श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५२ २९९
मेरे बिना रहे दुर्गापूजा नहीं होती। मैं न रहूँ तो ‘श्री’मूर्ति भी सुडौल न हो! घर में शादी-ब्याह कुछ हुआ तो सब काम मुझे ही करना पड़ता है, नहीं तो अधूरा रह जाय। फूलशय्या का बन्दोबस्त, कत्थे के बगीचे की तैयारी सब मैं ही करती हूँ।”
मणि – जी, इनका भी क्या दोष – क्या लेकर रहें।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – छत पर ठाकुरजी के लिए घर बनाया है। नारायण की पूजा हो रही है। पूजा का नैवेद्य, चन्दन यह सब तैयार किया जा रहा है। परन्तु ईश्वर की बात कहीं एक भी नहीं होती। क्या पकाना चाहिए, – आज बाजार में कोई अच्छी चीज नहीं मिली, कल अमुक व्यंजन अच्छा बना था, – वह लड़का मेरा चचेरा भाई हैं, – क्यों रे, तेरी वह नौकरी है न? – और मैं अब कैसी हूँ! – मेरा हरि चल बसा!’ बस यही सब बातें होती हैं!
“देखो भला, ठाकुरजी की पूजा के समय ये सब दुनिया भर की बातें!”
मणि – जी, अधिक संख्या ऐसे ही लोगों की है। आप जैसा कहते हैं, ईश्वर पर जिसका अनुराग है, उसे अधिक दिनों तक पूजा और सन्ध्या थोड़े ही करनी पड़ती है!
(३)
चिन्मय रूप। ज्ञान और विज्ञान। ‘ईश्वर ही वस्तु हैं’
श्रीरामकृष्ण एकान्त में मणि के साथ बातचीत कर रहे हैं।
मणि – अच्छा, वही अगर सब कुछ हुए हैं, तो इस तरह के अनेक भाव क्यों दीख पड़ते हैं?
श्रीरामकृष्ण – विभु के स्वरूप से वे सर्वभूतों में हैं परन्तु शक्ति की विशेषता हैं। कहीं तो उनकी विद्याशक्ति है और कहीं अविद्याशक्ति, कहीं ज्यादा शक्ति है और कहीं कम। देखो न, आदमियों के भीतर ठग-चोर भी हैं और बाघ जैसे भयानक प्रकृतिवाले भी हैं। मैं कहता हूँ, ठगनारायण हैं, बाघनारायण हैं।
मणि – (सहास्य) – जी, उन्हें तो दूर ही से नमस्कार करना चाहिए। बाघनारायण के पास जाकर अगर कोई उन्हें भर बाँह भेंटने लगे, तब तो वे उसे कलेवा ही कर जाएँ।
श्रीरामकृष्ण – वे और उनकी शक्ति – ब्रह्म और शक्ति – इसके सिवाय और कुछ नहीं है। नारद ने रामचन्द्रजी से स्तव करते हुए कहा – हे राम, तुम्हीं शिव हो, सीता भगवती हैं; तुम ब्रह्मा हो, सीता ब्रह्माणी हैं; तुम इन्द्र हो, सीता इन्द्राणी हैं; तुम नारायण हो, सीता लक्ष्मी; पुरुषवाचक जो कुछ हैं, सब तुम्हीं हो, स्त्रीवाचक जो कुछ है, सब सीता।
मणि – और चिन्मय रूप?
श्रीरामकृष्ण कुछ देर बाद विचार करने लगे। फिर धीमे स्वर में कहा, “वह किस