श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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परिच्छेद ५२
दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ
(१)
सच्ची चालाकी कौनसी है?
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिरवाले अपने कमरे में प्रसन्नतापूर्वक बैठे हुए भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। आपका भोजन हो चुका है, दिन के एक या दो बजे होंगे।
आज रविवार है, ९ सितम्बर १८८३, भादों की शुक्ला सप्तमी। कमरे में राखाल, मास्टर और रतन बैठे हुए हैं। रामलाल, राम चटर्जी और हाजरा भी एक-एक करके आते और आसन ग्रहण करते हैं। रतन यदु मल्लिक के बगीचे की देखभाल करते हैं। वे श्रीरामकृष्ण की भक्ति करते हैं, तथा कभी कभी उनके दर्शन कर जाया करते हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हीं से बातचीत कर रहे हैं। रतन कह रहे हैं, यदु मल्लिक के कलकत्तेवाले मकान में नीलकण्ठ का नाटक होगा।
रतन – आपको जाना होगा। उन लोगों ने कहला भेजा है अमुक दिन नाटक होगा।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा है, मेरी भी जाने की इच्छा है। अहा नीलकण्ठ कैसे भक्तिपूर्वक गाता है!
एक भक्त – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – गाना गाते हुए वह आँसुओ से तर हो जाता है। (रतन से) सोचता हूँ रात को वहीं रह जाऊँगा।
रतन – अच्छा तो है।
राम चटर्जी आदि ने खड़ाऊँ की चोरीवाली बात पूछी।
रतन – यदुबाबू के गृहदेवता की सोने की खड़ाऊँ चोरी गयी है। इसके कारण घर में बड़ा हो-हल्ला मचा हुआ है। थाली चलायी जाएगी।* सब बैठे रहेंगे, जिसने लिया है, उसकी ओर थाली चली जाएगी!
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – किस तरह थाली चलती है? अपने आप चलती है?
* यह एक तरह का टोना है।
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar