भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 29

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

६ श्रीरामकृष्णवचनामृत मार्च, १८८२

मास्टर नहीं जानते, ज्ञान किसे कहते हैं और अज्ञान किसे। अभी तो उनकी धारणा यही है कि कोई लिख-पढ़ ले तो मानो ज्ञानी हो गया। उनका यह भ्रम दूर तब हुआ जब उन्होंने सुना कि ईश्वर को जान लेना ज्ञान है और न जानना अज्ञान। श्रीरामकृष्ण की इस बात से कि ‘तुम ज्ञानी हो’ मास्टर के अहंकार पर फिर धक्का लगा।

मूर्तिपूजा

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, तुम्हारा विश्वास ‘साकार’ पर है या ‘निराकार’ पर?

मास्टर मन ही मन सोचने लगे, ‘यदि साकार पर विश्वास हो तो क्या निराकार पर भी विश्वास हो सकता है? ईश्वर निराकार है – यदि ऐसा विश्वास हो तो ईश्वर साकार है ऐसा भी विश्वास कभी हो सकता है? ये दोनों विरोधी भाव किस प्रकार सत्य हो सकते हैं? सफेद दूध क्या कभी काला हो सकता है?’

मास्टर – निराकार मुझे अधिक पसन्द है।

श्रीरामकृष्ण – अच्छी बात है। किसी एक पर विश्वास रखने से काम हो जायगा। निराकार पर विश्वास करते हो, अच्छा है। पर यह न कहना कि यही सत्य है, और सब झूठ। यह समझना कि निरकार भी सत्य है और साकार भी सत्य है। जिस पर तुम्हारा विश्वास हो उसी को पकड़े रहो।

दोनों सत्य हैं, यह सुनकर मास्टर चकित हो गए। यह बात उनके किताबी ज्ञान में तो थी ही नहीं! तीसरी बार धक्का खाकर उनका अहंकार चूर्ण हुआ, पर अभी कुछ रह गया था; इसलिए फिर वे तर्क करने को आगे बढ़े।

मास्टर – अच्छा, वे साकार हैं, यह विश्वास मानो हुआ। पर मिट्टी की या पत्थर की मूर्ति तो वे हैं नहीं।

श्रीरामकृष्ण – मिट्टी की मूर्ति वे क्यों होने लगे? पत्थर या मिट्टी नहीं, चिन्मयी मूर्ति।

चिन्मयी मूर्ति, यह बात मास्टर न समझ सके। उन्होंने कहा – “अच्छा, जो मिट्टी की मूर्ति पूजते हैं, उन्हें समझाना भी तो चाहिए कि मिट्टी की मूर्ति ईश्वर नहीं है और मूर्ति के सामने ईश्वर की ही पूजा करना ठीक है, किन्तु मूर्ति की नहीं!”

लेक्चर तथा श्रीरामकृष्ण

श्रीरामकृष्ण (अप्रसन्न होकर) – तुम्हारे कलकत्ते के आदमियों में यही एक धुन सवार है, – सिर्फ लेक्चर देना और दूसरों को समझाना! अपने को कौन समझाए, इसका ठिकाना नहीं। अजी समझानेवाले तुम हो कौन? जिनका संसार है वे समझाएँगे। जिन्होंने सृष्टि रची है, सूर्य-चन्द्र, मनुष्य, जीव-जन्तु बनाए हैं, जीव-जन्तुओं के भोजन के उपाय सोचे हैं, उनका पालन करने के लिए माता-पिता बनाए हैं, माता-पिता में स्नेह का संचार

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar