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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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मार्च, १८८२परिच्छेद २

किया है - वे समझाएँगे। इतने उपाय तो उन्होंने किए और यह उपाय वे न करेंगे? अगर समझाने की जरूरत होगी तो वे समझाएँगे, क्योंकि वे अन्तर्यामी हैं। यदि मिट्टी की मूर्ति पूजने में कोई भूल होगी तो क्या वे नहीं जानते कि पूजा उन्हीं की हो रही है? वे उसी पूजा से सन्तुष्ट होते हैं। इसके लिए तुम्हारा सिर क्यों धमक रहा है? तुम यह चेष्टा करो जिससे तुम्हें ज्ञान हो - भक्ति हो।

अब शायद मास्टर का अहंकार बिलकुल चूर्ण हो गया।

वे सोचने लगे, 'ये जो कह रहे हैं वह ठीक ही तो है। मुझे दूसरों को समझाने की क्या जरूरत? क्या मैंने ईश्वर को जान लिया है, या मुझमें उनके प्रति विशुद्ध भक्ति उत्पन्न हुई है? स्वयं के सोने के लिए जगह नहीं है, और लोगों को न्यौता दे रहे हैं! स्वयं को कुछ ज्ञान नहीं, अनुभव नहीं, और दूसरों को समझाने चले हैं! वास्तव में कितनी लज्जा की बात है, कितनी हीन बुद्धि का काम है। क्या यह गणित, इतिहास या साहित्य है कि दूसरों को समझा दे? यह ईश्वरीय ज्ञान है। ये जो बातें कह रहे हैं, वे कैसे हृदय को स्पर्श कर रही हैं!

श्रीरामकृष्ण के साथ मास्टर का यही प्रथम और यही अन्तिम तर्कवाद था।

श्रीरामकृष्ण – तुम मिट्टी की मूर्ति की पूजा की बात कहते थे। यदि मिट्टी ही की हो तो भी उस पूजा की जरूरत है। देखो, सब प्रकार की पूजाओ की योजना ईश्वर ने ही की है। जिनका यह संसार है, उन्होंने ही यह सब किया है। जो जैसा अधिकारी है उसके लिए वैसा ही अनुष्ठान ईश्वरने किया है। लड़के को जो भोजन रुचता है और जो उसे सह्य है, वही भोजन उसके लिए माँ पकाती है, समझे?

मास्टर – जी हाँ।

(३)

संसारार्णवघोरे यः कर्णधारस्वरूपकः।
नमोऽस्तु रामकृष्णाय तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

भक्ति का उपाय

मास्टर (विनीत भाव से) – ईश्वर में मन किस तरह लगे?

श्रीरामकृष्ण – सर्वदा ईश्वर का नाम-गुणगान करना चाहिए, सत्संग करना चाहिए – बीच बीच में भक्तों और साधुओं से मिलना चाहिए। संसार में दिनरात विषय के भीतर पड़े रहने से मन ईश्वर में नहीं लगता। कभी कभी निर्जन स्थान में जाकर ईश्वर की चिन्ता करना बहुत जरूरी है। प्रथम अवस्था में बीच बीच में एकान्तवास किए बिना ईश्वर में मन लगाना बड़ा कठिन है।

“पौधे को चारों ओर से रूँधना पड़ता है, नहीं तो बकरी चर लेगी।”