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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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११ मार्च, १८८३परिच्छेद २६१६१

सामने साष्टांग प्रणाम करते थे।

नाममाहात्म्य अथवा अनुराग

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, तुम क्या कहते हो? उपाय क्या है?

गोसाई – जी, नाम से ही सब कुछ होगा। कलियुग में नाम की बड़ी महिमा है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, नाम की बड़ी महिमा तो है. पर बिना अनुराग के क्या हो सकता है? ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होने चाहिए। सिफ नाम लेता जा रहा हूँ, पर चित्त कामिनी और कांचन में है इससे क्या होगा?

“बिच्छू या मकड़ी के काटने पर खाली मन्त्र से वह अच्छा नहीं होता – उसके लिए कण्डे का ताप भी देना पड़ता है।”

गोसाई – तो अजामिल का क्यों हुआ? वह महापातकी था, ऐसा पाप ही न था जो उसने न किया हो; पर मरते समय अपने लड़के को ‘नारायण’ कहकर बुलाने से ही उसका उद्धार हो गया।

श्रीरामकृष्ण – शायद अजामिल पूर्वजन्म में बहुत कर्म कर चुका था। और यह भी लिखा है कि उसने बाद में तपस्या भी की थी।

“अथवा यों कहो कि उस समय उसके अन्तिम क्षण आ गए थे। हाथी को नहला देने से क्या होगा, फिर धूल-मिट्टी लिपटाकर वह ज्यों का त्यों हो जाता है। पर हाथीखाने में घुसने के पहले ही अगर कोई उसकी धूल झाड़ दे और उसे नहला दे तो फिर उसका शरीर साफ रह सकता है।

“मान लिया कि नाम से जीव एक बार शुद्ध हुआ, पर वह फिर तरह तरह के पापों में लिप्त हो जाता हैं। मन में बल नहीं; वह प्रण नहीं करता कि फिर पाप नहीं करूँगा। गंगास्नान से सब पाप मिट जाते हैं सही, पर सब लोग कहते हैं कि वे पाप एक पेड़ पर चढ़े रहते हैं। जब वह मनुष्य गंगाजी से नहाकर लौटता है, तो वे पुराने पाप पेड़ से कूदकर फिर उसके सिर पर सवार हो जाते हैं। (सब हँसे) उन पुराने पापों ने उसे फिर घेर लिया!

दो-चार कदम चलते ही उसे धर दबाया!

“इसलिए नाम भी करो और साथ ही प्रार्थना भी करो कि ईश्वर पर अनुराग हो, और जो चीजें दो दिन के लिए हैं – जैसे धन, मान, देहसुख आदि – उनसे आसक्ति घट जाय।

वैष्णवधर्म तथा साम्प्रदायिकता

(गोसाई से) – “यदि आन्तरिकता हो तो सभी धर्मों से ईश्वर मिल सकते हैं। वैष्णवों को भी मिलेंगे तथा शाक्तों, वेदान्तियों और ब्राह्मों को भी, मुसलमानों और ईसाइयों को भी। हृदय से चाहने पर सब को मिलेंगे। कोई कोई झगड़ा कर बैठते हैं। वे कहते हैं कि