श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २९६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ९ सितम्बर, १८८३ |
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कमाने का साधन न बन बैठे, क्योंकि, लोग सोचेंगे, इसने तो सब कुछ त्याग कर दिया है, और इस तरह बहुतसा धन देने लगेंगे।
“मुकदमा जीतूँगा, खूब धन होगा, मुकदमा जिता दूँगा, जायदाद दिला दूँगा, क्या इसीलिए साधना है? ये सब बड़ी ही नीच प्रकृति की बातें हैं।”
“रुपये से भोजन-पान होता है, रहने की जगह होती है, देवताओं की सेवा होती है, साधुओं का सत्कार होता है, सामने कोई गरीब आ गया तो उसका उपकार हो जाता है, ये सब रुपये के सदुपयोग हैं। रुपये ऐश्वर्य का भोग करने के लिए नहीं हैं, न देहसुख के लिए हैं, न लोकसम्मान के लिए।”
“विभूतियों के लिए लोग तन्त्र के मत से पंच-मकार की साधना करते हैं। परन्तु उनकी बुद्धि कितनी हीन है! कृष्ण ने अर्जुन से कहा है – भाई! अष्टसिद्धियों में किसी एक के रहने पर तुम्हारी शक्ति तो थोड़ी बढ़ सकती है, परन्तु तुम मुझे न पाओगे। विभूति के रहते माया दूर नहीं होती। माया से फिर अहंकार होता है। कैसी हीन बुद्धि है, घृणास्पद स्थान से तीन घूँट कारणवारि (शराब) पीकर लाभ क्या हुआ? – मुकदमा जीतना।”
श्रीरामकृष्ण तथा हठयोग
“शरीर, रुपया, यह सब अनित्य है। इसके लिए इतना हठ क्यों? हठयोगियों की दशा देखो न! शरीर किसी तरह दीर्घायु हो, बस इसी ओर ध्यान लगा रहता है। ईश्वर की ओर लक्ष नहीं है। नेति-धौति बस पेट साफ कर रहे हैं! नल लगाकर दूध ग्रहण कर रहे हैं।
“एक सुनार था। उसकी जीभ उलटकर तालू पर चढ़ गयी थी। तब जड़-समाधि की तरह उसकी अवस्था हो गयी। फिर वह हिलता-डुलता न था। बहुत दिनों तक उसी अवस्था में रहा। लोग आकर उसकी पूजा करते थे। कुछ साल बाद एकाएक उसकी जीभ सीधी हो गयी। तब उसे पहले की तरह चेतना हो गयी। फिर वही सुनार का काम करने लगा! (सब हँसते हैं।)
“वे सब शरीर के कर्म हैं। उससे प्रायः ईश्वर के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता। शालग्राम का भाई – (उसका लड़का वंशलोचन का व्यवसाय करता था)– बयासी तरह के आसन जानता था। वह योग-समाधि की भी बहुतसी बातें कहता था। परन्तु भीतर ही भीतर उसका कामिनी-कांचन में मन था। दीवान मदन भट्ट की कुछ हजार रुपयों की एक नोट पड़ी थी, रुपयों की लालच से वह उसे झट निगल गया। बाद में फिर किसी तरह निकाल लेता। परन्तु नोट उससे वसूल हो गयी। अन्त में तीन साल के लिए वह जेल भेजा गया। मैं सरल भाव से सोचता था, शायद उसकी आध्यात्मिक उन्नति बहुत हो चुकी है, सच कहता हूँ – रामदुहाई!”