श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ें११ मार्च, १८८३ | परिच्छेद २६ | १६५
(७)
पंचवटी में कीर्तनानन्द
दिन के तीसरे पहर भक्तगण पंचवटी में कीर्तन कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण भी उनमें मिल गये; भक्तों के साथ मातृनामसंकीर्तन करते हुए आनन्द में मग्न हो रहे हैं।
(गीत का भावार्थ) – ‘श्यामा माँ के चरणरूपी आकाश में मन की पतंग उड़ रही थी। कलुष की वायु से वह चक्कर खाकर गिर पड़ी। माया का कन्ना भारी हुआ, मैं उसे फिर उठा नहीं सका। स्त्री-पुत्रादि के तागे में उलझकर वह फट गयी। उसका ज्ञानरूपी मस्तक (ऊपर का हिस्सा) अलग हो गया है। उठाने से ही वह गिर पड़ती है। जब सिर ही नहीं रह गया तो वह उड़ कैसे सकती है! साथ के छः आदमियों की (कामक्रोधादि की) विजय हुई। वह भक्ति के तागे से बँधी थी। खेलने के लिए आते ही तो यह भ्रम सवार हो गया। ‘नरेशचन्द्र’ को इस हँसने और रोने से तो बेहतर आना ही न था।’
फिर गाना होने लगा। गीत के साथ ही मृदंग-करताल बजने लगे। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ नाच रहे हैं।
(गीत का भावार्थ) – ‘मेरा मन-मधुप श्यामापद-नीलकमल में मस्त हो गया। कामादि पुष्पों में जितने विषय-मधु थे, सब तुच्छ हो गए। चरण काले हैं, मधुप काला है, काले से काला मिल गया। पंचतत्त्व यह तमाशा देखकर भाग गए। ‘कमलाकान्त’ के मन की आशा इतने दिनों में पूर्ण हुई। सुख-दुःख दोनों बराबर हुए; केवल आनन्द का सागर उमड़ रहा है।’
कीर्तन हो रहा है, और भक्त गा रहे हैं।
(भावार्थ) – “श्यामा माँ ने एक कल बनायी है। साढ़े-तीन हाथ की कल के भीतर वह कितने ही रंग दिखा रही है। वही स्वयं कल के भीतर रहकर कल की डोर पकड़कर उसे घुमाया करती है। कल कहती है, मैं खुद घूमती हूँ। वह यह नहीं जानती कि कौन उसे घुमा रहा है। जिसने कल को पहचान लिया है, उसे कल न होना होगा। किसी किसी कल की भक्तिरूपी डोर में श्यामा माँ स्वयं बँधी हुई है।”
भक्त लोग आनन्द करने लगे। जब उन्होंने थोड़ी देर के लिए गाना बन्द किया तब श्रीरामकृष्ण उठे। इधर उधर अभी अनेक भक्त हैं।
श्रीरामकृष्ण पंचवटी से अपने कमरे की ओर जा रहे हैं। मास्टर साथ हैं। बकुल के पेड़ के नीचे जब वे आये तब त्रैलोक्य से भेंट हुई। उन्होंने प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण (त्रैलोक्य से) – पंचवटी में वे लोग गा रहे हैं, एक बार चलकर देखो तो।