसमन्वय
भोजन के उपरान्त श्रीरामकृष्ण छोटे तख्त पर आराम कर रहे हैं। कमरे में लोगों की भीड़ बढ़ रही है। बाहर के बरामदे भी लोगों से भरे हैं। कमरे के भीतर जमीन पर भक्त बैठे हैं और श्रीरामकृष्ण की ओर एकदृष्टि से ताक रहे हैं। केदार, सुरेश, राम, मनोमोहन, गिरीन्द्र, राखाल, भवनाथ, मास्टर आदि बहुत लोग वहाँ पर मौजूद हैं। राखाल के पिता आए हैं, वे भी वहीं बैठे हैं।
एक वैष्णव गोसाईं भी उसी स्थान पर बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे बातें कर रहे हैं। गोसाइयों को देखते ही श्रीरामकृष्ण सिर झुकाकर प्रणाम करते थे – कभी कभी तो उनके