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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२९८श्रीरामकृष्णवचनामृत९ सितम्बर, १८८३

श्रीरामकृष्ण – देखो, उसकी जैसी विद्या है, वैसी ही बुद्धि भी है। और गाना-बजाना भी जानता है। इधर जितेन्द्रिय भी है; कहता है, विवाह न करूँगा।

मणि – आपने कहा है, जो पाप पाप सोचता रहता है, वह पापी हो जाता है, फिर वह उठ नहीं सकता। मैं ईश्वर की सन्तान हूँ, यह विश्वास यदि हुआ तो बहुत शीघ्रता से उन्नति होती है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, विश्वास चाहिए।

“कृष्णकिशोर का कैसा विश्वास है। कहता था, ‘मैं एक बार उनका नाम ले चुका, अब मुझमें पाप कहाँ रह गया? मैं शुद्ध और निर्मल हो गया हूँ।’ हलधारी ने कहा था, ‘अजामिल फिर नारायण की तपस्या करने गया था; तपस्या न करने पर क्या उनकी कृपा होती है? – केवल एक बार नारायण कहने से क्या होगा?’ यह बात सुनकर कृष्णकिशोर को इतना क्रोध आया कि बगीचे में फूल तोड़ने आया था – उसने हलधारी की ओर फिर एक दृष्टि भी नहीं फेरी।

“हलधारी का बाप बड़ा भक्त था। स्नान करते हुए कमरभर पानी में जब वह मन्त्र पढ़ता था, – ‘रक्तवर्णं चतुर्मुखम्’ आदि कहते हुए ध्यान करता था, – तब उसकी आँखों से अनर्गल प्रेमाश्रु बह चलते थे।

“एक दिन ऐँड़ेदा के घाट पर एक साधु आया। बात हुई, हम लोग भी देखने जाएँगे। हलधारी ने कहा, ‘उस पंचभूतों के गिलाफ को देखकर क्या होगा?’ इसके बाद कृष्णकिशोर ने यह बात सुनकर कहा था, ‘क्या! साधु के दर्शन से क्या होगा ऐसी बात भी उसके मुँह से निकली! जो लोग कृष्ण का नाम लेते हैं या रामनाम का जप करते हैं, उनकी देह चिन्मय होती है और वे सब चिन्मय देखते हैं – चिन्मय शाम, चिन्मय धाम!’ उसने कहा था, ‘एक बार कृष्ण या राम का नाम लेने पर सौ बार के सन्ध्या करने का फल होता है।’ जब उसके एक लड़के की मृत्यु होने लगी तब मरते समय राम का नाम लेकर उसने देह छोड़ी थी। कृष्णकिशोर कहता था, ‘उसने राम का नाम लिया है, उसे अब क्या चिन्ता है?’ परन्तु कभी कभी रो पड़ता था। पुत्र का शोक!

“वृन्दावन में उसे प्यास लगी थी। मोची से उसने कहा, ‘तू शिव का नाम ले।’ उसने शिव का नाम लेकर पानी भर दिया – उस तरह का आचारी ब्राह्मण होकर भी उसने वह पानी पी लिया कितना बड़ा विश्वास है।

“विश्वास नहीं है, और पूजा, जप, सन्ध्यादि कर्म करता है, इससे कुछ नहीं होगा! क्यों जी?”

मास्टर – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – गंगा के घाट में नहाने के लिए लोग आते हैं। मैंने देखा है, उस समय दुनिया भर की बातें करते हैं। किसी की विधवा बुआ कह रही है – “बहू,

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