श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ९ सितम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५२ | २९५ |
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रतन – नहीं, हाथ से दबायी हुई रहती है।
भक्त – हाथ ही की कोई कारीगरी होगी – हाथ की चालाकी।
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – जिस चालाकी से लोग ईश्वर को पाते हैं, वही चालाकी चालाकी है। 'सा चातुरी चातुरी!'
(२)
तान्त्रिक साधना और श्रीरामकृष्ण का सन्तान-भाव
बातचीत हो रही है, इसी समय कुछ बंगाली सज्जन कमरे में आए और श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके उन्होंने आसन ग्रहण किया। उनमें एक व्यक्ति श्रीरामकृष्ण के पहले के परिचित हैं। ये लोग तन्त्र के मत से साधना करते हैं – पंच-मकार साधना। श्रीरामकृष्ण अन्तर्यामी हैं, उनका सम्पूर्ण भाव समझ गए। उनमें एक आदमी धर्म के नाम से पापाचरण भी करता है, यह बात श्रीरामकृष्ण सुन चुके हैं। उसने किसी बड़े आदमी के भाई की विधवा के साथ अवैध प्रेम कर लिया है और धर्म का नाम लेकर उसके साथ पंच-मकार की साधना करता है, यह भी श्रीरामकृष्ण सुन चुके हैं।
श्रीरामकृष्ण का सन्तान-भाव है। वे हरएक नारी को माता समझते हैं – वेश्या को भी; और स्त्रियों को भगवती का एक-एक रूप समझते हैं।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – अचलानन्द कहाँ है? उस दिन कालीकिंकर आया था – और एक जन था। (मास्टर आदि से) अचलानन्द और उसके शिष्यों का और ही भाव है। मेरा सन्तान-भाव है।
आए हुए बाबू लोग चुपचाप बैठे हुए हैं, कुछ बोलते नहीं।
श्रीरामकृष्ण – मेरा सन्तान-भाव है। अचलानन्द यहाँ आकर कभी कभी रहता था। खूब शराब पीता था। मेरा सन्तान-भाव है, यह सुनकर अन्त में उसने हठ पकड़ा। कहने लगा – 'स्त्री को लेकर वीरभाव की साधना तुम क्यों नही मानोगे? शिव की रेख भी नहीं मानोगे? स्वयं शिवजी ने तन्त्र लिखा है। उसमें सब भावों की साधना है, वीरभाव की भी है।'
मैंने कहा, 'मैं क्या जानूँ जी! मुझे वह सब अच्छा नहीं लगता – मेरा सन्तान-भाव है।'
आगन्तुक सज्जन चुप हैं, कुछ बात नहीं निकल ही है।
“अचलानन्द अपने बच्चों की खबर नहीं लेता था। मुझसे कहता था, 'बच्चों को ईश्वर देखेंगे – यह सब ईश्वर की इच्छा है।' मैं सुनकर चुप हो जाता था। बात यह है कि लड़कों की देखरेख कौन करे? लड़के-बाले, घर-द्वार सब छोड़ दिया यह कहीं रुपये