श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ११ मार्च, १८८३
श्रीरामकृष्ण (राखाल के पिता और भक्तों से) – अहा, आजकल राखाल का स्वभाव कैसा हुआ है! उसके मुँह पर दृष्टि डालने से देखोगे, उसके होंठ रह-रहकर हिल रहे हैं। अन्तर में ईश्वर का नाम जपता है, इसलिए होंठ हिलते रहते हैं।
“ये सब लड़के नित्यसिद्ध की श्रेणी के हैं। ईश्वर का ज्ञान साथ लेकर पैदा हुए हैं। कुछ उम्र होते ही ये समझ जाते हैं कि संसार की छूत देह में लगी तो फिर निस्तार न होगा। वेदों में ‘होमा’ पक्षी की कहानी है। वह चिड़िया आकाश में ही रहती है; जमीन पर कभी नहीं उतरती। आकाश ही में अण्डे देती है। अण्डे गिरते रहते हैं, पर वे इतनी ऊँचाई से गिरते हैं कि गिरते ही गिरते बीच में वे फूट जाते हैं। तब बच्चे निकल आते हैं। वे भी गिरने लगते हैं। उस समय भी वे इतने ऊँचे पर रहते हैं कि गिरते ही गिरते उनके पंख निकल आते हैं और आँखें भी खुल जाती हैं। तब वे समझ जाते हैं कि अरे हम मिट्टी में गिर जाएँगे, और गिरे तो चकनाचूर! मिट्टी देखते ही एकदम अपनी माता की ओर उड़ जाते हैं। माता के निकट पहुँचना ही उनका लक्ष्य हो जाता है।
“ये सब लड़के ठीक वैसे ही हैं। बचपन ही में संसार देखकर डर जाते हैं। इनकी एकमात्र चिन्ता यही है कि किस तरह माता के निकट जाएँ, किस प्रकार ईश्वर के दर्शन हों।
“यदि यह कहो कि ये रहे विषयी मनुष्यों में, पैदा हुए विषयी के यहाँ, फिर इनमें ऐसी भक्ति, ऐसा ज्ञान कैसे हो गया, तो इसका भी अर्थ है। मैली जमीन पर यदि चना गिर जाय, तो उसमें चना ही फलता है। उस चने से कितने अच्छे काम होते हैं। मैली जमीन पर गिर गया है, इसलिए उससे कोई दूसरा पौधा थोड़े ही होगा।
“अहा, राखाल का स्वभाव आजकल कैसा हो गया है! और होगा भी क्यों नहीं। यदि सूरण अच्छा हुआ, तो उसके अंकुर भी अच्छे होते हैं। (सब हँसते हैं।) जैसा बाप, वैसा उसका बेटा।”
मास्टर (गिरीन्द्र से अलग से) – साकार और निराकार की बात कैसी समझायी इन्होंने! जान पड़ता है, वैष्णव केवल साकार ही मानते हैं।
गिरीन्द्र – होगा। वे एक ही भाव पर अड़े रहते हैं।
मास्टर – ‘नित्य साकार’ आप समझे। स्फटिकवाली बात। मैं उसे अच्छी तरह नहीं समझ सका।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – क्यों जी, तुम लोग क्या बातचीत कर रहे हो।
मास्टर और गिरीन्द्र जरा हँसकर चुप हो गए।
वृन्दा दासी (रामलाल से) – रामलाल, अभी इस आदमी को मिठाइयाँ दो, हमें बाद में देना।
श्रीरामकृष्ण – वृन्दा को अभी मिठाइयाँ नहीं दी गयीं?